अक्सर परिवार में किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी जमीन, मकान या फ्लैट को लेकर विवाद शुरू हो जाता है. परेशानी तब और बढ़ जाती है, जब मरने वाला व्यक्ति अपनी संपत्ति के बंटवारे के लिए कोई वसीयत (Will) नहीं छोड़ता. ऐसी स्थिति में कानूनी वारिसों के बीच संपत्ति का बंटवारा लागू उत्तराधिकार कानूनों के हिसाब से होता है. लेकिन अगर परिवार का कोई सदस्य अपना हिस्सा छोड़कर दूसरे वारिस को देना चाहता है, तो इसके लिए रिलीज डीड (Release Deed) या त्यागपत्र की जरूरत पड़ सकती है.
क्या होती है रिलीज डीड?
रिलीज डीड एक लीलग डॉक्यूमेंट है, जिसके जरिए संपत्ति में अपना हिस्सा रखने वाला व्यक्ति स्वेच्छा से अपना अधिकार किसी दूसरे सह-हिस्सेदार या कानूनी वारिस के पक्ष में छोड़ देता है. इसे आसान भाषा में समझें तो मान लीजिए कि किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसके पीछे पत्नी और दो बच्चे हैं. अगर लागू कानून के तहत तीनों को संपत्ति में हिस्सा मिलता है और पत्नी अपना हिस्सा किसी एक बच्चे के नाम करना चाहती है, तो कानूनी शर्तें पूरी करते हुए रिलीज डीड बनाई जा सकती है. इस डॉक्यूमेंट से यह स्पष्ट हो जाता है कि किस व्यक्ति ने संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़ा है और किसके पक्ष में छोड़ा है. इससे भविष्य में परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद होने की आशंका कम हो सकती है.
वसीयत नहीं होने पर संपत्ति का क्या होता है?
अगर किसी व्यक्ति की मौत बिना वसीयत बनाए हो जाती है, तो उसकी संपत्ति का बंटवारा संबंधित उत्तराधिकार कानून के अनुसार किया जाता है. यह जरूरी नहीं कि हर मामले में संपत्ति केवल बेटे को मिले या पत्नी को पूरा अधिकार मिल जाए. किस वारिस को कितना हिस्सा मिलेगा, यह मृतक के धर्म, परिवार की स्थिति, संपत्ति के प्रकार और लागू कानून पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिए, हिंदू पुरुष की खुद की कमाई से खरीदी गई संपत्ति के मामले में, वसीयत नहीं होने पर उसकी पत्नी, बेटे, बेटियों और जीवित मां जैसे प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिसों को आम तौर पर कानून के अनुसार हिस्सा मिल सकता है. ऐसे में कोई एक वारिस केवल अपनी इच्छा से पूरी संपत्ति अपने नाम नहीं करा सकता, अगर दूसरे वारिसों के भी उसमें कानूनी अधिकार हैं.
किन परिस्थितियों में जरूरी हो सकती है ?
रिलीज डीड हर संपत्ति के मामले में जरूरी नहीं होती. इसकी जरूरत मुख्य रूप से तब पड़ सकती है, जब संपत्ति में कई कानूनी वारिसों का हिस्सा हो और उनमें से कोई अपना हिस्सा दूसरे वारिस के नाम करना चाहता हो. मान लीजिए, पिता की मौत के बाद उनके दो बेटों और एक बेटी को संपत्ति में कानूनी हिस्सा मिला है. अब बेटी अपना हिस्सा दोनों भाइयों में से किसी एक को देना चाहती है. ऐसी स्थिति में उसके अधिकार को कानूनी रूप से छोड़ने के लिए रिलीज डीड की जरूरत पड़ सकती है. अगर किसी जमीन या मकान में कई लोगों का हिस्सा है और उनमें से एक अपना अधिकार दूसरे सह-मालिक के पक्ष में छोड़ना चाहता है, तो रिलीज डीड से इस व्यवस्था को दस्तावेज में दर्ज किया जा सकता है.
जब संपत्ति के रिकॉर्ड में नाम बदलवाना हो
कई बार परिवार के सदस्य आपसी सहमति से संपत्ति एक व्यक्ति के नाम करना चाहते हैं. ऐसे में संबंधित अधिकारी संपत्ति के अधिकारों में बदलाव के लिए रिलीज डीड या दूसरे कानूनी दस्तावेज मांग सकते हैं. कौन-सा दस्तावेज जरूरी होगा, यह संपत्ति और स्थानीय नियमों पर निर्भर करता है.
क्या रजिस्टर्ड वसीयत होने पर भी रिलीज डीड बनवानी पड़ती है?
अगर संपत्ति के मालिक ने वैध वसीयत बनाई है और उसमें स्पष्ट रूप से बताया है कि उसकी संपत्ति किसे मिलेगी, तो केवल दूसरे कानूनी वारिसों के पास हिस्सा होने के कारण रिलीज डीड अपने आप जरूरी नहीं हो जाती. वसीयत के जरिए संपत्ति पाने वाले व्यक्ति को आम तौर पर दूसरे वारिसों से अपना अधिकार छोड़ने की डीड बनवाने की जरूरत नहीं होती. हालांकि, संपत्ति का रिकॉर्ड बदलने के लिए संबंधित विभाग अतिरिक्त दस्तावेज मांग सकता है. ऐसी मांग की कानूनी वजह समझना जरूरी है. यह भी ध्यान रखें कि वसीयत का रजिस्टर्ड होना उसे हर परिस्थिति में चुनौती से मुक्त नहीं करता. अगर वसीयत की वैधता पर सवाल उठता है या उसे बनाने में धोखाधड़ी, दबाव अथवा दूसरी कानूनी समस्या का आरोप है, तो विवाद हो सकता है.
रिलीज डीड बनवाते समय किन बातों का रखें ध्यान?
रिलीज डीड बनवाते समय कुछ जरूरी सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि भविष्य में संपत्ति को लेकर कोई नया विवाद खड़ा न हो. सबसे पहले दस्तावेज में संपत्ति की पूरी जानकारी, अपना हिस्सा छोड़ने वाले व्यक्ति का नाम और जिस व्यक्ति के पक्ष में अधिकार छोड़ा जा रहा है, उसका नाम स्पष्ट होना चाहिए. इसमें यह भी साफ लिखा होना चाहिए कि संपत्ति में कौन-सा अधिकार छोड़ा जा रहा है. दूसरी बात, दस्तावेज को संबंधित राज्य के स्टांप कानूनों के अनुसार तैयार करना चाहिए. इसके बाद लागू नियमों के मुताबिक संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में इसका रजिस्ट्रेशन कराना पड़ सकता है. आम तौर पर पहचान से जुड़े दस्तावेज और संपत्ति के पुराने कागजात भी मांगे जा सकते हैं.
कुछ राज्यों में करीबी रिश्तेदारों के बीच रिलीज डीड पर स्टांप ड्यूटी में छूट या रियायत मिल सकती है. हालांकि, यह राज्य के नियमों और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है. इसलिए दस्तावेज बनवाने से पहले स्थानीय संपत्ति कानून के जानकार से सलाह लेना बेहतर है. कभी-कभी संपत्ति के मालिक या वसीयत के लाभार्थी को लगता है कि रिलीज डीड की जरूरत नहीं है, लेकिन रजिस्ट्रार कार्यालय इसके बिना प्रक्रिया आगे बढ़ाने से मना कर देता है. ऐसी स्थिति में सबसे पहले यह पता करना चाहिए कि रिलीज डीड क्यों मांगी जा रही है.
अगर वसीयत या दूसरे कानूनी दस्तावेजों के आधार पर व्यक्ति का दावा है कि इसकी जरूरत नहीं है, तो संपत्ति कानून के विशेषज्ञ से लिखित कानूनी राय ली जा सकती है. अगर इसके बाद भी विवाद बना रहता है, तो मामले के तथ्यों के आधार पर उचित कानूनी उपाय अपनाया जा सकता है. कुछ परिस्थितियों में हाई कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है. हालांकि, अदालत में राहत मिलेगी या नहीं, यह मामले के दस्तावेजों और कानूनी स्थिति पर निर्भर करेगा.
संपत्ति विवाद से बचने के लिए क्या करें?
किसी व्यक्ति की मौत के बाद संपत्ति के बंटवारे में जल्दबाजी करने के बजाय पहले यह पता करना चाहिए कि वसीयत मौजूद है या नहीं. इसके बाद सभी कानूनी वारिसों की पहचान, संपत्ति के पुराने कागजात और प्रत्येक वारिस के अधिकारों की जांच करनी चाहिए. अगर परिवार के सदस्य आपसी सहमति से संपत्ति का बंटवारा करना चाहते हैं या कोई अपना हिस्सा छोड़ना चाहता है, तो उस समझौते को सही कानूनी दस्तावेज में दर्ज कराना चाहिए. केवल मौखिक सहमति पर निर्भर रहने से आगे चलकर विवाद हो सकता है.
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