14 अगस्त 1917 को जब प्रथम विश्व युद्ध अपने चौथे वर्ष में प्रवेश कर रहा था. चीन ने अपनी तटस्थता छोड़कर जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत से ही यह केवल यूरोपीय महाद्वीप तक सीमित नहीं था. सुदूर पूर्व में, दो प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र, जापान और चीन, इस महान संघर्ष में अपनी भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे थे. चीन ने अपनी खोई हुई जमीन को फिर से हासिल करने की उम्मीद में युद्ध का ऐलान किया था.
पूर्वी एशिया में महत्वाकांक्षी जापान, जो 1902 से ब्रिटेन का सहयोगी था. उसने युद्ध में उतरने में जरा भी देर नहीं की और 23 अगस्त 1914 को जर्मनी पर युद्ध की घोषणा कर दी. उसने तुरंत जलमार्ग से हमले शुरू कर दिए. चीन के शान्तुंग प्रायद्वीप पर स्थित जर्मनी के सबसे बड़े नेवल बेस, त्सिंगताओ पर कब्जा करने की योजना बनाई. लगभग 60,000 जापानी सैनिकों ने, दो ब्रिटिश बटालियनों की सहायता से, चीनी तटस्थता का उल्लंघन करते हुए समुद्र के रास्ते त्सिंगताओ की ओर कूच किया.
7 नवंबर को जर्मन गैरीसन के सरेंडर के बाद नौसैनिक अड्डे पर कब्जा कर लिया. उसी जनवरी में, जापान ने चीन के सामने 21 मांगें रखीं. इनमें शान्तुंग, दक्षिणी मंचूरिया और पूर्वी भीतरी मंगोलिया के अधिकांश भाग पर सीधे जापानी नियंत्रण का विस्तार और जर्मनी के कंट्रोल वाले दक्षिण प्रशांत के द्वीपों पर कब्जा करना शामिल था.
14 अगस्त 1917 को जब चीन ने जर्मनी पर युद्ध की घोषणा की, तो उसका प्रमुख उद्देश्य युद्ध के बाद की बातचीत में अपना स्थान सुरक्षित करना था. सबसे बढ़कर, चीन महत्वपूर्ण शान्तुंग प्रायद्वीप पर फिर से कंट्रोल चाहता था. क्षेत्र में अपने सबसे महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी और नियंत्रण के लिए संघर्षरत प्रतिद्वंद्वी जापान के समक्ष अपनी शक्ति का पुन: प्रदर्शन करना चाहता था.
युद्धविराम के बाद वर्साय शांति सम्मेलन में, जापान और चीन ने शान्तुंग प्रायद्वीप पर अपने-अपने दावों को लेकर मित्र राष्ट्रों की सर्वोच्च परिषद (जिस पर अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन का वर्चस्व था) को समझाने के लिए कड़ा संघर्ष किया. अंततः जापान के पक्ष में एक समझौता हुआ, जिसमें जापान ने संधि में नस्लीय समानता के प्रावधान की अपनी मांग को छोड़ दिया. इसके बदले में जापान को शान्तुंग में जर्मनी की महत्वपूर्ण आर्थिक संपत्तियों, जिनमें रेलवे, खदानें और त्सिंगताओ बंदरगाह शामिल थे, पर नियंत्रण प्राप्त हुआ.
हालांकि जापान ने शान्तुंग का नियंत्रण चीन को लौटाने का वादा किया था और उसने फरवरी 1922 में ऐसा किया भी. लेकिन वर्साय में मित्र देशों द्वारा जापान का पक्ष लेने के निर्णय से चीनी लोग बेहद नाराज थे. 4 मई 1919 को तियानमेन चौक पर एक विशाल प्रदर्शन हुआ , जिसमें शांति संधि का विरोध किया गया. इस पर वर्साय में चीनी प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था. एक चीनी छात्र ने याद करते हुए कहा कि जब पेरिस शांति सम्मेलन की खबर हम तक पहुंची तो हम बहुत हैरान हुए. हमें तुरंत एहसास हुआ कि विदेशी राष्ट्र अभी भी स्वार्थी और सैन्यवादी हैं और वे सभी बड़े झूठे हैं.
शांति सम्मेलन समाप्त होने के एक साल बाद, कट्टरपंथी चीनी राष्ट्रवादियों ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया. इसने माओ त्से-तुंग और चाउ एन-लाई के नेतृत्व में, साथ ही वर्साय संधि विरोधी प्रदर्शनों के कई अन्य पूर्व नेताओं के नेतृत्व में, 1949 में चीन में सत्ता हासिल की.
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