23 जुलाई 1952 को कर्नल जमाल अब्दुल नासिर और 89 अन्य स्वतंत्र अधिकारियों ने लगभग बिना रक्तपात के तख्तापलट कर राजशाही को उखाड़ फेंका था. राजा फारूक, जिनके शासन की भ्रष्टाचार और पहले अरब-इजराइल युद्ध में विफलताओं के लिए आलोचना की गई थी, उनको पद त्यागने और तख्तापलट के नाममात्र के नेता जनरल मुहम्मद नगुइब को सत्ता सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ा. क्रांतिकारियों ने जमीन का पुनर्वितरण किया. भ्रष्टाचार के आरोप में राजनेताओं पर मुकदमे चलाए और 1953 में राजशाही को समाप्त कर दिया.
तख्तापलट के बाद कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि राजा फारूक प्रथम और सत्ता प्रतिष्ठान के कुछ सदस्यों को तुरंत सार्वजनिक रूप से फांसी दे दिया जाए. लेकिन नासिर ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया और फारूक और अन्य लोगों को निर्वासन में जाने की अनुमति दी.
देश पर नासिर के नियंत्रण में 11 अधिकारियों की एक क्रांतिकारी कमान परिषद का कब्जा हो गया, जिसमें मेजर जनरल मुहम्मद नगुइब भी शामिल थे. मुहम्मद नगुइब कठपुतली राष्ट्राध्यक्ष थे. एक वर्ष से अधिक समय तक नासिर ने अपनी वास्तविक भूमिका को इतनी कुशलता से छिपाए रखा कि विदेशी संवाददाताओं को भी उनके अस्तित्व का पता नहीं चला.
1954 में नासिर पर्दे के पीछे से उभरे, नगुइब को सत्ता से हटाया और स्वयं को मिस्र का प्रधानमंत्री घोषित किया. अगले दो वर्षों तक नासिर ने एक प्रभावी और लोकप्रिय नेता के रूप में शासन किया और एक नया संविधान लागू किया, जिसने मिस्र को एक समाजवादी अरब राज्य बना दिया, जो शीत युद्ध के दौरान प्रचलित साम्यवादी और लोकतांत्रिक-पूंजीवादी प्रणालियों से जानबूझकर अलग रहा.
1956 में, वे निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गए. 1970 में पद पर रहते हुए ही हृदयाघात से उनका निधन हो गया. सत्ता में अपने कई वर्षों के दौरान नासिर लगातार लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता रहे.
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