पुराने टायर खरीदने वाले देशों में भारत भी शामिल है. पिछले कुछ वर्षों में अमीर देशों से भारी मात्रा में टायर के कबाड़ खरीदे गए हैं और साल दर साल इसमें इजाफा होता जा रहा है. आखिर भारत बेकार टायरों को क्यों आयात कर रहा है? किन- किन देशों से बेकार टायर खरीदे जाते हैं? हर साल कितने टायर दूसरे देशों से खरीदे जाते हैं और इन टायरों का क्या होता है? चलिए जानते हैं इन सवालों का जवाब.
समुद्र पार से स्क्रैप टायर समुद्री मार्गों से गुजरात, मुंबई और चेन्नई स्थित तीन प्रमुख बंदरगाहों के माध्यम से भारत में भेजे जाते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आयातित बेकार टायरों का 70% से अधिक हिस्सा इन्हीं प्रमुख बंदरगाहों के माध्यम से प्रवेश करता है. बंदरगाहों पर, ये टायर प्रतिदिन आते हैं. कागज पर तो इन्हें रिसाइकिल के लिए रखा जाता है, लेकिन असलियत में इनका एक काला रहस्य है.
यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे विकसित देश और कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश, जो बेकार टायरों की समस्या से जूझ रहे थे, अब भारत को बेकार स्क्रैप बेच रहे हैं. भारत ने पिछले साल 18 लाख मीट्रिक टन से अधिक बेकार टायर आयात किए. ये स्क्रैप टायर मुख्य रूप से ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, इटली, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया से लाए गए थे.
भारत तक कैसे पहुंचते हैं स्क्रैप टायर
ब्रिटेन स्थित एक एनजीओ , जिसने बीबीसी के साथ मिलकर ब्रिटेन से भारत में स्क्रैप टायर कैसे आते हैं और उनका यहां क्या होता है, इस पर काम किया है. इनकी दो रिपोर्टों में पता चला कि 2023 और 2024 में रियूज्ड होने, सेकंडहैंड टायर मार्केट में जाने और रिसाइकिल होने के बाद जो स्क्रैप टायर बच गए उन्हें मध्यप्रदेश और मुंबई जैसे टीपीओ (टायर पायरोलिसिस तेल)संयंत्रों में पहुंचा दिया गया. जहां टायर को जलाकर पायरोलिसिस तेल बनाया जाता है. इस तेल का इस्तेमाल कहां होता है, ये जानने से पहले समझते हैं कि कैसे टायरों का कबाड़ भारत तक पहुंचता है और इसका इस्तेमाल कहां- कहां होता है.
बंदरगाहों पर उतारने के बाद, टायरों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है. पहले उन टायरों को छांट लिया जाता है अच्छी स्थिति में होते हैं. ऐसे टायरों को चुपचाप पुराने टायरों के व्यापारियों को मरम्मत के लिए बेच दिया जाता है. ये टायर जल्द ही भारतीय सड़कों पर वापस नजर आने लगते हैं.
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दूसरा बैच, यानी क्षतिग्रस्त और डैमेज टायर होते हैं. ऐसे लॉट को रिसाइकिल के लिए भेज दिया जाता है. इसके बाद भी भारी मात्रा में जो टायर बच जाते हैं, उन्हें पायरोलिसिस प्लांट में जलाकर तेल बनाने के लिए बेच दिया जाता है. इस प्लांट में ही स्क्रैप टायरों की सबसे ज्यादा मांग होती है.
रिसाइकिल के अलावे स्क्रैप टायर यहां होते हैं यूज
जब टायरों के बंडल बंदरगाह पर पहुंचते हैं, तो भारत में सेकंडहैंड टायर के खरीदार अपनी जरूरतों के हिसाब से स्क्रैप खरीदते हैं. कई बार ऊंची कीमतों पर बेचने के लिए नीलामी भी की जाती है. लगभग 30% टायर वाहनों में दोबारा लगाने लायक होते हैं. इनसे अच्छा मुनाफा मिलता है. बाकी 70% में से उन टायरों को अलग कर लेते हैं जिन्हें वर्कशॉप में ठीक करके सेकंड-हैंड टायरों के रूप में बेचा जा सकता है. बाकी टायर सीधे पायरोलिसिस संयंत्रों में भेज दिए जाते हैं.
2024 में, भारत ने कुल 30 लाख मीट्रिक टन बेकार टायरों को रिसाइकिल किया. इसमें से 16 लाख मीट्रिक टन टायर घरेलू स्तर पर उत्पादित हुए थे, जबकि 14 लाख मीट्रिक टन आयात किए गए. हालांकि, बेकार टायरों के रिसाइकिल करने की भारत की वर्तमान क्षमता 28.76 लाख मीट्रिक टन है. 2024-25 में रिसाइकिल के लिए घरेलू और आयातित टायरों की संख्या को मिलाकर, भारत के पास 43 लाख मीट्रिक टन बेकार टायर थे. ऐसे में बाकी बचे टायरों को जलाकर उससे पायरोलिसिस ऑयल बनाए जाते हैं. इस प्रोसेस में काफी प्रदूषण फैलता है.
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पायरोलिसिस तेल हाईड्रोकार्बन से भरपूर होते हैं. इसका इस्तेमाल इंडस्ट्रियल काम में होता है. बड़े- बड़े बॉयलर, भट्टे, बिजली प्लांट में इंधन के रूप में किया जाता है. जहां हाई हीट की जरूरत होती है, वहां इसी तेल का इस्तेमाल किया जाता है. केमिकल इंडस्ट्री में इसकी काफी ज्यादा मांग होती है. यह इंडस्ट्रियल डीजल का तगड़ा विकल्प माना जाता है.
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