दिवाली के मौके पर अलवर के मिल्क केक क़ो लोग खूब पसंद करते है. इसका दानेदार स्वाद इसे बाकी मिठाइयों से अलग बनाता है. दूध, चीनी और केसर से तैयार होने वाला मिल्क केक देश के अलावा यूरोप, अमेरिका, सऊदी अरब, कनाडा, नेपाल, भूटान सहित विदेश में भी सप्लाई होता है. मिल्क केक के साथ ड्राई फ्रूट्स की मिठाइयों की भी डिमांड तेजी से बढ़ने लगी है. दूध और मावे में होने वाली मिलावट से बचने के लिए लोग ड्राई फ्रूट से बनी हुई मिठाइयों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं.
त्योहार के मौके पर वैसे तो सभी मिठाइयों की भारी डिमांड रहती है. लेकिन इनमें अलवर का कलाकंद बेहद खास रहता है. अलवर का कलाकंद देश के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेश में भी सप्लाई होता है. यह बाहर से हल्का भूरा और अंदर से मलाईदार और मीठा होता है.
मिल्क केक की रेसिपी
कलाकंद व्यापारी आशीष तनेजा ने इसकी रेसिपी भी साझा की है. इसे घर में भी ट्राई किया जा सकता है. इसके लिए 2 लीटर दूध में ढाई सौ ग्राम चीनी, तीन से चार चम्मच घी, नींबू का रस और इलायची पाउडर के अलावा ड्राई फ्रूट्स डाले जाते हैं.
उन्होंने बताया कि कलाकंद बनाने के लिए दूध को सबसे पहले उबालना पड़ता है. लोहे व स्टील की कढ़ाई में दूध को लगातार उबाला जाता है. उसमें नींबू का रस या फिटकरी डालकर उसको फाड़ा जाता है और उसमें हल्के दाने तैयार किए जाते हैं. इसके बाद उसमें चीनी डालकर उसे अच्छे से पकाया जाता है. जब वो अच्छे से गाढ़ा हो जाता है तो एक सांचे में डालकर रख दिया जाता है.
मिल्क केक की कहानी
आज अलवर में सैकड़ों दुकानदार मिल्क केक बनाते हैं. यह मिठाई पहली बार 1947 में सामने आई थी. पाकिस्तान से विस्थापित होकर अलवर पहुंचे बाबा ठाकुरदास एक दिन दूध गर्म कर रहे थे. इस दौरान दूध फट गया तो उन्होंने उसमें चीनी डाल दी और उसको पकाकर एक बर्तन में जमा दिया. ठंडा होने के बाद जब उन्होंने उसे चखा तो उसका स्वाद बहुत बढ़ गया था. आगे चलकर इस मिठाई को कलाकंद नाम दे दिया गया. अलवर आने वाले नेता, अभिनेता, कारोबारी सभी यहां आकर मिल्क केक खाते हैं और उसे खूब पसंद भी करते हैं. यहां बाबा ठाकुरदास की तीसरी पीढ़ी इस मिल्क केक को बना रही है.
हिमांशु शर्मा