दिलजीत दोसांझ की 'सतलुज' पर बैन से पंजाब में भूचाल, BJP-कांग्रेस और AAP आई साथ!

दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को जी5 से दो दिन बाद भारत में हटा दिया गया. इस फैसले के बाद पंजाब की राजनीति में भारी विवाद छिड़ गया है. कई राजनीतिक दलों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया है और फिल्म को तुरंत बहाल करने की मांग की है.

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पंजाब में राजनीतिक दल 'सतलुज' की बहाली की मांग कर रहे हैं. (Photo- Social Media) पंजाब में राजनीतिक दल 'सतलुज' की बहाली की मांग कर रहे हैं. (Photo- Social Media)

कमलजीत संधू

  • चंडीगढ़,
  • 06 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:42 PM IST

दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही अचानक भारत में हटा दिया गया. इसे लेकर अब पंजाब की राजनीति में हंगामा मच गया है. राज्य के तमाम बड़े राजनीतिक दलों और संगठनों ने फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने की निंदा की है.

बता दें कि 'सतलुज' पंजाब में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म है. खालड़ा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर में पुलिस के किए कई अवैध हत्याओं और गुप्त रूप से शवों का अंतिम संस्कार किए जाने के मामलों का पर्दाफाश किया था.

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ऐसे में 'सतलुज' को अचानक ओटीटी से गायब करने को लेकर नेताओं का कहना है कि ये अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला है. उनके मुताबिक, इसके जरिए ऐतिहासिक सच को दबाने की कोशिश की जा रही है.

राजनीतिक दलों ने की तुरंत बहाली की मांग

फिल्म को अचानक हटाए जाने के विरोध में पंजाब के सभी प्रमुख दलों के नेता एकजुट नजर आ रहे हैं. वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुखपाल सिंह खैरा ने कहा कि ये इस बात का सबूत है कि भगवंत मान सरकार के तहत पंजाब में आज भी वही 'पुलिस स्टेट' बेधड़क काम कर रहा है. खैरा ने कहा कि ये फिल्म उन सच्चे तथ्यों पर आधारित है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषी पुलिस अधिकारियों को सजा सुनाते समय सही माना था. उन्होंने भारत सरकार से फिल्म को तुरंत जी5 पर बहाल करने की मांग की है.

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है- सुखबीर सिंह बादल 

अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इस फैसले पर हैरानी और दुख जताया है. उन्होंने 'एक्स' पर लिखा कि पंजाब के दर्दनाक इतिहास को उजागर करने वाली और जसवंत सिंह खालड़ा के सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करने वाली एक मजबूत फिल्म को इस तरह चुप नहीं कराया जा सकता. ये सिर्फ सेंसरशिप नहीं, बल्कि हमारी यादों, सच्चाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है.

चीमा ने केंद्र और पंजाब सरकार से मांगा जवाब

अकाली दल के दलजीत सिंह चीमा ने इस कदम को पूरी तरह अलोकतांत्रिक बताया है. उन्होंने तर्क दिया कि 'सतलुज' किसी खालिस्तानी या उग्रवादी चरित्र पर नहीं, बल्कि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता पर आधारित है. खालड़ा पर कोई आपराधिक मामला नहीं था. केंद्र और पंजाब सरकार दोनों को इस पर जवाब देना चाहिए.

आम आदमी पार्टी पंजाब के मीडिया प्रभारी बलतेज सिंह पन्नू ने भी इसे आर्टिस्टिक फ्रीडम पर हमला करार दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि ये कदम पंजाब के इतिहास से जुड़े नैरेटिव में केंद्र सरकार के लगातार हस्तक्षेप और पंजाब की आवाजों को दबाने की कोशिश को दिखाता है. उन्होंने फिल्म को तुरंत वापस लाने की मांग की है.

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शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि कोई भी प्रतिबंध सिखों पर हुए अत्याचारों के सच को मिटा नहीं सकता. ये फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाती है, जिस पर सेंसरशिप लगाने के बजाय खुली बहस होनी चाहिए.

पंजाब बीजेपी के अध्यक्ष केवल ढिल्लों ने कहा है कि उनकी पार्टी इस मामले को केंद्रीय नेतृत्व के सामने उठा रही है.

कानूनविदों और पूर्व अधिकारियों के अलग-अलग नजरिए

जसवंत सिंह खालड़ा की मानवाधिकार टीम का हिस्सा रहे और इस मामले के वरिष्ठ वकील नवकिरण सिंह ने कहा कि 'सतलुज' को हटाना पूरी तरह गलत है. फिल्म में दिखाए गए तथ्य बिल्कुल सच्चे हैं, जिनमें बिना पहचान के अवैध रूप से जलाए गए 2,097 शवों के श्मशान घाट के रिकॉर्ड शामिल हैं. उन्होंने कहा कि फिल्म को रोकने से पंजाब में बीजेपी को नुकसान हो सकता है, लेकिन इससे खालिस्तानी माहौल को कोई बढ़ावा नहीं मिलने वाला.

दूसरी तरफ, साल 1992 से 1996 के दौरान अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर रहे पूर्व आईएएस अधिकारी केबीएस सिद्धू ने एक अलग पहलू सामने रखा. उन्होंने कहा कि फिल्म को हटाना शायद कानून-व्यवस्था और पब्लिक पीस बनाए रखने के मकसद से किया गया हो सकता है. सिद्धू ने माना कि फिल्म की कहानी पूरी तरह सच है और ये सीबीआई जांच में भी साबित हो चुकी है.

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उन्होंने याद दिलाया कि 6 सितंबर 1995 को जब खालड़ा को उनके घर से उठाया गया था, तो उन्होंने खुद अगले ही दिन मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए थे. हालांकि, उनका मानना है कि इस फिल्म से कुछ खालिस्तानी तत्वों को बढ़ावा मिल सकता है, इसलिए सच बताने का तरीका अलग हो सकता था.

नई पीढ़ी के लिए सच जानना जरूरी

पटियाला में जसवंत सिंह खालड़ा के करीबी सहयोगी रहे एडवोकेट बरिंदर सिंह सोढ़ी ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय इन्हें जनता तक पहुंचने दिया जाना चाहिए ताकि नई पीढ़ी उस दौर की असल हकीकत को समझ सके. उन्होंने याद किया कि कैसे खालड़ा के अपहरण के बाद उनकी पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसके बाद मामला सीबीआई को सौंपा गया और परिवार को न्याय मिला.

3-4 सालों तक चली सेंसरशिप की लड़ाई

'सतलुज' को पहले ही रिलीज के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा था. सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म में 120 से ज्यादा कट्स लगाने की मांग की थी. 3-4 साल तक चली लंबी सेंसरशिप की लड़ाई के दौरान इस फिल्म का नाम 'घल्लूघारा' से बदलकर पहले 'पंजाब 95' और फिर आखिर में 'सतलुज' रखा गया.

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3 जुलाई को 'सतलुज' को बिना किसी कट के ZEE5 पर रिलीज किया गया था, लेकिन दो दिन बाद ही इसे भारत में अनअवेलेबल कर दिया गया. फिल्म को लेकर अभिनेता और सिंगर दिलजीत दोसांझ ने पहले ही कहा था कि उन्हें इस पर प्रतिबंध लगने की आशंका थी. फिल्म हटने के बाद दिलजीत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, 'अब ये फिल्म नहीं रुकेगी. खालड़ा साहब की आवाज को कोई नहीं दबा सकता.'

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