लगातार बहता रहता है पानी, फिर नदी, समुद्र में पुल के पिलर कैसे बनते हैं?

नदी और समुद्र में जहां पानी लगातार बहता रहता है. वहां पानी के बीच कंक्रीट के पिलर कैसे खड़े किए जाते हैं? इसमें किन- किन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है.

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नदियों और समुद्र में जहां हमेशा पानी भरा रहता है, वहां इन तकनीकों के जरिए बनते हैं पिलर (Photo - AI Generated) नदियों और समुद्र में जहां हमेशा पानी भरा रहता है, वहां इन तकनीकों के जरिए बनते हैं पिलर (Photo - AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 12:25 PM IST

नदी हो या समुद्र, पानी लगातार बहता रहता है। ऐसे में मन में सवाल आता है कि आखिर पानी के बीच पुल के मजबूत पिलर कैसे बनाए जाते हैं? मजदूर वहां खड़े होकर काम कैसे करते हैं? दरअसल, इसके लिए इंजीनियरिंग में दो खास तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है - कॉफरडैम और कैसन.

दोनों का काम पानी और मिट्टी को निर्माण वाली जगह से दूर रखना है, लेकिन दोनों एक जैसे नहीं होते. आसान भाषा में समझें तो कॉफरडैम अस्थायी घेरा है, जबकि कैसन पुल के इंफ्रास्ट्रक्चर या नींव का स्थायी हिस्सा बन जाता है.

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पहले पानी को रोका जाता है, फिर शुरू होता है काम
मान लीजिए नदी के बीच पुल का एक पिलर बनाना है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जिस जगह नींव बनानी है, वहां पानी लगातार मौजूद है. ऐसे में इंजीनियर पहले निर्माण वाली जगह के चारों तरफ एक मजबूत, पानी रोकने वाला वाटर टाइट घेरा बनाते हैं. इसे कॉफरडैम कहा जाता है.

कॉफरडैम बनने के बाद उसके अंदर जमा पानी को पंप करके बाहर निकाला जाता है. इससे नदी के बीच एक ऐसा सूखा हिस्सा तैयार हो जाता है, जहां मजदूर और मशीनें  सुरक्षित तरीके से नींव की खुदाई और पिलर बनाने का काम कर सकें.

कॉफरडैम बनाने में स्टील की शीट पाइल, लकड़ी, मिट्टी या कंक्रीट जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके निर्माण में जरूरत के हिसाब से पहले पानी के नीचे की मिट्टी हटाई जा सकती है. फिर सपोर्ट पाइल लगाए जाते हैं और स्टील शीट पाइल को जमीन में धंसा दिया जाता है. इसके बाद अंदर की मिट्टी की खुदाई और पानी निकालने का काम होता है.

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काम पूरा हुआ तो कॉफरडैम भी हट गया
कॉफरडैम की सबसे खास बात यही है कि यह स्थायी नहीं होता. इसका इस्तेमाल सिर्फ निर्माण के दौरान किया जाता है. जब पुल का पिलर या दूसरी संरचना तैयार हो जाती है, तो कॉफरडैम को हटा दिया जाता है.

इसी वजह से कॉफरडैम का इस्तेमाल आमतौर पर नदी के अपेक्षाकृत कम गहरे हिस्सों में किया जाता है. करीब 12 से 18 मीटर तक की गहराई वाले क्षेत्रों में यह तकनीक खास तौर पर उपयोगी हो सकती है. पुल के पिलर की मरम्मत, अस्थायी डॉक बनाने या पानी के अंदर खुदाई जैसे कामों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

लेकिन गहरा पानी हो तो क्या?
अब सवाल आता है कि अगर पानी बहुत गहरा हो और पुल को भारी वजन संभालना हो तो क्या किया जाए? ऐसे मामलों में कैसन काम आता है. कैसन को आप एक बड़े, मजबूत और पानी रोकने वाले ढांचे की तरह समझ सकते हैं. इसे जमीन या पानी के नीचे तय जगह पर उतारा जाता है. 

इसे नीचे तक ले जाकर मजबूत नींव तैयार की जाती है. आमतौर पर इसमें कंक्रीट भर दिया जाता है. सबसे अहम बात यह है कि कैसन को काम पूरा होने के बाद बाहर नहीं निकाला जाता, बल्कि यह अंतिम संरचना का हिस्सा बन जाता है.

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कैसन का इस्तेमाल पुलों, डॉक, बंदरगाहों और पानी या नरम मिट्टी वाले इलाकों में भारी संरचनाओं की नींव बनाने में किया जाता है. गहरे पानी और ज्यादा भार वाली परियोजनाओं में इसकी उपयोगिता बढ़ जाती है.

कैसन भी कई तरह के होते हैं
काम और जगह के हिसाब से कैसन अलग-अलग प्रकार के हो सकते हैं. इनमें ओपन कैसन, बॉक्स कैसन और न्यूमैटिक कैसन प्रमुख हैं. कैसन बनाने के लिए स्टील, लकड़ी, चिनाई और कंक्रीट जैसे मटेरियल्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. यानी यह सिर्फ पानी रोकने का इंतजाम नहीं है, बल्कि जिस संरचना की नींव तैयार की जा रही है, उसकी मजबूती का अहम हिस्सा भी बन सकता है.

कॉफरडैम और कैसन में फर्क
कॉफरडैम और कैसन में फर्क को इस तरह से समझें. कॉफरडैम पानी के बीच पिलर खड़ा करने या अन्य काम करने के लिए पानी को अस्थायी रूप से रोकने वाली दीवार है.  वहीं कैसन,  गहराई में जाकर बनने वाली पुल की स्थायी नींव होती है. 

कॉफरडैम को काम खत्म होने के बाद हटा दिया जाता है, जबकि कैसन को स्ट्रक्चर के साथ ही छोड़ दिया जाता है. कॉफरडैम में पानी बाहर निकालकर सूखा कार्य क्षेत्र बनाया जाता है, जबकि कैसन का मुख्य मकसद गहराई में मजबूत और स्थायी नींव तैयार करना होता है.

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यानी नदी या समुद्र में पुल का पिलर बनाना सिर्फ पानी के बीच कंक्रीट डाल देने का काम नहीं है. पहले पानी और मिट्टी को नियंत्रित करना पड़ता है, फिर जमीन को स्थिर करना होता है.  उसके बाद ही पुल की मजबूत नींव तैयार की जाती है. कॉफरडैम और कैसन जैसी तकनीकें इसी मुश्किल काम को संभव बनाती हैं.

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