तलाक और बच्चों की कस्टडी की मुश्किल लड़ाई से जूझ रहीं बॉलीवुड अभिनेत्री सेलिना जेटली ने हाल ही में शादी से पहले महिलाओं को प्री-नप एग्रीमेंट (विवाह पूर्व समझौता) करने की सलाह देकर एक नई बहस छेड़ दी है. सेलिना ने जिस तरह अपनी शादी, बच्चों की कस्टडी के संघर्ष और पैसों की धोखाधड़ी के दर्दनाक अनुभवों को जिया है और फिर उन्हें दुनिया से शेयर किया है, वो आज हर किसी के बीच बड़ी चर्चा का विषय बन चुका है.
जब सेलिना जेटली ने प्री-नप के आइडिया पर बात की तो वह सिर्फ अपनी निजी सलाह नहीं दे रही थीं बल्कि वो एक ऐसे फाइनेंशियल डॉक्यूमेंट की अहमियत पर बातचीत शुरू कर रही थीं जिसे भारत ने शायद लंबे समय से नजरअंदाज किया है.
भारत में शादी को लंबे समय से जिंदगी भर के वादे के तौर पर देखा जाता रहा है. इसकी शुरुआत हमेशा साथ रहने के वादों और खुशी-खुशी जिंदगी बिताने की उम्मीद के साथ होती है. लेकिन आज शादी को लेकर यह नजरिया बदल रहा है और उससे जुड़ी बातचीत भी बदल रही है.
सेलिना ने दी ये सलाह
हाल ही में अपने तलाक को लेकर लीगल बैटल झेल रहीं एक्ट्रेस सेलिना जेटली ने महिलाओं से अपील की कि वे शादी से पहले अपनी संपत्ति सुरक्षित करें और प्री-नप्टियल एग्रीमेंट (शादी से पहले का समझौता) करें. इंडिया टुडे से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'मैं लड़कियों को सलाह दूंगी कि अगर आपके पास अपनी संपत्ति है तो प्लीज प्री-नप जरूर करें.'
'शादी से पहले प्री-नप जरूर करें. अपनी संपत्ति हमेशा अलग रखें. क्योंकि आप जानते हैं. आखिर में बात संपत्ति पर ही आकर रुकती है. सारा प्यार, सारी देखभाल, साथ रहने के सारे वादे, बच्चे, मौत, जन्म, सब कुछ आखिर में संपत्ति पर ही आकर सिमट जाता है. और यही बात मुझे सबसे ज्यादा दुख देती है.'
क्या भारत में प्री-नप को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए?
ऐसे समय में जब दहेज से जुड़ी मौतों की खबरें आती रहती हैं, कोर्ट और सोशल मीडिया पर तलाक के मामले उलझते दिखते हैं, और शादी टूटने की वजह अक्सर पैसों से जुड़े झगड़े होते हैं, उनकी बातों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या अब समय आ गया है कि भारत प्री-नप्टियल एग्रीमेंट को कानूनी मान्यता दे?
हालांकि यह इतना आसान नहीं
प्री-नप्टियल एग्रीमेंट क्या है. इसे आम तौर पर प्री-नप कहा जाता है. यह असल में एक फाइनेंशियल एग्रीमेंट है जिस पर शादी से पहले कपल साइन करते हैं. इसमें यह तय किया जाता है कि अगर शादी टूटती है तो उनकी अलग-अलग एसेट्स, प्रॉपर्टी और दूसरे फाइनेंशियल मामलों को कैसे संभाला जाएगा.
हालांकि अमेरिका जैसे कई देशों में प्री-नप को कानूनी मान्यता मिली हुई है, लेकिन भारत में ये कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं. गोवा इसका एकमात्र अपवाद है जहां पुर्तगाली सिविल कोड के तहत इसे मान्यता प्राप्त है. लेकिन यह एक अलग कहानी है.
भारत जैसे देश में जहां शादी को बहुत पवित्र माना जाता है और इसमें भावनात्मक, आध्यात्मिक और अक्सर धार्मिक मूल्य जुड़े होते हैं, वहां प्री-नप की बात करना लोगों को अजीब और कम रोमांटिक लग सकता है. हमारे सामाजिक ताने-बाने में इसे अक्सर एक Materialistic के रूप में देखा जाता है और नैतिक रूप से सही नहीं माना जाता, क्योंकि यह व्यवस्था शादी के पवित्र रिश्ते की शुरुआत में ही उसके टूटने की आशंका और पैसों के लेन-देन की बात करती है.
इसलिए परिवार और तलाक के मामलों की जानी-मानी वकील वंदना शाह कहती हैं, 'भारत में प्री-नप की कानूनी स्थिति यह है कि शादी से पहले के समझौते कानूनी रूप से लागू नहीं किए जा सकते, यानी वे कानूनी तौर पर मान्य नहीं हैं. तलाक के समय चाहे कोई भी तर्क दिया जाए. शादी से पहले का समझौता कानूनी रूप से वैध दस्तावेज नहीं माना जाता है.'
'हम प्री-नप वाले देश नहीं हैं'
शाह बताती हैं, 'मुझे लगता है कि सामाजिक और कानूनी नजरिए से देखें तो हम आमतौर पर प्री-नप के पक्ष वाले देश नहीं हैं, क्योंकि हम आज भी शादी को ही अंतिम मंजिल मानते हैं. हम अब भी मानते हैं कि शादियां सात जन्मों का बंधन होती हैं. हम अब भी अपनी आस्था और धर्म को मानते हैं. हमारी शादियों में आध्यात्मिकता का बहुत महत्व है.'
उनका कहना है कि भले ही तलाक की दरें बढ़ रही हैं, लेकिन शादियों के मुकाबले तलाक का अनुपात अभी भी बहुत कम है क्योंकि भारत आज भी शादी को बहुत महत्व देने वाला देश बना हुआ है.
हालांकि, इसके बावजूद कई जोड़े प्री-नप की मांग कर रहे हैं.
कॉस्मोपॉलिटन इंडिया के इंस्टाग्राम सर्वे के अनुसार, लगभग 44 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वो अपने पार्टनर के साथ प्रीनप (शादी से पहले का एग्रीमेंट) के बारे में बातचीत करने के लिए तैयार हैं जबकि 94 प्रतिशत लोग इस बात से सहमत थे कि शादी से पहले की बातचीत में पैसों के बारे में चर्चा भी शामिल होनी चाहिए.
शाह बताती हैं कि हालांकि यह कॉन्सेप्ट अभी भी काफी हद तक पश्चिमी है और भारत में अपेक्षाकृत नया है फिर भी उनके पास प्रीनप से जुड़े मामलों को लेकर ज्यादा क्लाइंट्स आ रहे हैं.
तो आखिर लोग प्रीनप क्यों साइन कर रहे हैं?
शाह के अनुसार, मुख्य रूप से दो तरह के कपल्स उनके पास आ रहे हैं.
पहला ग्रुप? वे कपल्स जो इसे अविश्वास के बजाय भरोसे का संकेत मानते हैं. कुछ लोग अपनी मर्जी से प्रीनप साइन करते हैं ताकि वो अपने पार्टनर को नैतिक और मानसिक शांति दे सकें और यह साफ कर सकें कि वे प्यार के लिए शादी कर रहे हैं, न कि पैसे के फायदे के लिए.
दूसरा ग्रुप ज्यादा प्रैक्टिकल है. इसमें एंटरप्रेन्योर, बिजनेस परिवार, NRI या ऐसे कपल्स शामिल हैं जिनकी संपत्ति अलग-अलग देशों में फैली हुई है, जहां प्रीनप को पहले से ही कानूनी मान्यता मिली हो सकती है. अगर शादी ऐसे देश में रजिस्टर होती है जहां प्रीनप लागू किए जा सकते हैं तो एग्रीमेंट को दूसरे देशों से जुड़े कानूनी मुद्दों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा सकता है.
आम तौर पर प्री-नप का मतलब अरबपतियों, मशहूर हस्तियों और बड़ी-बड़ी संपत्तियों वाले लोगों से जोड़ा जाता है. लेकिन मिडिल-क्लास जोड़ों को भी इससे उतना ही फायदा हो सकता है.
तो, यह सिर्फ अमीरों के लिए नहीं है.
वंदना शाह ने बताया, 'मुझे लगता है कि मिडिल-क्लास के लिए प्री-नप बहुत जरूरी हैं क्योंकि इनसे दिल टूटने, परेशानी और पैसे की बर्बादी से बचा जा सकता है.' जेटली ने भी ठीक यही बात कही थी.
भारतीय अदालतों में पारिवारिक विवादों को सुलझाने में अक्सर सालों लग जाते हैं. ऐसे में उनका मानना है कि बेहतर फाइनेंशियल क्लैरिटी (आर्थिक स्पष्टता) से लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों को कम किया जा सकता है.
वंदना शाह समझाती हैं, 'जैसे आप एक या दो साल बाद प्रॉपर्टी बेचने का एग्रीमेंट करते हैं और उसे लागू करना होता है, वैसे ही अगर प्री-नप कानूनी रूप से लागू करने योग्य हो जाएं तो अगर आपकी शादी नहीं चल पाती है तो आपकी जिंदगी बहुत अलग होगी. आपको कोर्ट-कचहरी के चक्कर में सालों नहीं बिताने पड़ेंगे.'
प्री-नप (शादी से पहले का एग्रीमेंट) का मतलब सिर्फ विला या कंपनी के शेयर नहीं होते. इसमें गहने, स्त्रीधन, बचत और दूसरी ऐसी संपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं जो दोनों पार्टनर शादी में साथ लाते हैं. और यह दहेज से जुड़ी मौतों के मामलों में भी मददगार साबित हो सकता है.
हालांकि वंदना शाह साफ कहती हैं कि हर मामला अलग होता है, लेकिन उनका कहना है कि अगर प्री-नप को कानूनी मान्यता मिल जाए तो यह किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का कानूनी रिकॉर्ड भी बन जाएगा. हर चीज का दस्तावेज बन जाता है, जिससे आर्थिक निश्चितता आती है. यह निश्चितता उन महिलाओं को भी सशक्त बना सकती है जो अक्सर आर्थिक असुरक्षा के कारण खराब शादी से बाहर नहीं निकल पातीं.
फिर भी, शादी से पहले प्री-नप के बारे में बात करना अजीब लगता है.
बेशक, इस विडंबना को नजरअंदाज करना मुश्किल है.
आजकल भारतीय लोग देर से शादी कर रहे हैं. महिलाएं पहले से कहीं ज्यादा आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं. स्टार्टअप्स आ रहे हैं जिन्हें खड़ करना पुराने जमाने के मामले में काफी कम समय वाला है. फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में बातचीत आम हो गई है.
आज हम बाकी हर चीज पर खुलकर बात करते हैं. लोग पूछते हैं, 'बच्चे कब कर रहे हो. हनीमून के लिए कहां जा रहे हो. क्या आप कपल के लिए घर खरीद रहे हो. यहां तक कि दहेज के बारे में भी सीधे या इनडायरेक्टली बातचीत होती है. लेकिन कोई यह नहीं पूछता. अगर शादी नहीं चली तो क्या होगा.
शाह कहती हैं कि भारत में वो दिन अभी नहीं आया है.
क्या भारत में प्री-नप को कानूनी मान्यता मिल सकती है?
वंदना शाह कहती हैं कि इसमें अभी बहुत लंबा समय लगेगा. लेकिन क्या उन्हें कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए? इस पर उनका जवाब बड़ी हां है.
'मुझे लगता है कि इससे कानूनी मुकदमे कम होंगे. इससे कोर्ट में लगने वाला समय, परेशानी और पैसा बचेगा. अगर शादी नहीं चलती है, तो इससे पुरुष और महिला दोनों को फायदा होगा.'
क्या आप अपने होने वाले जीवनसाथी के साथ प्री-नप के बारे में बात करने को तैयार होंगे?
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क