UP: बिन किताबों के पढ़ रहे बच्चे, अभी तक नहीं हुई छपाई

फिलहाल यूपी के लगभग दो लाख प्राइमरी और मिडिल स्कूलों मे बिना किताबों के या फिर पुरानी किताबों के सहारे पढ़ाई चल रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सारे विवादों को सुलझा लिया गया है और अगले पंद्रह दिनों के बाद किताबें बंटनी शुरू हो जाएगीं.

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पुरानी किताबों से काम चला रहे बच्चे पुरानी किताबों से काम चला रहे बच्चे

लव रघुवंशी / अनूप श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 06 जुलाई 2016,
  • अपडेटेड 10:11 AM IST

आप मानें या ना मानें लेकिन ये हकीकत कि यूपी के सरकारी स्कूलों मे बच्चों की पढ़ाई बिना किताबों के हो रही है. कक्षा एक से लेकर कक्षा आठ तक के तकरीबन डेढ़ करोड़ से उपर बच्चों को जुलाई के पहले हफ्ते मे स्कूल खुलने के साथ ही मुफ्त सरकारी किताबें मिल जाती है, लेकिन इस साल टेंडर प्रकिया के विवादों मे फंस जाने और सरकारी हीलाहवाली के चलते ये किताबें अभी तक छपाई के लिये भी नही जा पाई हैं.

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फिलहाल यूपी के लगभग दो लाख और मिडिल स्कूलों मे बिना किताबों के या फिर पुरानी किताबों के सहारे पढ़ाई चल रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सारे विवादों को सुलझा लिया गया है और अगले पंद्रह दिनों के बाद किताबें बंटनी शुरू हो जाएगीं, लेकिन इस देरी के चलते बच्चों के पढ़ाई के हो रहे नुकसान पर फिलहाल सरकार कुछ कहने की स्थिति मे नही है. गौरतलब है कि सरकार को आने वाले दिनों बच्चों मे लगभग तेरह करोड़ किताबें छापकर बांटनी हैं. यूपी सरकार के साथ काम कर चुके पुराने प्रकाशकों का मानना है कि सरकार को इस काम को पूरा करने मे लगभग तीन महीने का समय और लग जाएगा.

पुरानी किताबों से काम चला रहे बच्चे
'सब पढ़ें-सब बढ़ें' का नारा देने वाले उत्तर प्रदेश के सरकारी परिषदीय स्कूलों का नया सत्र तो दो जुलाई से शुरू हो गया है, लेकिन विभाग अभी तक स्कूल के बच्चों को मिलने वाली किताबें मुहैया नहीं करा पाया है. यूपी के परिषदीय विद्यालयों में कक्षा एक से लेकर कक्षा आठ तक पढ़ने वाले लाखों छात्र अपने सीनियर्स की उन फटी पुरानी किताबों से काम चला रहे हैं, जो पास आउट होने के बाद अध्यापकों ने उनको मुहैया कराई हैं.

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दरअसल हर साल फरवरी मे किताबों की छपाई का टेंडर जारी हो जाता था और जून तक किताबें छपकर जुलाई मे बंट जाती थी. मगर इस बार सरकार के आला अधिकारियों के एक आदेश के चलते पूरी प्रक्रिया ही लेट हो गई है. इस बार शिक्षा विभाग ने ये सरकारी आदेश जारी कर दिया कि किताबें पार्यावरण के अनुकूल (ENVIRNMENT FRIENDLY) कागजों पर ही छपेगीं, जबकि इससे पहले परंपरागत कागजों (RECYCLE PAPERS) किताबों की छपाई हो जाती थी. हालांकि बेसिक शिक्षा के आला अधिकारियों का कहना है कि ऐसा हाईकोर्ट के एक आदेश के तहत किया गया. लेकिन इसके चलते न केवल टेंडर प्रक्रिया मे देरी हुई बल्कि छपाई की लागत भी बढ़ गई. पिछले साल टेंडर की दर एक रूपये नौ पैसे प्रति फार्म (आठ पेज) की थी जबकि इस साल ये दर एक रूपये अड़तीस पैसे हो गई, पिछले साल कुल छपाई का ठेका 200 करोड़ का था जबकि इस साल ये ठेका बढ़कर 260 करोड़ का हो गया है.


बेसिक शिक्षा के साथ पिछले कई सालों से काम कर रहे पुराने प्रकाशकों का आरोप है कि बेसिक शिक्षा विभाग में आला अधिकारियों की मनमानी चल रही है और जानबूझकर गाजियाबाद की एक फर्म को फायदा पहुचाने के लिये उनके आवेदन (टेंडर) को डिसक्वालिफाई (रद्द) कर दिया गया, जिसके विरोध मे वो हाई कोर्ट चले गए. इसके चलते टेंडर प्रक्रिया विवादों मे फंस गई और किताबों की छपाई का काम अधर मे लटक गया और सरकार को साठ करोड़ का अतिरिक्त भार भी सहना पड़ रहा है.

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उधर सरकार का कहना है कि पर्यावरण की सुरक्षा के लिये ये फैसला किया गया और टेंडर प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी रखा गया है, टेंडर हो चुके हैं किताबें छपने के लिए जा चुकी हैं और अगले पंद्रह दिनों मे इसे बांटने का काम शुरू कर दिया जाएगा. सबसे पहले बाढ़ प्रभावित इलाकों मे किताबे बांटी जाएगीं बाद मे दूसरी जगहों पर.

सचिव बेसिक शिक्षा अधिकारी अजय प्रताप सिंह ने कहा कि टेंडर में कुछ लीगल इश्यूज आ गए थे. और अभी वह सब शार्टआउट हो गए हैं. और एग्रीमेन्ट भी हो गए हैं. 15 दिन के अंदर किताबें मिलनी शुरू हो जाएगीं.

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