आज हम 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं. हर साल 15 अगस्त को लाल किले पर झंडा फहराया जाता है. हम अपने घरों में स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में तिरंगा फहराते हैं. हमें इसमें कुछ नया नहीं लगता. क्योंकि, जब से हमलोगों ने होश संभाला है. ऐसी ही व्यवस्था में जीते आए हैं. हमें अपनी आजादी का जश्न मनाने, तिरंगा लहराने, कहीं भी आने- जाने और कानून के दायरे में रहकर कुछ भी करने की आजादी है.
हमें कोई रोक नहीं सकता. कोई टोक नहीं सकता. हम अपने मन मुताबिक पढ़ाई कर सकते हैं. बिजनेस कर सकते हैं. अपनी मेहनत और योग्यता के बदौलत कोई भी नौकरी हासिल कर सकते हैं. चुनाव लड़कर जनता के प्रतिनिधि बन सकते हैं. आज हमें अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने की आजादी है. ऐसे हालात आज से 80 साल पहले नहीं थे.
15 अगस्त 1947 की सुबह ही कुछ अलग थी. उस सुबह लोग प्रत्यक्ष आजादी को अहसास कर रहे थे. लाखों की भीड़ दिल्ली में जमा थी. आजादी का जश्न मना रही थी. फिर भी उनमें से कईयों के पास तिरंगा नहीं था. बस लाल किले पर लहराता तिरंगा. यही उनका अपना झंडा था. उसकी एक झलक से लाखों निहाल हो गए. क्योंकि ये सिर्फ झंडा नहीं था. यह प्रतीक था, उस अहसास का, जिसे हम आजादी कहते हैं.
हम सब आजाद हैं
लाल किले पर तिरंगे लहराने के मायने क्या हैं? ये आजादी की पहली सुबह देखने वाले ही समझ सकते थे. इस सुबह से सबकुछ बदल सा गया था. लोग आजादी की परिभाषा अपने तरीके से गढ़ते दिख रहे थे. लोगों के जुबां पर बस यही शब्द थे - हमारा मुल्क अब आजाद है. हम किसी के गुलाम नहीं रहे. अब उन्हें अपने तिरंगे को हाथ में लेकर खुलेआम घूमने की आजादी थी. घरों पर अपना झंडा लगाने की आजादी थी. अब उन्हें अपना राज मिलने वाला था. अब लोग विदेशियों के हुक्म के गुलाम नहीं थे. उन्हें अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने के लिए किसी के परमिशन की जरूरत नहीं होने वाली थी.
मशहूर लेखक राजेंद्र लाल हांडा की 'किताब दिल्ली में दस वर्ष' में साल 1940 से 1950 के बीच की दिल्ली की जिंदगी, लोगों के रहन- सहन, राजनीतिक उतार-चढ़ाव, बदलावों और सामाजिक-आर्थिक मायने पर काफी कुछ लिखा गया है. इसी में उन्होंने आजादी की रात यानी 14 अगस्त रात 12 बजे के बाद से 15 अगस्त को सूरज उगने के साथ हुई सुबह का आंखों देखी हाल लिखा है. वो लिखते हैं- 'रात के लगभग दो बजे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू धारा सभा से निकल कर वायसराय भवन की ओर गवर्नर जनरल को आमंत्रित करने गए. स्वतंत्रता के उत्साह में भीड़ भी उनके पीछे-पीछे हो ली. खाली स्थान था ही नहीं. जनसमूह इतना बड़ा था कि यह पता लगाना असंभव था कि लोग किधर जा रहे हैं.
कुछ देर बाद प्रधानमंत्री गवर्नर जनरल को साथ लेकर धारा सभा भवन में आ गए. उस समय लोगों का जोश चरम सीमा को पहुंच चुका था. नेताओं के अभिनंदन में बराबर नारे लगाए जा रहे थे. उस समय सभी कुछ नया और अपूर्व दिखाई देता था. अपूर्व समारोह, अपूर्व दृश्य, अपूर्व उत्साह, अपूर्व देशभक्ति और अपूर्व जनसमूह.
धारासभा भवन में ही नहीं, उसके बाहर हरी घास पर, सड़कों पर, सेक्रेटेरियट के सामने विशाल मैदान में तिल रखने की भी कहीं जगह दिखाई न देती थी. ऐसी भीड़ तो लोगों ने प्रायः देखी होगी, पर आधी रात को किसी भी स्थान पर किसी समय दो तीन लाख आदमी इकट्ठे न हुए होंगे. दिल्ली ने अतीत में अनेक उत्सव, अनेक पर्व देखें. बड़े-बड़े चक्रवर्ती दिग्विजयी सम्राटों के समारोह देखे, लेकिन अतीत के वे सभी महोत्सव उस महान पर्व के आगे फीके पड़ गए, जो दिल्ली के लोगों ने 14-15 अगस्त 1947 की रात को देखा.
उस रात दिल्ली में स्वतंत्रता का अवतरण हुआ. ठीक आधी रात के समय जिस क्षण 15 अगस्त के दिन ने जन्म लिया. लाखों नर-नारियों को ऐसा आभास हुआ मानों गंगा की तरह स्वर्ग से स्वतंत्रता धरती पर उतर रही हो.'
लाल किले पर तिरंगा फहरता देखने की उम्मीद में थे लोग
आगे हांडा लिखते हैं- 'रात तीन बजे तक शपथ-ग्रहण आदि के बाद समारोह समाप्त हो गया. कुछ लोग घरों को वापस हो लिए, बहुत से हरे लॉनों और फुटपाथों पर सो रहे. अगले दिन यानी 15 अगस्त की सुबह आठ बजे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर यूनियन जैक की जगह भारत का तिरंगा झंडा फहराया. दिल्ली हजारों साल का पुराना शहर है. अपने इतिहास में उसने एक स्थान में इतना विशाल जनसमूह निश्चय ही कभी नहीं देखा होगा, जितना उस दिन लाल किले के आस-पास आ जुटा था.
स्थानीय अखबारों तथा सरकारी अनुमानों के अनुसार, वहां 10 लाख से कम आदमी नहीं थे. दिल्ली गेट से लेकर कश्मीरी गेट तक और जामा मस्जिद से लाल किले तक कहीं सड़क या जमीन दिखाई नहीं देती थी. सिवाय एक अपार जनसमुदाय के और कुछ नहीं था. इस भीड़ को विसर्जित होने में चार घंटे लगे. सभी सड़कें प्रायः एक बजे दोपहर तक भीड़ से खचाखच भरी रहीं.'
आगे उन्होंने अपनी किताब में आजादी की पहली सुबह का और भी सुंदर वर्णन किया है. वो लिखते हैं - 'आजादी की पहली सुबह का ये जश्न आधी रात से ही जारी था. 14-15 अगस्त की आधी रात के जश्न ने लोगों को उत्साहित कर दिया था. उस रात को 'जन गण मन' और 'वंदेमातरम' के राष्ट्रीय गीतों की मधुर ध्वनि कैसी स्वर्गीय सी जान पड़ती थी. ये गीत पहले भी अनेकों बार सुने थे, किन्तु उस रात तो एक-एक शब्द मानों पुकार-पुकार कर अपना अर्थ भी श्रोताओं के कानों में कह रहा था.
उस रात वास्तव में शस्यश्यामला, बहुबल घारिणी, रिपुदल वारिणी आदि विशेषणों के ठीक अर्थ समझ में आए. जब 'जन गण मन' आरम्भ हुआ तो इसकी ललित लय में हजारों सिर हिल उठे. किन्तु जैसे ही राष्ट्र गान में पंजाब और सिंध का उल्लेख हुआ एकत्रित भीड़ में सैंकड़ों आदमियों ने सिर उठाकर एक-दूसरे को देखा. वहां उपस्थित जनों को सहसा विभाजन की टीस याद आ गई जो दूसरी ओर पाकिस्तान नाम के मुल्क के रूप में मूर्त रूप ले चुकी थी और सरहदों पर हिंसा को जन्म दे चुकी थी.'
आज से 80 साल पहले आजादी की पहली सुबह के ऐसे दृश्य ही लोगों को स्वर्गिक आनंद का अहसास दे रही थी. लेखक डोमिनिक लैपीयरे और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में 14-15 अगस्त 1947 के ऐतिहासिक दिन का चित्रण करते हुए लिखते हैं- 'सैन्य छावनियों, सरकारी कार्यालयों, निजी मकानों आदि पर फहराते यूनियन जैक को उतारा जाना शुरू हो चुका था. 14 अगस्त को जब सूर्य डूबा तो देश भर में यूनियन जैक उतारे जा चुके थे या उतारे जा रहे थे. क्योंकि, इसकी जगह 15 अगस्त को तिरंगा फहराया जाना था.'
गांव- गांव मनाया जा रहा था जश्न
लैपीयरे और कॉलिन्स आगे लिखते हैं- '14 अगस्त की सुबह से ही देश के शहर-शहर, गांव-गांव में जश्न शुरू हो गया था. दिल्ली के वाशिंदे घरों से निकल पड़े. साइकिलों, कारों, बसों, रिक्शों, तांगों, बैलगाड़ियों, यहां तक हाथियों-घोड़ों पर भी सवार होकर लोग दिल्ली के केंद्र यानी इंडिया गेट की ओर चल पड़े. लोग नाच-गा रहे थे, एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे और हर तरफ राष्ट्रगान की धुन सुनाई पड़ रही थी. मर्दों ने नई पगड़ियां पहनीं, औरतों ने नई साड़ियां. बच्चे मां-बाप के कंधों पर लटक गए. देहात से आए बहुत से लोग पूछ रहे थे कि यह धूम-धड़ाका काहे का है? तो लोग बढ़-बढ़ कर बता रहे थे- अरे, तुम्हे नहीं मालूम, अंग्रेज जा रहे हैं. आज नेहरूजी देश का झंडा फहराएंगे. हम आजाद हो गए.'
दोनों ने आगे लिखा है - 'गांव-देहात से आए लोग अपने बच्चों को आजादी का मतलब अपने-अपने हिसाब से समझा रहे थे कि अब अंग्रेज चले गए. अब हमारे पास ज्यादा पशु होंगे, अब हमारे खेतों में ज्यादा फसल हुआ करेगी, अब कहीं आने-जाने पर रोक नहीं रहेगी, ग्वालों ने अपनी पत्नियों से कहा कि अब गायें ज्यादा दूध देंगी, क्योंकि आजादी मिल गई है.'
आजादी की पहली सुबह की आंखों देखी कहानी इससे अच्छी हो ही नहीं सकती. वैसे 15 अगस्त की सुबह सिर्फ दिल्ली ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी आजादी को लोगों ने उसी तरह महसूस किया था. जब सभी सरकारी कार्यालयों और सैनिक छावनियों से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराया जाने लगा. जहां अंग्रेज वायसराय और वरिष्ठ मिलिट्री अफसरों की तस्वीरें लगी थीं. वहां अब तिरंगा लहराया जा रहा था.
आज हमें तिरंगा लहराने और आजादी का जश्न मनाने में कोई रोक- टोक नहीं है. हम एक आजाद मुल्क में पैदा हुई पीढ़ी है. लेकिन, 80 साल पहले जिस पीढ़ी ने इस देश को ऐसे हाल में देखा होगा, जहां लोगों को अपने हक की रोटी के लिए भी लड़ाई लड़नी होती थी. जब उनके सम्मान और स्वाभिमान को कभी भी बूट और हंटर तले रौंद दिया जाता था. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी की पहली सुबह खुले आंखों से सपने के लोक में प्रवेश करने जैसा था. जहां का उनकी हर कल्पना, हकीकत में तब्दील होती दिख रही थी.
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