जापानी छात्र हिरोतोशी तानाका अंग्रेजी सीखने और भारतीय जीवन का अनुभव लेने के लिए साल 2019 में बेंगलुरू आए थे. 36 साल के तानाका की यात्रा काफी अजीबोगरीब कानूनी दांव-पेच और विवादों से भरी रही. हाल ही में कर्नाटक सरकार ने तानाका को 75,000 रुपये का मुआवजा दिया है.
जापान के शिज़ुआका के रहने वाले मनोविज्ञान स्नातक तानाका ने बेंगलुरू की एक प्राइवेट एकेडमी में एडमिशन लिया था. इस दौरान उनका क्लासेज के अनियमित संचालन को लेकर एकेडमी हेड से विवाद हो गया था. बहस बढ़ने पर तानाका ने अपना आपा खो दिया और एकेडमी प्रमुख को घूंसा मार दिया था.
RT नगर पुलिस ने इस मामले मेंमारपीट का मामला दर्ज किया और अपराध जमानती होने के बावजूद 23 नवंबर 2019 को तानाका को गिरफ्तार कर बेंगलुरू सेंट्रल जेल भेज दिया. यहां उन्हें 11 दिसंबर तक रखा गया था.
राज्य मानवाधिकार आयोग ने पाया था कि पुलिस ने तानाका को 19 दिनों तक बिना गलती के न्यायिक हिरासत में रखा था. तानाका ने बताया कि उन्हें भारतीय कानूनी प्रणाली, वकील या जमानत जैसी प्रक्रियाओं की कोई जानकारी नहीं थीय इसके अलावा, ADHD और अनिद्रा की दवा न मिलने से जेल में उनकी हालत बिगड़ गई.
जेल में ही उन्हें हत्या के आरोप में बंद 'शंकर' नाम का एक साथी मिला, जिसने उनकी मदद की. 2 नवंबर 2020 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों में समझौते के बाद इस FIR को रद्द कर दिया.
पुलिस पर रिश्वत मांगने का आरोप
जेल से छूटने के बाद तानाका ने आरोप लगाया कि एक पुलिस अधिकारी ने मामला रफा-दफा करने के लिए उनसे रिश्वत मांगी. तानाका के पिता जापान में पुलिस अधिकारी हैं, इसलिए उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का फैसला किया. पैसों की तंगी के कारण उन्हें आरटी नगर पार्क और पुलिस स्टेशन परिसर में सोकर रातें बितानी पड़ीं. बाद में उन्होंने कर्नाटक राज्य मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई.
गिरफ्तारी के लिए चुराई पुलिस की कुर्सी
मानवाधिकार आयोग में मामला लंबित रहने के दौरान ही विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) ने उन्हें 28 फरवरी 2021 तक भारत छोड़ने का निर्देश दिया. तानाका मानवाधिकार सुनवाई में शामिल होने के लिए भारत में ही रुकना चाहते थे.
वीजा और पैसों की समस्या से निपटने के लिए उन्होंने 28 फरवरी 2021 को जेसी नगर एसीपी कार्यालय से प्लास्टिक की एक सफेद कुर्सी उठा ली. उन्होंने कुर्सी के साथ सेल्फी ली और उसे अपने कमरे पर ले आए. उनका मकसद चोरी करना नहीं था, बल्कि खुद को जानबूझकर गिरफ्तार करवाना था ताकि वो कानूनी प्रक्रिया के तहत भारत में रुक सकें. हालांकि, बाद में उन्हें अप्रैल 2021 में वापस जापान भेज दिया गया.
7 साल बाद मिला मानवाधिकार का इंसाफ
जापान लौटने के बाद भी तानाका ने अपने वकील रोहन कोठारी के माध्यम से कानूनी लड़ाई जारी रखी. 9 मई 2022 को मानवाधिकार आयोग ने माना कि आरटी नगर पुलिस ने जमानती अपराध में 'गलत गिरफ्तारी' की थी. आयोग ने 75,000 रुपये मुआवजे और दोषी पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई की सिफारिश की.
मामले के निपटारे में देरी होने पर तानाका ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. आखिरकार जून 2026 में राज्य सरकार ने मुआवजे की रकम उनके वकील को ट्रांसफर कर दी, जिसे तानाका की भारतीय पत्नी के खाते में भेज दिया गया.
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सात सालों की इस लंबी कानूनी लड़ाई के बाद तानाका अब ब्लैकलिस्ट से अपना नाम हटवाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो अपनी भारतीय पत्नी के साथ उनके होमटाउन पूर्वोत्तर भारत आ सकें.
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