Psychology Facts: कैसे होते हैं वे लोग जो हर वक्त गाना गाते रहते हैं? ये होते हैं उनके सीक्रेट

Psychology Facts: कई लोगों की आदत होती है कि वे कपड़े पहनते, खाना खाते या रोजमर्रा का काम करते समय गुनगुनाने लगते हैं. मनोविज्ञान के मुताबिक यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि शब्दों, धुन और क्रिएटिविटी से जुड़ी आदत भी हो सकती है.

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कई लोग कोई रोज का काम करते समय अपने आप गाने लगते हैं. ( Photo: ITG) कई लोग कोई रोज का काम करते समय अपने आप गाने लगते हैं. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:42 AM IST

Psychology Facts: क्या आप कपड़े पहनते समय, खाना बनाते हुए या घर का कोई काम करते समय अचानक गुनगुनाने लगते हैं? कई लोगों की आदत होती है कि वे काम करते-करते खुद ही कोई धुन बनाने लगते हैं. कई बार वही लाइन बार-बार दोहराते हैं तो कभी मौके के हिसाब से नए शब्द जोड़ देते हैं. सामान्य तौर पर इसे लोग बस मनोरंजन या मूड अच्छा करने का तरीका मानते हैं. लेकिन मनोविज्ञान से जुड़ी रिसर्च बताती है कि इस तरह गाना या गुनगुनाना भाषा से खेलने, बातों को याद रखने और अपने आसपास की चीजों को समझने का एक तरीका भी हो सकता है.

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काम करते-करते गाना क्यों शुरू कर देते हैं लोग?
कई लोग कोई रोज का काम करते समय अपने आप गाने लगते हैं. जैसे कपड़े पहनना, खाना खाना, घर में घूमना या अपना कोई काम करना. खास बात यह है कि कई बार ये गाने पहले से सुने हुए नहीं होते. लोग खुद ही कुछ शब्द जोड़ लेते हैं, धुन बना लेते हैं और फिर उसी को दोहराते रहते हैं. इस तरह गाना एक तरह का खेल भी बन  जाता है, जिसमें लोग शब्दों और आवाज के साथ अपनी तरह से प्रयोग करते हैं.

बार-बार एक ही लाइन क्यों गुनगुनाते हैं?
अगर कोई व्यक्ति एक ही लाइन या शब्द बार-बार गाता है तो यह सिर्फ आदत नहीं हो सकती. दोहराने से किसी बात को याद रखना आसान हो सकता है. रिसर्च में भी पाया गया है कि धुन और शब्द साथ होने पर भाषा से जुड़ी जानकारी को याद रखने में मदद मिल सकती है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार गाना गाने से याददाश्त बेहतर हो जाएगी. लेकिन लय और दोहराव दिमाग को जानकारी से जुड़ने का एक अलग तरीका जरूर देते हैं.

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कई लोग किसी के सामने नहीं, बल्कि अकेले काम करते हुए गुनगुनाते हैं. वे अपना काम करते समय धीरे-धीरे गाते या कोई धुन बनाते रहते हैं. एक स्टडी में भी लोगों के काम करमय खुद से बात करने, गाने या गुनगुनाने जैसी आदतों को देखा गया. इसमें पाया गया कि लोग बिना किसी सुनने वाले के भी अपने आप गा सकते हैं. हालांकि इस रिसर्च से यह साबित नहीं हुआ कि गाना गाने से व्यक्ति के मेडिटेशन और खुद पर कंट्रोल बेहतर होता है.

गाने बनाना क्रिएटिव से भी जुड़ा है
जब कोई व्यक्ति मौके के हिसाब से नए शब्द बनाता है या पुरानी धुन में अपने शब्द जोड़ता है तो वह अपनी क्रिएटिविटी का इस्तेमाल कर रहा होता है. मान लीजिए कोई व्यक्ति चाय बनाते समय उसी काम पर मजेदार लाइन बना ले या किसी रोज के काम को गाने में बदल दे. यह जरूरी नहीं कि वह कोई अच्छा गाना बनाने की कोशिश कर रहा हो. वह बस शब्दों और धुन के साथ खेल रहा हो सकता है. साइकोलॉजी से जुड़ी रिसर्च के मुताबिक इस तरह की अचानक बनाई गई धुन और गाने क्रिएटिव सोच से जुड़े हो सकते हैं.

हर गाने के पीछे कोई छिपी परेशानी नहीं होती
यह बात भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के अचानक गाने या कोई खास लाइन बार-बार दोहराने का मतलब यह नहीं है कि उसके मन में कोई बड़ी परेशानी चल रही है. कई बार लोग सिर्फ इसलिए गाते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा करना अच्छा लगता है. कभी वे बोरियत दूर करने के लिए गुनगुनाते हैं तो कभी कोई काम करते समय उनका मूड अच्छा होता है.

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इसलिए हर छोटी आदत का कोई गहरा मतलब निकालना जरूरी नहीं है. हां, अगर कोई व्यक्ति किस तरह के शब्द या धुन बार-बार इस्तेमाल करता है, उसमें उसकी पसंद और रुचि की झलक जरूर मिल सकती है.अगर आप कपड़े पहनते हुए, खाना बनाते हुए या कोई काम करते समय अपने आप गाने लगते हैं तो इसे सिर्अजीब आदत समझने की जरूरत नहीं है. कई बार आपका दिमाग इसी बहाने शब्दों, धुन और यादों के साथ खेल रहा होता है. यही वजह है कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी कभी-कभी रचनात्मकता दिखाने का मौका बन जाते हैं.

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