फिल्मों और वेब सीरीज में आपने अक्सर ऐसा सीन देखा होगा, जिसमें हीरो के सीने पर गोली चलती है. गोली सीधे उसके शरीर की तरफ आती है, लेकिन बुलेटप्रूफ जैकेट से टकराकर रुक जाती है. हीरो कुछ पल के लिए पीछे जरूर जाता है, लेकिन अगले ही सीन में बिल्कुल ठीक खड़ा नजर आता है. ऐसे सीन देखकर मन में सवाल आता है कि क्या असल जिंदगी में भी बुलेटप्रूफ जैकेट गोली को इसी तरह रोक सकती है? खासकर अगर गोली किसी राइफल से चली हो तो क्या एक जैकेट इंसान की जान बचा सकती है?
दरअसल, फिल्मों में बुलेटप्रूफ जैकेट को कई बार बहुत आसान तरीके से दिखाया जाता है, लेकिन असल में इसके पीछे काफी दिलचस्प साइंस काम करता है. गोली को रोकने के लिए हमेशा जैकेट के अंदर लोहे या स्टील की मोटी प्लेट होना जरूरी नहीं है. कई आधुनिक बॉडी आर्मर में केवलर जैसे बेहद मजबूत फाइबर, सिरेमिक और पॉलीएथिलीन जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. इनकी कई परतें मिलकर गोली की ताकत को कम करने और उसकी एनर्जी को अलग-अलग हिस्सों में फैलाने का काम करती हैं.
गोली इतनी खतरनाक क्यों होती है?
किसी बंदूक से निकलने वाली गोली बहुत तेज स्पीड से आगे बढ़ती है. उसकी स्पीड और वजन के कारण उसमें काफी एनर्जी होती है. जब यही गोली शरीर से टकराती है तो वह त्वचा, मांसपेशियों और अंदर के महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. इसलिए बुलेटप्रूफ जैकेट का सबसे बड़ा काम गोली को शरीर तक पहुंचने से रोकना या उसकी ताकत को इतना कम करना होता है कि नुकसान कम हो सके. यही वजह है कि बुलेटप्रूफ जैकेट को सिर्फ एक मजबूत कपड़ा समझना सही नहीं होगा. इसकी असली ताकत उसकी कई परतों में छिपी होती है. हर परत गोली के असर को कम करने में अपना अलग योगदान देती है.
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AK-47 की गोली के सामने क्या होता है?
AK-47 जैसी राइफल से निकलने वाली गोली काफी तेज स्पीड से चलती है. अलग-अलग गोली और हथियार के हिसाब से इसकी गति बदल सकती है, लेकिन यह कई सौ मीटर प्रति सेकंड तक हो सकती है. इतनी तेज गति से आने वाली गोली को रोकना आसान काम नहीं है. जब ऐसी गोली किसी सुरक्षा जैकेट से टकराती है तो वह केवल एक परत से नहीं रुकती. जैकेट की डिजाइन इस तरह की जा सकती है कि कई मजबूत परतें मिलकर गोली की गति और ऊर्जा को कम करें. कुछ राइफल राउंड के खिलाफ सिरेमिक प्लेट जैसी हार्ड आर्मर सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके पीछे मजबूत फाइबर की परतें हो सकती हैं.
सबसे पहले अगर गोली सिरेमिक प्लेट से टकराती है तो टक्कर के दौरान गोली और सिरेमिक दोनों पर काफी असर पड़ता है. सिरेमिक का काम गोली को कमजोर या तोड़ने में मदद करना और उसकी ऊर्जा को एक बड़े हिस्से में फैलाना हो सकता है. इससे गोली के लिए आगे की सुरक्षा परतों को पार करना मुश्किल हो जाता है. इसके बाद मजबूत फाइबर की परतें काम करती हैं. यहां अरामिड जैसे फाइबर इस्तेमाल किए जा सकते हैं. केवलर भी इसी परिवार का एक प्रसिद्ध फाइबर है. ये फाइबर देखने में कपड़े जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनकी मजबूती बहुत ज्यादा होती है.
केवलर गोली को कैसे रोकता है?
अब इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझिए. मान लीजिए आपने एक पतले कपड़े पर उंगली से जोर लगाया. कपड़ा आसानी से पीछे की तरफ खिंच जाएगा. लेकिन अगर उसी कपड़े की बहुत सारी मजबूत परतें एक साथ हों तो उन्हें पीछे धकेलना काफी मुश्किल होगा. बुलेटप्रूफ जैकेट के मजबूत फाइबर भी कुछ इसी तरह काम करते हैं. जब गोली फाइबर की परत से टकराती है तो वह रेशों को खींचती और उन पर जोर डालती है. इस दौरान सिर्फ गोली के सामने मौजूद एक रेशा ही काम नहीं करता. आसपास के कई रेशे भी इस ताकत को संभालने लगते हैं.
इससे गोली की एनर्जी एक छोटी जगह पर रहने के बजाय ज्यादा बड़े हिस्से में फैलने लगती है. गोली की स्पीड कम होती जाती है और मजबूत फाइबर उसे आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश करते हैं. यही वजह है कि बुलेटप्रूफ जैकेट का काम सिर्फ गोली को रोकना नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा को फैलाना भी होता है.
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क्या गोली लगने पर कोई चोट नहीं होती?
फिल्मों में अक्सर ऐसा दिखाया जाता है कि जैकेट ने गोली रोक ली तो हीरो को कुछ भी नहीं हुआ. असल जिंदगी में ऐसा जरूरी नहीं है. गोली जैकेट को पार न कर पाए, फिर भी उसके टकराने की ताकत शरीर तक पहुंच सकती है. गोली के असर से जैकेट का हिस्सा अंदर की तरफ दब या उभर सकता है. इससे शरीर पर जोर का दबाव पड़ सकता है और चोट लग सकती है. इसलिए बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने का मतलब यह नहीं है कि गोली लगने पर व्यक्ति को बिल्कुल कोई नुकसान नहीं होगा. इसका मकसद गोली को शरीर के अंदर जाने से रोकना और चोट के खतरे को कम करना है.
बुलेटप्रूफ जैकेट में कौन-कौन सी सामग्री होती है?
हर जैकेट एक जैसी नहीं होती. उसकी सुरक्षा का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस तरह की गोली से बचाव के लिए बनाया गया है. कुछ जैकेटों में अरामिड फाइबर का इस्तेमाल होता है. केवलर इसका एक जाना-पहचाना उदाहरण है. इसके अलावा कुछ बॉडी आर्मर में हाई-परफॉर्मेंस पॉलीएथिलीन फाइबर का इस्तेमाल भी किया जाता है. वहीं राइफल की गोलियों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले कुछ हार्ड आर्मर में सिरेमिक प्लेट शामिल हो सकती हैं. पुराने समय में सुरक्षा के लिए धातु का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता था. लेकिन धातु की सबसे बड़ी समस्या उसका वजन था. ज्यादा वजन वाली सुरक्षा पहनकर लंबे समय तक चलना या काम करना मुश्किल हो सकता है.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ्लैक जैकेट जैसे सुरक्षा उपकरणों में बैलिस्टिक नायलॉन का इस्तेमाल किया गया था. ये पहले के कुछ धातु आधारित तरीकों की तुलना में अलग तरह की सुरक्षा देते थे, लेकिन वे भी भारी और सीमित उपयोग वाले थे. समय के साथ नई सामग्रियों और बेहतर डिजाइन के कारण बॉडी आर्मर ज्यादा हल्का और प्रभावी होता गया.
गोली लगते ही जैकेट के अंदर क्या होता है?
इसे एक छोटे उदाहरण से समझिए. अगर आप एक जगह जोर से गेंद मारते हैं और सामने एक बहुत मजबूत जाल लगा हो, तो गेंद की ताकत सिर्फ एक जगह पर नहीं रहेगी. जाल के कई हिस्से उस ताकत को संभालेंगे. बुलेटप्रूफ फाइबर भी कुछ इसी सिद्धांत पर काम करते हैं. गोली जब फाइबर से टकराती है तो रेशे खींचते हैं और उनकी ताकत गोली के असर को आसपास के हिस्सों तक फैलाती है. इससे गोली की गति कम होती है और वह आगे बढ़ने में अपनी एनर्जी खोती जाती है. यही कारण है कि जैकेट पर गोली लगने के बाद एक बड़ा निशान या उभार दिखाई दे सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि जैकेट ने काम नहीं किया.
फिर हर गोली को क्यों नहीं रोक सकती जैकेट?
यह सबसे जरूरी बात है. दुनिया में कोई एक ऐसी बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं है जो हर तरह की गोली से हर स्थिति में सुरक्षा दे सके. अलग-अलग जैकेट अलग-अलग खतरों और सुरक्षा स्तरों के लिए बनाई जाती हैं. हैंडगन की गोलियों के लिए इस्तेमाल होने वाला आर्मर और राइफल की गोलियों के लिए इस्तेमाल होने वाला आर्मर अलग हो सकता है. राइफल की गोलियों के खिलाफ अक्सर ज्यादा मजबूत और अलग तरह की सुरक्षा की जरूरत पड़ती है. जैकेट की क्षमता उसकी डिजाइन, सामग्री, निर्माण और निर्धारित सुरक्षा स्तर पर निर्भर करती है. इसलिए फिल्मों में दिखाया जाने वाला सीन देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि कोई भी बुलेटप्रूफ जैकेट किसी भी गोली को आसानी से रोक सकती है.
बुलेटप्रूफ जैकेट की असली ताकत किसी एक खास पदार्थ में नहीं, बल्कि उसकी पूरी डिजाइन में होती है. कहीं सिरेमिक गोली के असर को कम करने में मदद करता है, कहीं अरामिड फाइबर ऊर्जा को फैलाता है और कहीं पॉलीएथिलीन जैसी सामग्री बची हुई ताकत को संभालने में मदद करती है. यानी जब गोली जैकेट से टकराती है तो उसके साथ एक के बाद एक कई प्रक्रिया होती हैं. पहले गोली की ऊर्जा को कम करने की कोशिश होती है, फिर उसका असर कई रेशों और परतों में फैलता है और आखिर में बची हुई एनर्जी को रोकने की कोशिश की जाती है.
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