'बच्चे का पालन पोषण निजता के अधिकार का महत्वपूर्ण पहलू', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने एक केंद्रीय कर्मचारी की ओर से मातृत्व अवकाश के लिए दायर याचिका पर फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने महिला कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश देने के निर्देश दिए हैं और साथ ही ये भी कहा है कि बच्चे का पालन-पोषण निजता के अधिकार के महत्वपूर्ण पहलू हैं. 

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 29 अगस्त 2022,
  • अपडेटेड 1:04 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक रिश्तों की अहमियत को लेकर मामले में फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में परिवार के पारंपरिक अर्थ की व्याख्या की है और ये भी कहा है कि पारिवारिक संबंधों में अविवाहित भागीदारी या समलैंगिक संबंध भी शामिल हैं. असामान्य पारिवारिक इकाइयां भी कानून के तहत समान संरक्षण की हकदार हैं.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि कानून और समाज दोनों में परिवार की अवधारणा की प्रमुख समझ यह है कि इसमें माता और पिता और उनके बच्चों के साथ एक एकल, अपरिवर्तनीय इकाई होती है. यह कई परिस्थितियों में दोनों की उपेक्षा करती है. ये उपेक्षा किसी भी पारिवारिक ढांचे में बदलाव का कारण बन सकती हैं.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई घर पति या पत्नी की मृत्यु, अलगाव या तलाक सहित कई कारणों से एकल माता-पिता का घर हो सकता है. इसी तरह, बच्चों के अभिभावक और देखभाल करने वाले (जो पारंपरिक रूप से माता और पिता की भूमिका निभाते हैं) पुनर्विवाह, गोद लेने या पालन-पोषण के साथ परिवर्तन कर सकते हैं.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने अपे फैसले में ये भी कहा कि प्रेम और परिवारों की ये अभिव्यक्तियां विशिष्ट नहीं हो सकती हैं लेकिन वे अपने पारंपरिक समकक्षों की तरह वास्तविक हैं. परिवार की ऐसी असामान्य अभिव्यक्तियां समान रूप से योग्य हैं, न केवल कानून के तहत सुरक्षा के लिए बल्कि सामाजिक कल्याण कानून के तहत उपलब्ध लाभ के लिए भी.

सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी एक केंद्रीय कर्मचारी की ओर से मातृत्व अवकाश की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय कर्मचारी का मातृत्व अवकाश स्वीकृत करने के भी निर्देश दिए. कोर्ट ने कहा कि कानून के काले अक्षर को पारंपरिक लोगों से अलग वंचित परिवारों पर भरोसा नहीं करना चाहिए.

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बताया जाता है कि याचिकाकर्ता महिला के पति की पहली पत्नी से दो बच्चे थे. केंद्रीय कर्मचारी ने इन बच्चों के लिए चाइल्ड केयर लीव का लाभ लिया था. ऐसे में जब महिला कर्मचारी ने दूसरे बच्चे को जन्म दिया तब अधिकारियों ने उसे मातृत्व अवकाश देने से इनकार कर दिया था. महिला ने इसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि 1972 के नियमों के तहत मातृत्व अवकाश कार्यस्थल में महिलाओं की निरंतरता को सुविधाजनक बनाने के लिए है. यह एक कड़वी सच्चाई है कि इस तरह के प्रावधानों के लिए, कई महिलाओं को सामाजिक परिस्थितियों के कारण बच्चे के जन्म पर काम छोड़ने के लिए मजबूर किया जाएगा. बच्चे के जन्म को रोजगार के संदर्भ में जीवन की एक प्राकृतिक घटना के रूप में माना जाना चाहिए.

महिलाओं पर बच्चों की देखरेख का दबाव

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि महिलाओं पर हमेशा बच्चों की देखरेख  के काम का बोझ उठाने के लिए दबाव डाला जाता है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ( OECD) के एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि भारत में महिलाएं प्रति दिन 352 मिनट तक अवैतनिक काम पर खर्च करती हैं, जो पुरुषों की ओर से खर्च किए गए समय से 577% अधिक है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन और बच्चे के पालन-पोषण का अधिकार, निजता और गरिमा के अधिकार के महत्वपूर्ण पहलू हैं.

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