थाईलैंड में बच्चे की ज्यादा तारीफ करने से क्यों डरते हैं लोग? 'बहुत प्यारा है' कहने के बजाय बोलते हैं- कितना बदसूरत है!

दुनिया में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो सुनने में बेहद अजीब लगती हैं. थाईलैंड में कुछ परिवार छोटे बच्चों की ज्यादा तारीफ करने से बचते हैं. यहां तक कि बच्चे को सुंदर कहने के बजाय बदसूरत तक बोल देते हैं. इसके पीछे मान्यता है कि सुंदर बच्चों की तारीफ सुनकर बुरी आत्माएं उनकी तरफ आकर्षित हो सकती हैं.

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जानिए इस अनोखी परंपरा के पीछे की वजह. ( Photo: ITG) जानिए इस अनोखी परंपरा के पीछे की वजह. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:11 PM IST

आमतौर पर जब कोई छोटा बच्चा सामने आता है, तो लोग उसे देखकर प्यार से कहते हैं- कितना प्यारा बच्चा है, कितनी सुंदर आंखें हैं या कितना क्यूट है. बच्चे की तारीफ सुनकर उसके माता-पिता भी खुश हो जाते हैं. लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जहां कुछ परिवारों में छोटे बच्चों की जरूरत से ज्यादा तारीफ करने से बचा जाता है. यहां तक कि अगर कोई बच्चा बहुत सुंदर दिख रहा हो, तो लोग उसे प्यार से बदसूरत तक कह देते हैं.

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यह देश है थाईलैंड. यहां की एक पुरानी मान्यता के मुताबिक, अगर किसी नवजात बच्चे या छोटे बच्चे की बहुत ज्यादा तारीफ की जाए, तो बुरी आत्माओं का ध्यान उसकी तरफ जा सकता है. माना जाता है कि ये आत्माएं सुंदर और प्यारे बच्चों को नुकसान पहुंचा सकती हैं या उन्हें अपने साथ ले जा सकती हैं. इसी डर से कुछ परिवार बच्चों की सुंदरता की तारीफ करने के बजाय उल्टा उन्हें बदसूरत, मोटा या शरारती कह देते हैं. सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे बच्चों को बुरी नजर और बुरी आत्माओं से बचाने की एक पुरानी सांस्कृतिक मान्यता जुड़ी हुई है. हालांकि, यह परंपरा थाईलैंड के हर परिवार में नहीं निभाई जाती. खासतौर पर कुछ पारंपरिक और बुजुर्ग परिवारों में आज भी इसका असर देखने को मिलता है.

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बच्चे को सुंदर कहना क्यों माना जाता है खतरा?
थाईलैंड की पुरानी लोक मान्यताओं में माना जाता है कि नवजात बच्चे बहुत नाजुक होते हैं. वे खुद अपनी रक्षा नहीं कर सकते और उन्हें बुरी शक्तियों से बचाने की जरूरत होती है. कुछ लोगों का विश्वास है कि बुरी आत्माएं सुंदर और आकर्षक चीजों की तरफ जल्दी खिंचती हैं. ऐसे में अगर किसी बच्चे की बार-बार तारीफ की जाए और उसे बहुत सुंदर बताया जाए, तो इन आत्माओं का ध्यान उसकी तरफ जा सकता है. लोगों को डर रहता है कि कहीं ऐसी आत्माएं बच्चे को बीमार न कर दें या उसे किसी तरह का नुकसान न पहुंचाएं. 

इसी वजह से कुछ परिवारों में बच्चे की तारीफ करने से बचा जाता है. अगर कोई मेहमान बच्चे को देखकर कहे कि यह बहुत सुंदर है, तो घर के बड़े लोग कभी-कभी जवाब में कह देते हैं कि नहीं, यह तो बिल्कुल सुंदर नहीं है. उनका ऐसा कहना बच्चे का अपमान करना नहीं होता, बल्कि मान्यता के अनुसार उसे बुरी आत्माओं की नजर से बचाने का एक तरीका होता है.

बच्चे को प्यार से बदसूरत क्यों कहते हैं?
थाईलैंड में कुछ परिवारों में बच्चों को प्यार से ऐसे नाम दिए जाते हैं, जो सुनने में बिल्कुल अच्छे नहीं लगते. मसलन, किसी बच्चे को मोटू, छोटू, मेंढक या सुअर जैसे नामों से बुलाया जा सकता है. इसके पीछे भी वही पुरानी मान्यता है. माना जाता है कि अगर बच्चे को बहुत सुंदर नाम दिया जाए या उसकी खूब तारीफ की जाए, तो बुरी आत्माएं उसकी तरफ आकर्षित हो सकती हैं. इसके उलट अगर बच्चे को साधारण या अजीब नाम से बुलाया जाए, तो आत्माओं को लगेगा कि वह कोई खास बच्चा नहीं है.

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इस तरह बच्चे की असली पहचान और सुंदरता को छिपाने की कोशिश की जाती है. थाईलैंड में इस तरह के छोटे नामों को निकनेम कहा जाता है. वहां कई लोग अपने आधिकारिक नाम के अलावा रोजमर्रा की जिंदगी में अलग निकनेम का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, आज के समय में ये नाम सिर्फ अंधविश्वास की वजह से नहीं रखे जाते. कई परिवारों में ये सामान्य पारिवारिक परंपरा का हिस्सा भी हैं.

मां-बाप भी क्यों छिपाते हैं बच्चे की खूबसूरती?
इस परंपरा में सिर्फ दूसरे लोगों को ही नहीं, बल्कि माता-पिता को भी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है. माना जाता है कि अगर माता-पिता खुद अपने बच्चे की बहुत ज्यादा तारीफ करेंगे, तो भी बुरी आत्माओं का ध्यान उसकी तरफ जा सकता है. इसी वजह से कुछ परिवारों में बच्चे की सुंदरता को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया जाता. अगर कोई रिश्तेदार बच्चे को बहुत सुंदर कहता है, तो माता-पिता भी मजाक में या परंपरा के अनुसार उसे बदसूरत बता सकते हैं.

कुछ परिवारों में बच्चे के माथे या चेहरे पर काजल का छोटा सा टीका भी लगाया जाता है. इसका मकसद बच्चे की खूबसूरती को थोड़ा छिपाना और बुरी नजर से बचाना माना जाता है. हालांकि, यह तरीका हर परिवार में अपनाया जाता हो, ऐसा नहीं है.

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पहले के समय में बच्चों को लेकर ज्यादा था डर
थाईलैंड में बच्चों को बुरी आत्माओं से बचाने से जुड़ी कई पुरानी मान्यताएं रही हैं. पहले के समय में प्रसव के दौरान मां और बच्चे की जान को ज्यादा खतरा रहता था. मेडिकल सुविधाएं भी आज जितनी बेहतर नहीं थीं. कई बार नवजात बच्चों की मौत हो जाती थी. उस समय कुछ परिवार इन घटनाओं को बुरी आत्माओं से जोड़कर देखते थे. ऐसे में बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग धार्मिक और पारंपरिक तरीके अपनाए जाने लगे.

थाई संस्कृति से जुड़े एक लेख के मुताबिक, पहले कुछ परिवार बच्चों को ऐसे नाम भी देते थे, जिनका मतलब जानबूझकर अच्छा नहीं रखा जाता था. माना जाता था कि इससे बुरी आत्माएं बच्चे में दिलचस्पी नहीं लेंगी.

क्या आज भी थाईलैंड में लोग ऐसा करते हैं?
आज थाईलैंड काफी आधुनिक देश है. वहां के युवा पढ़ाई, नौकरी और तकनीक के मामले में दुनिया के दूसरे देशों की तरह आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन आधुनिक जीवनशैली के बावजूद कुछ पुरानी परंपराएं परिवारों में अब भी बनी हुई हैं. खासतौर पर बुजुर्ग लोग नवजात बच्चों को लेकर इन मान्यताओं का पालन करते दिखाई दे सकते हैं. वहीं, नई पीढ़ी के कई लोग इसे सिर्फ एक पुरानी सांस्कृतिक परंपरा या मजेदार पारिवारिक आदत की तरह देखते हैं.

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यह भी समझना जरूरी है कि बच्चे की तारीफ करने से किसी बुरी आत्मा के आने या बच्चे को नुकसान पहुंचने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. यह थाईलैंड की लोक मान्यता और सांस्कृतिक विश्वास से जुड़ी बात है. यानी जहां भारत में बच्चे को देखकर लोग प्यार से कहते हैं कि कितना प्यारा है, वहीं थाईलैंड के कुछ पारंपरिक परिवारों में उसे बदसूरत कहना भी प्यार जताने का एक तरीका हो सकता है. सुनने में अजीब जरूर है, लेकिन इसके पीछे माता-पिता की अपने बच्चे को सुरक्षित रखने की भावना जुड़ी हुई है.

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