जब माइक्रोवेव ओवन की तकनीक का पेटेंट कराया गया

आज के दिन ही माइक्रोवेव ओवन बनाने की तकनीक का पेटेंट कराया गया था. इस तकनीक की खोज के बाद ही माइक्रोवेव जैसा उपयोगी उपकरण अस्तित्व में आ पाया.

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माइक्रोवेव ओवन बनाने वाली तकनीक का आज के दिन ही पेटेंट कराया गया था (Photo - Pexels) माइक्रोवेव ओवन बनाने वाली तकनीक का आज के दिन ही पेटेंट कराया गया था (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:40 AM IST

8 अक्टूबर 1945 को माइक्रोवेव ओवन की तकनीक का पेटेंट कराया गया था. रेथियॉन मैन्युफैक्चरिंग कंपनी ने उस तकनीक के लिए पेटेंट फाइल किया, जिससे आगे चलकर आधुनिक माइक्रोवेव ओवन का जन्म हुआ. इस आविष्कार का श्रेय रेथियॉन के इंजीनियर पर्सी स्पेंसर को दिया जाता है.दुनिया भर के घरों में खाना गर्म करने का सबसे आसान तरीका बन चुका है. लेकिन इसकी खोज किसी किचन में बैठकर नहीं हुई थी. इसके पीछे रडार और माइक्रोवेव तकनीक पर चल रहे प्रयोग थे.

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पर्सी स्पेंसर की कहानी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. उन्होंने महज 12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था और एक बुनाई मिल में काम करना शुरू कर दिया था. इसके बाद 18 साल की उम्र में वह अमेरिकी नौसेना में शामिल हो गए और रेडियो ऑपरेटर के तौर पर काम किया. 

खास बात यह थी कि उन्होंने सेना में रहते हुए खुद पढ़ाई जारी रखी. उन्होंने ट्रिग्नोमेट्री, कैलकुलस और फिजिक्स जैसे विषयों को खुद पढ़ा. यही पढ़ाई आगे चलकर उनके वैज्ञानिक करियर में काफी काम आई.

रेथियॉन में रडार पर कर रहे थे काम
नौसेना से सम्मानपूर्वक सेवा समाप्त करने के बाद स्पेंसर को रेथियॉन में नौकरी मिल गई. यह कंपनी रक्षा क्षेत्र के लिए तकनीक और उपकरण तैयार करती थी. उस समय स्पेंसर और उनकी टीम रेडियो और रडार के लिए उपकरण बनाने पर काम कर रही थी. इसी दौरान उनका काम एक खास उपकरण मैग्नेट्रॉन  से भी जुड़ा था.

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मैग्नेट्रॉन एक ऐसी तकनीक है, जो माइक्रोवेव पैदा करती है. स्पेंसर ने ऐसे छोटे मैग्नेट्रॉन को बड़े पैमाने पर बनाने के तरीके विकसित करने में भी अहम भूमिका निभाई. लेकिन उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं था कि यही तकनीक एक दिन दुनिया की रसोई बदल देगी.

जब जेब में रखा चॉकलेट बार पिघल गया
एक दिन स्पेंसर मैग्नेट्रॉन के साथ प्रयोग कर रहे थे. वह पेडे नाम की चॉकलेट बार अक्सर अपने साथ रखते थे. प्रयोग के दौरान उन्होंने महसूस किया कि उनकी जेब में रखा चॉकलेट बार पिघल गया है.

पहले तो उन्होंने इसे एक संयोग माना. लेकिन इसके पीछे की वजह जानने की कोशिश की. उन्हें समझ आया कि मैग्नेट्रॉन से निकलने वाली माइक्रोवेव रेडिएशन की वजह से चॉकलेट गर्म होकर पिघली थी. यहीं से उनके दिमाग में एक बड़ा सवाल आया- अगर माइक्रोवेव चॉकलेट को गर्म कर सकती हैं, तो क्या इनसे खाना भी गर्म किया या पकाया जा सकता है?

फिर पॉपकॉर्न और पानी पर किया प्रयोग
स्पेंसर ने इसके बाद अलग-अलग चीजों पर प्रयोग शुरू कर दिए. उन्होंने बिना फूले हुए पॉपकॉर्न पर माइक्रोवेव का असर देखा. पॉपकॉर्न फूट गया. इसके बाद उन्होंने पानी और ठंडे खाने को भी माइक्रोवेव के संपर्क में रखा. नतीजा हैरान करने वाला था. माइक्रोवेव से खाना गर्म किया जा सकता था.

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इतना ही नहीं, उन्होंने पाया कि माइक्रोवेव कुछ ऐसी चीजों के आर-पार भी काम कर सकती हैं, जिनका इस्तेमाल खाना रखने में होता है, जैसे वैक्स पेपर, प्लास्टिक और कांच. यानी खाना सीधे आग पर रखे बिना भी गर्म किया जा सकता था.

तैयार हुआ पहला माइक्रोवेव
इस खोज के बाद दुनिया का पहला माइक्रोवेव ओवन बनाया गया. इसे राडारेंज नाम दिया गया. लेकिन आज के छोटे और कॉम्पैक्ट माइक्रोवेव से इसकी तुलना करना मुश्किल है. पहला राडारेंज करीब 6 फीट ऊंचा था और इसका वजन 750 पाउंड से ज्यादा था. इसे एक परमाणु ऊर्जा से चलने वाले मालवाहक जहाज पर लगाया गया. बाद में 24 जनवरी 1950 को रेथियॉन कंपनी को इस तकनीक का पेटेंट मिल गया.

आज माइक्रोवेव लगभग हर बजट में मिल जाता है, लेकिन शुरुआती दौर में इसे घर में रखना आसान नहीं था. पहले राडारेंज की कीमत करीब 5,000 डॉलर थी. आज की कीमत के हिसाब से यह रकम लगभग 52,000 डॉलर के बराबर बैठती है.

इसके अलावा लोगों के मन में माइक्रोवेव रेडिएशन को लेकर भी डर था. मशीन बहुत बड़ी थी और कीमत भी बहुत ज्यादा थी. इसलिए यह तकनीक लंबे समय तक आम घरों से दूर रही. माइक्रोवेव को घरों तक पहुंचाने में बड़ा बदलाव 1967 में आया.

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उस समय रेथियॉन की ही कंपनी आमना ने पहला टेबलटॉप माइक्रोवेव पेश किया. इसकी कीमत करीब 495 डॉलर थी. यह पहले राडारेंज की तुलना में काफी छोटा और घर में इस्तेमाल करने के लिहाज से ज्यादा सुविधाजनक था. इसके बाद माइक्रोवेव धीरे-धीरे आम घरों में पहुंचने लगा.

माइक्रोवेव की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी.1975 तक माइक्रोवेव ओवन अमेरिकी घरों में गैस से चलने वाले ओवन की तुलना में ज्यादा आम हो चुका था. यानी जिस तकनीक की शुरुआत एक वैज्ञानिक प्रयोग के दौरान जेब में रखी चॉकलेट के पिघलने से हुई थी, वह कुछ दशकों में घरों की रसोई का अहम हिस्सा बन गई.

आज माइक्रोवेव में खाना गर्म करना हमारे लिए बेहद सामान्य बात है. लेकिन इसकी शुरुआत याद करें तो कहानी और भी दिलचस्प लगती है- एक रडार प्रयोग, जेब में रखा चॉकलेट बार और एक इंजीनियर की जिज्ञासा ने मिलकर रसोई की दुनिया बदल दी.

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