उज्जैन में भगवान हनुमान की एक प्रतिमा इन दिनों काफी चर्चा में है. वजह यह है कि सड़क चौड़ीकरण के लिए मंदिर का ढांचा हटाए जाने के बाद भी हनुमान जी की प्रतिमा अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई. प्रशासन ने इसे दूसरी जगह ले जाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन भारी मशीनों और दूसरे प्रयासों के बावजूद मूर्ति नहीं हिली. इसके बाद श्रद्धालु इसे भगवान का चमत्कार मान रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ इसके पीछे पत्थर और प्रतिमा की बनावट को बड़ी वजह बता रहे हैं.
कहां की है यह प्रतिमा?
यह मामला मध्य प्रदेश के उज्जैन में सती गेट के पास स्थित प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर का है. कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ी करने का काम चल रहा है. इसी वजह से मंदिर के मुख्य ढांचे को हटाया गया. इसके बाद प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती हनुमान जी की प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह ले जाने की थी.
प्रतिमा को हटाने की कई कोशिशें की गईं, लेकिन वह अपनी जगह पर मजबूती से खड़ी रही. अब प्रशासन जल्दबाजी में कोई कदम उठाने के बजाय विशेषज्ञों की मदद ले रहा है, ताकि प्रतिमा को नुकसान न पहुंचे. इसके लिए तकनीकी स्कैनिंग भी कराई गई है और IIT इंदौर के विशेषज्ञों से भी मदद ली जा रही है.
आखिर क्या है बेसाल्ट पत्थर?
विशेषज्ञों के मुताबिक यह प्रतिमा बेसाल्ट पत्थर से बनी हो सकती है. बेसाल्ट एक बेहद मजबूत और भारी चट्टान है. यह ज्वालामुखी से निकलने वाले गर्म लावे के ठंडा होकर जमने से बनती है. इसलिए इसकी मजबूती काफी अधिक होती है. मालवा क्षेत्र में बेसाल्ट पत्थर बड़ी मात्रा में पाया जाता है. पुराने समय में इसी तरह के मजबूत पत्थरों से मंदिरों, मूर्तियों और दूसरी संरचनाओं को बनाने की परंपरा रही है. विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, यह प्रतिमा मालवा के विशेष बेसाल्ट पत्थर से बनी हो सकती है और इसकी शिल्प परंपरा का संबंध परमार काल से जोड़ा जा रहा है.
मूर्ति आखिर हिल क्यों नहीं रही?
इसका एक कारण सिर्फ पत्थर का भारी होना नहीं माना जा रहा. विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्रतिमा को जमीन में किसी प्राचीन इंटरलॉकिंग या लॉकिंग तकनीक से स्थापित किया गया हो सकता है. यानी प्रतिमा का जमीन के अंदर वाला हिस्सा ऊपर दिखाई देने वाले हिस्से से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है. सरल भाषा में समझें तो संभव है कि मूर्ति को इस तरह से जमीन में जमाया गया हो कि उसका आधार आसपास की संरचना के साथ मजबूती से लॉक हो गया हो. ऐसे में ऊपर से मशीन लगाकर उसे खींचना आसान नहीं होगा. इसके अलावा बेसाल्ट पत्थर काफी मजबूत और भारी होता है. इसलिए प्रतिमा को जबरदस्ती खींचने या उठाने की कोशिश में उसके टूटने या उसमें दरार आने का खतरा भी हो सकता है.
बेसाल्ट पत्थर कहां मिलता है?
बेसाल्ट एक काला या गहरे रंग का मजबूत पत्थर है. यह एक तरह की आग्नेय चट्टान (Igneous Rock) है, यानी इसका निर्माण ज्वालामुखी से निकलने वाले गर्म लावे के ठंडा होकर जमने से हुआ है. इसलिए बेसाल्ट पत्थर ज्यादातर उन्हीं जगहों पर मिलता है, जहां कभी बहुत ज्यादा ज्वालामुखीय गतिविधि हुई थी.
भारत में कहां मिलता है बेसाल्ट?
cकरोड़ों साल पहले यहां बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी फटे थे. इनसे निकला लावा ठंडा होकर मोटी चट्टानों में बदल गया. इसी वजह से महाराष्ट्र और आसपास के कई इलाकों में बेसाल्ट बड़ी मात्रा में पाया जाता है. महाराष्ट्र बेसाल्ट के लिए सबसे प्रमुख राज्यों में से एक है. राज्य के कई हिस्सों में जमीन के नीचे बेसाल्ट की चट्टानें मौजूद हैं. कोल्हापुर, यवतमाल और नांदेड़ जैसे इलाकों में भी बेसाल्ट चट्टानें मिलती हैं. मुंबई की मशहूर गिल्बर्ट हिल भी बेसाल्ट से बनी एक चट्टानी संरचना है.
महाराष्ट्र में मौजूद एलोरा की गुफाएं और कैलाश मंदिर भी बेसाल्ट चट्टान को काटकर बनाए गए हैं. खास बात यह है कि कैलाश मंदिर को एक बड़ी चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर काटकर तैयार किया गया था. मध्य प्रदेश के मालवा और आसपास के क्षेत्रों में भी बेसाल्ट बड़ी मात्रा में पाया जाता है. यहां कई जगहों पर जमीन के नीचे काले रंग की बेसाल्ट चट्टानें मिलती हैं. इसके अलावा गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी बेसाल्ट पाया जाता है. तेलंगाना के आदिलाबाद क्षेत्र में भी पुरानी बेसाल्ट चट्टानों के उदाहरण मिले हैं. झारखंड की राजमहल पहाड़ियों में भी बेसाल्ट की चट्टानें मौजूद हैं.
कर्नाटक के पास सेंट मैरी द्वीप (St. Mary's Island) अपनी खास बेसाल्ट चट्टानों के लिए प्रसिद्ध है. यहां बेसाल्ट की चट्टानें छह कोनों वाले खंभों जैसी दिखाई देती हैं. इन्हें हेक्सागोनल बेसाल्ट कॉलम कहा जाता है. यह जगह अपनी अनोखी भूगर्भीय संरचना के कारण काफी खास मानी जाती है.
समुद्र के नीचे भी मौजूद है बेसाल्ट
बेसाल्ट सिर्फ जमीन पर ही नहीं मिलता. समुद्र और महासागर के नीचे मौजूद समुद्री तल (Ocean Floor) का बड़ा हिस्सा भी बेसाल्ट चट्टानों से बना है. जब समुद्र के नीचे ज्वालामुखी से लावा निकलता है और ठंडा होता है, तो वह बेसाल्ट की चट्टान में बदल जाता है. इसी वजह से वैज्ञानिक बेसाल्ट को पृथ्वी की सबसे आम आग्नेय चट्टानों में से एक मानते हैं. भारत के अलावा आइसलैंड, अमेरिका, इटली और जर्मनी जैसे देशों में भी बेसाल्ट की चट्टानें बड़ी मात्रा में मिलती हैं. अमेरिका का कोलंबिया रिवर बेसाल्ट क्षेत्र भी इसका एक बड़ा उदाहरण है.
मंगल ग्रह पर भी मिलता है बेसाल्ट
बेसाल्ट की खास बात यह है कि यह सिर्फ हमारी पृथ्वी पर ही नहीं पाया जाता. वैज्ञानिकों को चंद्रमा, मंगल और शुक्र जैसे दूसरे खगोलीय पिंडों पर भी बेसाल्ट जैसी चट्टानों और पुराने लावा के मैदानों के प्रमाण मिले हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, मंगल ग्रह की सतह पर कभी बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी गतिविधियां हुई थीं. इस दौरान निकलने वाला लावा ठंडा होकर बेसाल्ट चट्टानों में बदल गया.
नासा की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगल ग्रह पर लावा से बने बहुत बड़े बेसाल्टिक मैदान पाए गए हैं. इन चट्टानों में पृथ्वी पर मिलने वाले बेसाल्ट से कई समानताएं दिखाई देती हैं. वैज्ञानिक इन चट्टानों का अध्ययन करके मंगल ग्रह के पुराने ज्वालामुखियों और वहां के वातावरण के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं.
क्या सच में 1000 साल पुरानी है प्रतिमा?
इस प्रतिमा को करीब 1000 साल पुराना बताए जाने की चर्चा भी हो रही है. इसे परमार काल और राजा भोज के समय की शिल्प परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि अभी इसकी उम्र को लेकर अंतिम वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है. इसकी सही उम्र और निर्माण तकनीक पता लगाने के लिए विशेषज्ञों की जांच जरूरी है.
श्रद्धालु इसे चमत्कार क्यों मान रहे हैं?
जब लगातार कोशिशों के बाद भी प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली तो श्रद्धालुओं के बीच इसे लेकर आस्था और बढ़ गई. कई लोग इसे भगवान हनुमान का संकेत और चमत्कार मान रहे हैं. मंदिर के आसपास भक्तों की भीड़ भी बढ़ने लगी है. वहीं विशेषज्ञों का नजरिया अलग है. उनके मुताबिक किसी प्रतिमा का न हिलना अपने आप में चमत्कार साबित नहीं करता. इसके पीछे उसका वजन, पत्थर की मजबूती, जमीन के अंदर की संरचना और उसे स्थापित करने की पुरानी तकनीक जैसे वैज्ञानिक कारण हो सकते हैं.
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल प्रशासन प्रतिमा को नुकसान पहुंचाकर हटाने के पक्ष में नहीं है. पहले यह पता लगाया जा रहा है कि प्रतिमा जमीन के अंदर कितनी गहराई तक गई है और उसका आधार किस तरह बना हुआ है. IIT इंदौर के विशेषज्ञों ने भी प्रतिमा की नींव और आसपास की जमीन की तकनीकी जांच की है. स्कैनिंग और विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने के बाद ही तय किया जाएगा कि प्रतिमा को हटाना संभव है या नहीं और अगर हटाना है तो किस तरीके से हटाया जाए. कोशिश यही है कि सड़क चौड़ीकरण का काम भी हो और सदियों पुरानी मानी जा रही इस प्रतिमा को किसी तरह का नुकसान भी न पहुंचे.
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