कार या प्लेन से सफर करते समय हमेशा सीट बेल्ट लगाना पड़ता है. गाड़ी में सीट बेल्ट नहीं लगाने पर चालान भी कट जाता है. क्योंकि, किसी भी दुर्घटना या अचानक से ब्रेक लगने की स्थित में सीट बेल्ट हमारी सुरक्षा करता है. फिर ट्रेन की सीट में बेल्ट क्यों नहीं लगे होते हैं? कई बार यह सवाल आप में से कईयों के मन में उठता होगा. बता दें कि हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन में भी सीट बेल्ट नहीं लगे होते. चलिए जानते हैं इसकी वजह आखिर क्या है?
कार या किसी भी गाड़ी की सीट में लगा बेल्ट हमें वाहन की टक्कर या हादसे जैसी स्थिति में क्रैश फोर्स से काफी हद तक बचाता है. किसी भी गाड़ी का क्रैश फोर्स यानी टकराव का असर इस बात पर निर्भर करता है कि गाड़ी कितनी जल्दी रुकती है.
इस वजह से नहीं लगी होती है सीट बेल्ट
रीडर डाइजेस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, एक्सपर्ट बताते हैं कि ईंट की दीवार से टकराने वाली कार लगभग तुरंत रुक जाती है. इससे बहुत ज़्यादा क्रैश फोर्स पैदा होता है. ट्रेन में इसके उलट होता है. यह बहुत बड़ी और भारी होती है और हल्की चीजों से टकराने पर इसका क्रैश फोर्स बहुत कम होता है. इसका मतलब है कि इसका असर कार एक्सीडेंट में होने वाले असर से बहुत अलग होता है. इसलिए इसके लिए उसी तरह के रेस्ट्रेंट सिस्टम की ज़रूरत नहीं होती है.
यानी ट्रेन में कार या दूसरी छोटी गाड़ियों की तरह सीट बेल्ट लगाने की जरूरत नहीं होती है. बेशक, इसके अपवाद भी हैं. क्योंकि, दो ट्रेनों के बीच आमने-सामने की टक्कर, या ट्रेन के पटरी से उतरने से बहुत ज़्यादा क्रैश फोर्स पैदा होगा, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है.
क्योंकि ट्रेनें दूसरे ट्रांसपोर्ट के तरीकों के मुकाबले ज्यादा कंट्रोल वाले माहौल में चलती हैं और एक्सीडेंट कम होते हैं. इसलिए सेफ्टी के लिए जरूरी है कि भारी टक्कर और पटरी से उतरने से बचा जाए.ट्रेन से सफर करना कार से सफर करने से 17 गुना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है.
वहीं अगर फ्लाइट से तुलना करें, तो ट्रेन से सफर हर ट्रिप के हिसाब से ज्यादा सुरक्षित है, लेकिन हर दूरी के हिसाब से, प्लेन को ट्रेनों से ज़्यादा सुरक्षित माना जाता है. कहा जाता है कि, प्लेन और ट्रेन दोनों ही कारों और बसों के मुकाबले आंकड़ों के हिसाब से ज़्यादा सुरक्षित हैं.
क्या ट्रेन की सीटों में भी सीट बेल्ट होना चाहिए
ट्रेनों में सीट बेल्ट होनी चाहिए या नहीं, यह सोच का मामला है. यह रिस्क लेने की क्षमता पर निर्भर करता है और अब तक,रेगुलेटर्स ने रिस्क को इतना ज़्यादा नहीं माना है कि उन्हें जरूरी बनाया जाए. फिर भी ट्रेन की सीटों में बेल्ट नहीं लगाने की और भी कई वजहें हैं.
अभी ट्रेन की सीटें जिस तरह से डिजाइन की जाती हैं. वह उस तरह की सीट बेल्ट के लिए काम नहीं करेंगी जो ट्रेनों के लिए असरदार हो सकती हैं. इसलिए ट्रेनों में सीट बेल्ट लगाने के लिए महंगा रीडिज़ाइन करना होगा. घटनाओं की कम संख्या को देखते हुए, संभावित फायदा शायद लागत के लायक नहीं हो.
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भले ही ट्रेनों में सीट बेल्ट लगाने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए जाएं, लेकिन हो सकता है कि लोग उनका इस्तेमाल न करें. खासकर उन ट्रेनों में जो अक्सर रुकती हैं. अगर पैसेंजर सीट बेल्ट का इस्तेमाल करते भी हैं, तो बार-बार सीट बेल्ट लगाने और खोलने से चीजें धीमी हो सकती हैं. इससे सर्विस में देरी जैसी दूसरी दिक्कतें हो सकती हैं. ट्रेन एक्सीडेंट बहुत कम होते हैं, इसलिए ऐसा बदलाव करना समझदारी नहीं है जिससे सर्विस पर इतना बड़ा असर पड़े.
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