घर में कोई ऐसा कमरा है जहां दिन में भी लाइट जलानी पड़ती है? या फिर खिड़की न होने की वजह से कमरे में हमेशा अंधेरा रहता है? अगर हां, तो आपने जरूर उस कमरे को रोशन करने के लिए एलईडी लाइट या बल्ब लगा रखे होंगे. ऐसा करके कमरे में रोशनी तो होती है, लेकिन साथ ही बिजली का बिल भी बढ़ता है. अगर आप भी बिना वजह बढ़ते बिजली के बिल से परेशान हैं, तो ये खबर आपके काम की हो सकती है. आज हम आपको बिना बिजली बिल बढ़ाए और बिना किसी भी तरह का बल्ब लगाए ही कमरे को रोशन करने का एक पुराना तरीका बताने वाले हैं.
आजकल रोशनी पाने का एक पुराना तरीका फिर चर्चा में है. इसमें न महंगा बल्ब चाहिए, न कोई बड़ी मशीन और न ही सोलर पैनल. बस एक ट्रांसपेरेंट प्लास्टिक की बोतल और पानी की मदद से सूरज की रोशनी को कमरे के अंदर पहुंचाया जाता है. इस तरीके को 'मोजर लैंप' कहा जाता है. करीब 26 साल पहले ब्राजील में शुरू हुआ ये आइडिया बाद में कई देशों में अपनाया गया. इसका मकसद ऐसे घरों और कमरों में दिन के समय नेचुरल रोशनी पहुंचाना था, जहां खिड़कियां कम थीं या बिजली की सुविधा नहीं थी.
क्या है पानी की बोतल वाला 'मोजर लैंप'?
'मोजर लैंप' का नाम ब्राजील के मैकेनिक अल्फ्रेडो मोजर से जुड़ा है. साल 2000 के आसपास ब्राजील में बिजली की समस्या के बीच उन्होंने पानी से भरी ट्रांसपेरेंट प्लास्टिक बोतल से कमरे में रोशनी पहुंचाने का आसान तरीका अपनाया था.
इस तरीके में बोतल का एक हिस्सा छत के ऊपर रहता है, जहां उस पर सूरज की रोशनी पड़ती है. वहीं बोतल का दूसरा हिस्सा कमरे के अंदर होता है. जब सूरज की रोशनी बोतल में भरे पानी से होकर गुजरती है, तो वो कमरे के अंदर चारों तरफ फैलने लगती है. इससे दिन के समय कमरे का अंधेरा कम होता है. यानी जिस प्लास्टिक बोतल को हम अक्सर बेकार समझकर फेंक देते हैं, वही दिन में कमरे में नेचुरल रोशनी पहुंचाने के काम आ सकती है.
पानी से भरी बोतल कमरे को कैसे रोशन करती है?
इसका सीधा सा कनेक्शन सूरज की रोशनी और पानी से है. जब सूरज की किरणें बोतल और उसमें भरे पानी से होकर गुजरती हैं, तो उनका डायरेक्शन थोड़ा बदल जाता है और रोशनी कमरे के अंदर ज्यादा जगह तक फैलती है.
इसी वजह से छत में लगी पानी की बोतल कमरे में एक छोटे बल्ब की तरह रोशनी देती हुई नजर आती है. दिन में धूप जितनी तेज होगी, कमरे में उतनी ही ज्यादा प्राकृतिक रोशनी मिल सकती है. कई जगहों पर इसकी रोशनी को करीब 50-60 वाट के बल्ब के बराबर बताया जाता है. हालांकि, असल में कितनी रोशनी मिलेगी, ये धूप, कमरे कितना बड़ा है, बोतल की जगह और इंस्टॉलेशन पर निर्भर करता है.
26 साल पुराना जुगाड़ दुनिया तक कैसे पहुंचा?
ब्राजील से शुरू हुआ ये आइडिया बाद में जरूरतमंद घरों तक नेचुरल रोशनी पहुंचाने वाली मुहिम का हिस्सा बना. 'Liter of Light' जैसे इवेंट्स ने इस तकनीक को दूसरे देशों में भी पहुंचाया. इसकी खासियत ये थी कि इसमें आसानी से मिलने वाली प्लास्टिक बोतल और पानी जैसी आम सी चीजों का इस्तेमाल होता है. ऐसी जगहों पर, जहां बिजली की सुविधा लिमिटेड थी या दिन में भी कमरे अंधेरे रहते थे, वहां ये तरीका काफी फायदेमंद माना गया.
पानी गंदा होने से कैसे बचाया जाता है?
अगर बोतल लंबे समय तक छत पर लगी रहे तो उसमें मौजूद पानी में समय के साथ काई या दूसरी गंदगी जमा हो सकती है. इससे पानी की ट्रांसपिरेंसी कम होगी और कमरे में आने वाली रोशनी पर भी हो सकता है. इसी वजह से ऐसे सिस्टम में पानी को साफ रखने के लिए कुछ इंस्टॉलेशन में क्लोरीन या दूसरे ट्रीटमेंट का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि इसकी मात्रा और तरीका सिस्टम के डिजाइन के हिसाब से तय किया जाना चाहिए. घर पर बिना जानकारी के किसी भी केमिकल को पानी में मिलाना सही नहीं है.
इसे लगाने के लिए छत में करना पड़ता है छेद
ये जुगाड़ देखने में जितना आसान लगता है, इसका इंस्टॉलेशन उतनी ही सावधानी से करनी होता है. बोतल को छत से इस तरह फिट करना पड़ता है कि उसका कुछ हिस्सा बाहर धूप में रहे और कुछ हिस्सा कमरे के अंदर. इसके लिए छत में बोतल की शेप के हिसाब से जगह बनानी पड़ सकती है. सबसे जरूरी बात है कि बोतल के आसपास की जगह को पूरी तरह से सील करना होता है, ताकि बारिश का पानी कमरे में न पहुंचे.
इसके लिए वॉटरप्रूफ सीलेंट का इस्तेमाल किया जाता है. अगर आपकी छत आरसीसी, स्लैब या किसी खास स्ट्रक्चर की है, तो खुद से उसमें छेद करने के बजाय किसी एक्सपर्ट की मदद लेना ज्यादा सुरक्षित रहेगा.
घर की छत और इंटीरियर भी खराब नहीं होगा
अगर आपको लग रहा है कि छत में लगी प्लास्टिक की बोतल घर का लुक खराब कर देगी, तो इसे थोड़ा स्मार्ट तरीके से डिजाइन किया जा सकता है. कमरे के अंदर बोतल के आसपास राउंड डिफ्यूजर, फॉल्स सीलिंग बॉर्डर या डेकोरेटिव फ्रेम लगाया जा सकता है. इससे बोतल का निचला हिस्सा छिप जाएगा और कमरे में एक मॉडर्न स्काइलाइट जैसी रोशनी दिखाई दे सकती है. यानी सही डिजाइन के साथ ये सिर्फ बिजली बचाने वाला जुगाड़ नहीं, बल्कि कमरे के इंटीरियर का हिस्सा भी बन सकता है.
किन जगहों पर ज्यादा काम आ सकता है?
ये तरीका खास तौर पर उन जगहों के लिए फायदेमंद हो सकता है जहां दिन में प्राकृतिक रोशनी कम पहुंचती है. जैसे स्टोर रूम, छोटे वर्क एरिया, गैरेज या ऐसे कमरे जिनमें खिड़की नहीं है. हालांकि, इसे रात में बल्ब का ऑप्शन नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये पूरी तरह सूरज की रोशनी से ही काम करता है.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क