दिल्ली में सरकारी दफ्तरों के बीच एक ऐसी मस्जिद है, जो देश की आजादी से भी पुरानी है. इसके आसपास आज केंद्र सरकार के कई बड़े मंत्रालयों के दफ्तर हैं, लेकिन जब यहां ये सरकारी इमारतें नहीं बनी थीं, तब भी यह मस्जिद मौजूद थी. इसका नाम है कदीमी मस्जिद.
अब सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत इसके भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं. केंद्र सरकार इसे हटाना चाहती है, जबकि मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी इसे ऐतिहासिक और पुराना धार्मिक स्थल बताते हुए सुरक्षा की मांग कर रही है. मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है.
दिलचस्प बात यह है कि जिस जगह आज कृषि भवन बना है, वहां मस्जिद पहले से मौजूद थी. अब इसी परिसर में नए सरकारी भवन बनाए जाने हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सरकारी दफ्तरों के बीच यह मस्जिद कैसे बनी? इसकी उम्र कितनी है और केंद्र सरकार इसे क्यों हटाना चाहती है? आइए समझते हैं पूरा मामला.
क्या है कदीमी मस्जिद का इतिहास?
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, कदीमी मस्जिद नई दिल्ली के कृषि भवन परिसर में स्थित है. यह जगह सेंट्रल सेक्रेटेरिएट के इलाके में आती है और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद रोड पर है. मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी का दावा है कि यह 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है. यानी इसका निर्माण देश की आजादी से पहले हुआ था.
सितंबर 2026 में मस्जिद की सुरक्षा की मांग को लेकर इसकी देखरेख करने वाली कमेटी ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. कमेटी ने अदालत में कहा कि मस्जिद के अस्तित्व के दस्तावेज 1945 तक के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में मिलते हैं. भारत को आजादी 1947 में मिली थी. यानी मस्जिद के मौजूद होने के सबूत आजादी से कम से कम दो साल पहले के हैं.
'कदीमी' उर्दू भाषा का शब्द है, जिसका मतलब होता है पुराना या प्राचीन. याचिका पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने भी अदालत में कहा कि यह मस्जिद काफी पुरानी है और एक सदी से ज्यादा समय से मौजूद है. उन्होंने दलील दी कि मस्जिद का अस्तित्व मौजूदा सरकारी परिसर के बनने से पहले का है.
कमेटी के मुताबिक, दिल्ली वक्फ बोर्ड ने साल 1970 में इस संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया था और इसके पुराने होने का भी रिकॉर्ड दर्ज किया था.
सरकारी दफ्तर बनने से पहले से थी मस्जिद
मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी का कहना है कि जब 1950 और 1960 के दशक में कृषि भवन, शास्त्री भवन और आसपास की दूसरी सरकारी इमारतें बनाई जा रही थीं, तब भी यह मस्जिद वहां मौजूद थी.
आज कृषि भवन में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय समेत कई सरकारी विभागों के दफ्तर हैं. इनमें कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, ग्रामीण विकास विभाग और पशुपालन एवं डेयरी विभाग भी शामिल हैं.
कमेटी का कहना है कि कृषि भवन और आसपास के सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारी लंबे समय से इस मस्जिद में नमाज पढ़ते आए हैं. कामकाज के दौरान नमाज अदा करने के लिए यह उनके लिए एक स्थापित जगह बन चुकी है.
अपनी याचिका में कमेटी ने संविधान के अनुच्छेद 25 का भी हवाला दिया है. यह अनुच्छेद हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आजादी देता है. हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसी संवैधानिक शर्तों के अधीन है.
1940 के समझौते में क्या लिखा है?
इस मस्जिद के इतिहास में 8 नवंबर 1940 की एक अहम तारीख सामने आती है. केंद्र सरकार ने अदालत में इसी तारीख के एक समझौते का हवाला दिया है. सरकार के मुताबिक, उस समय के प्रशासन और जामा मस्जिद मैनेजिंग कमेटी के सचिव के बीच यह समझौता हुआ था. इसके तहत कमेटी को सरकारी जमीन पर मस्जिद के इस्तेमाल की अनुमति दी गई थी.
यानी सरकार ने जमीन कमेटी को इस्तेमाल करने के लिए दी थी, लेकिन उसका मालिकाना हक नहीं दिया था.
समझौते में कुछ शर्तें भी रखी गई थीं. इसके मुताबिक, कमेटी सरकार की लिखित अनुमति के बिना मस्जिद की इमारत में बदलाव नहीं कर सकती थी. न ही उसकी मरम्मत करा सकती थी या वहां कोई नई इमारत अथवा कब्र बना सकती थी. अगर कमेटी इन शर्तों का उल्लंघन करती, तो प्रशासन को उस जगह का कब्जा वापस लेने का अधिकार था.
केंद्र सरकार का कहना है कि इस समझौते से मस्जिद की कमेटी को जमीन पर मालिकाना हक नहीं मिला था. जमीन आज भी सरकारी है और कमेटी यह दावा नहीं कर सकती कि पुनर्विकास परियोजना के दौरान मस्जिद को उसी जगह बनाए रखना अनिवार्य है.
हालांकि, इस समझौते से एक अहम बात साफ होती है कि मस्जिद वहां कम से कम नवंबर 1940 से मौजूद थी और तत्कालीन प्रशासन ने वहां नमाज पढ़ने की अनुमति दी थी. यानी यह सरकारी जमीन पर बिना अनुमति किया गया कोई नया अतिक्रमण नहीं था.
केंद्र सरकार मस्जिद को क्यों हटाना चाहती है?
दरअसल, केंद्र सरकार दिल्ली के सेंट्रल विस्टा इलाके का रीडेवलपमेंट कर रही है. इसी योजना के तहत कृषि भवन की मौजूदा इमारत को भी हटाकर नए सरकारी भवन बनाए जाने हैं.
केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा है कि कृषि भवन परिसर के भीतर किसी स्थायी धार्मिक ढांचे का बने रहना उचित नहीं है. सरकार के मुताबिक, सरकारी संपत्ति का धर्मनिरपेक्ष चरित्र होना चाहिए और वहां किसी धार्मिक ढांचे को बनाए रखना इसके अनुरूप नहीं है.
सरकार ने अदालत को बताया कि जिस जगह कदीमी मस्जिद मौजूद है, वहां कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट की बिल्डिंग 4 और 5 बनाई जानी हैं. ऐसे में निर्माण कार्य के लिए मस्जिद को हटाना जरूरी है.
दिल्ली में अकेली ऐसी पुरानी मस्जिद नहीं
दिल्ली में कदीमी मस्जिद अकेली ऐसी मस्जिद नहीं है, जो सरकारी इमारतों के बनने से पहले से मौजूद है. इंडिया गेट के पास जब्ता गंज मस्जिद और उद्योग भवन के नजदीक सुनेहरी बाग मस्जिद भी आसपास की सरकारी इमारतों से पुरानी हैं.
16 अप्रैल 1970 के दिल्ली गजट में इन दोनों मस्जिदों को 100 साल से ज्यादा पुराना बताया गया था. दरअसल, अंग्रेजों ने 1911 में भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का ऐलान किया था. इसके बाद नई दिल्ली को बसाने का काम शुरू हुआ. राष्ट्रपति भवन और नॉर्थ-साउथ ब्लॉक जैसी इमारतें 1931 तक बनकर तैयार हो गई थीं.
आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार के दौर में सेंट्रल सेक्रेटेरिएट का विस्तार हुआ. इसी दौरान 1956 से 1968 के बीच कृषि भवन, उद्योग भवन, निर्माण भवन, शास्त्री भवन और रेल भवन जैसी इमारतें बनाई गईं. यानी इन सरकारी इमारतों के आसपास पहले से मौजूद कई पुराने धार्मिक स्थल नई दिल्ली के विकास के साथ सरकारी परिसरों के बीच आ गए.
अब क्या होगा कदीमी मस्जिद का?
कदीमी मस्जिद का मामला अब दिल्ली हाई कोर्ट में है. एक तरफ केंद्र सरकार 1940 के समझौते और जमीन के मालिकाना हक का हवाला देकर इसे हटाने की मांग कर रही है, तो दूसरी तरफ मस्जिद की कमेटी इसके पुराने इतिहास, धार्मिक इस्तेमाल और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर इसे सुरक्षा देने की मांग कर रही है.
इस मामले में मस्जिद की उम्र के साथ-साथ 1940 का समझौता भी बेहद अहम है. क्योंकि इसी से यह समझने में मदद मिलती है कि मस्जिद को सरकारी जमीन पर किस आधार पर इस्तेमाल करने की अनुमति मिली थी और उस अनुमति की शर्तें क्या थीं.
फिलहाल सेंट्रल विस्टा के तहत नए सरकारी भवनों के निर्माण की योजना और एक सदी से ज्यादा पुरानी बताई जा रही मस्जिद का भविष्य अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा.
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