अगर किसी से बात करने के बाद आपका दिमाग भी उसी बातचीत को बार-बार दोहराने लगे, तो आप अकेले नहीं हैं. बातचीत खत्म हो जाती है, सामने वाला चला जाता है, लेकिन दिमाग में उसकी कही बातें चलती रहती हैं. कभी लगता है, 'मैंने ऐसा क्यों कहा?', तो कभी मन करता है, 'काश, उस समय कुछ और बोल दिया होता.' कई बार तो एक छोटी सी बातचीत भी कई घंटों तक दिमाग में घूमती रहती है. आखिर ऐसा क्यों होता है?
सामने वाले ने मेरे बारे में क्या सोचा होगा?
बातचीत के बाद सबसे ज्यादा परेशान करने वाला सवाल अक्सर यही होता है कि सामने वाले ने हमारे बारे में क्या सोचा होगा. आपने सामान्य तरीके से कोई बात कही, लेकिन बाद में लगने लगा कि शायद उसे बुरा लग गया. उसने सिर्फ 'ठीक है' कहा, तो आपको लगा कि वह नाराज है. उसने जवाब देर से दिया, तो दिमाग ने उसकी अपनी वजह बना ली. साइकोलॉजी में इसे घटना के बाद की मेंटल रिव्यू कहा जाता है. साल 2000 में मनोवैज्ञानिक रैकमैन और उनके दोस्तों ने इस पर एक स्टडी किया था. इसमें पाया गया कि किसी शर्मिंदगी या चिंता वाली सामाजिक स्थिति के बाद लोग उस घटना को बार-बार याद कर सकते हैं. कई लोगों में ये यादें बार-बार लौटती हैं और ध्यान लगाने में भी परेशानी कर सकती हैं.
बाद में 217 लोगों पर हुए एक स्टडी में भी पाया गया कि सामाजिक घटनाओं के बाद ऐसी बार-बार सोच ज्यादा और ज्यादा तेज हो सकती है. खासकर जब व्यक्ति को डर हो कि सामने वाला उसके बारे में नकारात्मक राय बना रहा होगा.
छोटी सी बात दिमाग में बड़ी क्यों बन जाती है?
मान लीजिए किसी दोस्त ने आपसे कहा, 'तुम आजकल काफी बदल गए हो.' हो सकता है कि उसका मतलब सिर्फ इतना हो कि आप पहले से ज्यादा व्यस्त हो गए हैं. लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते दिमाग में सवाल आने लगते हैं, 'मैं कैसे बदल गया?', 'उसने ऐसा क्यों कहा?', 'क्या वह मुझसे नाराज है?' यानी सामने वाले ने सिर्फ एक वाक्य कहा, लेकिन हमारा दिमाग उसके कई मतलब निकालने लगा. कई बार सामने वाले की बात से ज्यादा असर उस कहानी का होता है जो हम उसके बाद अपने मन में बना लेते हैं.
जिस बात में फीलिंग्स, वह ज्यादा याद
कुछ बातचीत हमें इसलिए लंबे समय तक याद रहती हैं क्योंकि उनके साथ हमारी भावनाएं जुड़ी होती हैं. किसी ने सबके सामने तारीफ कर दी, किसी करीबी ने दिल दुखाने वाली बात कह दी या किसी के सामने शर्मिंदगी महसूस हुई. ऐसी घटनाएं दिमाग पर ज्यादा असर छोड़ सकती हैं. मनोवैज्ञानिक जेम्स मैकगॉ ने याददाश्त पर किए गए कई रिसर्च की समीक्षा में बताया कि इमोशनल एक्सपीरियंस की याद लंबे समय तक बनी रह सकती है.यही वजह है कि किसी की कही एक अच्छी बात भी बार-बार याद आ सकती है और किसी की कही कड़वी बात भी.
'काश मैंने ऐसा कहा होता' वाली सोच
बातचीत के बाद हम अक्सर पुरानी बात को मन में दोबारा चलाते हैं. सोचते हैं, 'मुझे वहां चुप रहना चाहिए था', 'मुझे इतना नहीं बोलना चाहिए था' या 'मुझे कुछ और जवाब देना चाहिए था.' कभी-कभी यह सोच काम की होती है. इससे हमें अपनी गलती समझ आती है और अगली बार बेहतर तरीके से बात करने का मौका मिलता है. लेकिन अगर कोई नया निष्कर्ष निकले बिना हम उसी बात को बार-बार सोचते रहें, तो यह बार-बार सोचते रहने की आदत बन सकती है.
मनोवैज्ञानिक एडवर्ड वॉटकिन्स ने 2008 की एक रिव्यू में बताया कि बार-बार सोचने का असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम किस तरीके से सोच रहे हैं. सिर्फ उसी निगेटीव बात को दोहराते रहना समस्या बढ़ा सकता है, जबकि किसी घटना को ठोस तरीके से समझ कर आगे का कदम तय करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है. इसलिए अगली बार कोई बातचीत दिमाग में बार-बार घूमे तो खुद से एक सवाल पूछिए- 'मैं इस बात से कुछ सीख रहा हूं या सिर्फ उसी पल को दोबारा जी रहा हूं?'
अगर कोई नया जवाब नहीं मिल रहा, तो ध्यान किसी दूसरे काम पर लगाना बेहतर है. क्योंकि हर चुप्पी का मतलब नाराजगी नहीं होता, हर 'ठीक है' के पीछे कोई छिपी कहानी नहीं होती और हर बातचीत में गलती हमारी ही हो, यह भी जरूरी नहीं.
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