सात राज्य और 940 सीटें तय करेंगी, 2029 चुनाव में कैसी होगी सियासी तस्वीर

2027 में होने वाले सात राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के दबदबे, योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षाओं, अखिलेश यादव की विश्वसनीयता और कांग्रेस के अस्तित्व की परीक्षा लेंगे. इससे यह भी पता चलेगा कि क्या विपक्ष 2029 में बीजेपी को हिला सकता है.

Advertisement
2027 में 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव है.  (Photo: Chandradeep Kumar) 2027 में 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव है. (Photo: Chandradeep Kumar)

कौशिक डेका

  • नई दिल्ली,
  • 03 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:09 PM IST

29 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनावों में बीजेपी को वाराणसी की दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी के हाथों हार का सामना करना पड़ा. यह हार तब हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी के नौ मंत्री और सात विधायक प्रचार कर रहे थे. महाराष्ट्र के नागपुर में जोकि RSS का मुख्यालय है, वहां पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने 3271 वोटों से अपनी ग्रेजुएट्स सीट बरकरार रखी है. 

Advertisement

फिर भी इसे कोई करारी हार नहीं कहा जा सकता. चार राज्यों में शिक्षकों और ग्रेजुएट्स की कुल 28 सीटों में से बीजेपी ने अपने दम पर 13 सीटें जीतीं, और नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) ने 16 सीटें जीतीं . ये आंकड़ा पहले 18 था. कांग्रेस को केवल एक सीट (नागपुर में) मिली, 
लेकिन कांग्रेस कर्नाटक में अपनी चारों सीटें हार गईं, जहां अभी उसका ही शासन है. इस प्रदर्शन पर PM मोदी ने खास तौर पर तंज कसा. इन नतीजों से न तो कोई बीजेपी-विरोधी लहर दिखी और न ही विपक्ष के उठान के संकेत मिले. इसके बजाय इसने एक बड़ी चुनावी परीक्षा से पहले पार्टी के भीतर की कमियों को उजागर कर दिया. 

सात राज्यों में जहां कुल 940 विधानसभा क्षेत्र और 132 लोकसभा सीटें हैं, 2027 में चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में सबसे पहले, फरवरी-मार्च के दौरान मतदान होने की उम्मीद है. इसके बाद साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे. इन सात राज्यों में से पांच में भाजपा की सरकार है, जबकि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस और पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है. 

Advertisement

940 विधानसभा सीटों में से 557 सीटें अकेले भाजपा के पास हैं. इसके सहयोगियों के पास 47 सीटें हैं, और 12 निर्दलीय उम्मीदवार भी इस गठबंधन का समर्थन कर रहे हैं. इस तरह NDA के पास कुल 616 सीटे हैं. यानी लगभग हर तीन में से दो सीटें. कांग्रेस के पास 98 सीटें हैं. आम आदमी पार्टी जिसने जुलाई 2025 में INDIA गठबंधन छोड़ दिया था, के पास 101 सीटें हैं, जिनमें से लगभग सभी पंजाब से हैं. 

अकेले उत्तर प्रदेश और गुजरात में 585 विधानसभा सीटें और 106 लोकसभा सीटें हैं. इन दोनों जगहों पर अपनी स्थिति बनाए रखने से जून 2024 के बाद से भाजपा की रिकवरी और मजबूत होगी. उस समय लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा की सीटें घटकर 240 रह गई थीं, जिससे PM मोदी की तीसरी सरकार को तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा था. इसलिए ये सात विधानसभा चुनाव 2029 के आम चुनावों से पहले केंद्री की सरकार के राजनीतिक प्रभाव और उसे चुनौती देने वालों की विश्वसनीयता की परीक्षा लेंगे. 

अगर भाजपा इन चुनावों में हारती भी है तो भी केंद्र सरकार के बहुमत पर कोई खतरा नहीं आएगा. मोदी के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा 2024 के झटकों से पूरी तरह उबर चुकी है. तब से NDA ने बिहार में बड़ी जीत हासिल की है, असम में अपनी सत्ता बरकरार रखी है और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से सत्ता छीन ली है. अगर भाजपा अपने मुख्य गढ़ों को बचाए रखती है, तो इससे यह संकेत मिलेगा कि 2024 का परिणाम केवल एक अस्थायी रुकावट थी, न कि पार्टी के लगातार कमजोर होने की शुरुआत. 

Advertisement

अब अगर भाजपा बड़े राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश को गंवा देती है, तो पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण चुनावी जमीन पर उसकी पकड़ को लेकर फिर से सवाल उठने लगेंगे. 

इसका एक संवैधानिक आयाम भी है. नवनिर्वाचित नेता जुलाई 2027 में राष्ट्रपति चुनाव में मतदान करेंगे. उत्तर प्रदेश के प्रत्येक विधायक के वोट की कीमत 208 है, जो देश में सबसे अधिक है. इसलिए राज्य के 403 विधायक न केवल ये तय करेंगे कि लखनऊ पर शासन कौन करेगा, बल्कि वे उस निर्वाचन मंडल का हिस्सा बनेंगे जो अगले राष्ट्रपति को चुनने वाला है. ये नतीजे राज्यसभा की तस्वीर भी बदलेंगे. 

2022 में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभाओं में से 255, एसपी ने 111 और कांग्रेस ने सिर्फ दो सीटें जीतीं. योगी आदित्यनाथ 37 वर्ष बाद 
एक पारी पूरी करके सत्ता में वापसी करने वाले पहले मुख्यमंत्री बने. राष्ट्रीय लोक दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के एसपी खेमे से बाहर आने के बाद अब NDA के 292 विधायक हो गए हैं. समाजवादी पार्टी के चार बागियों ने भी गठबंधन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की है. 

लगातार तीसरी जीत आदित्यनाथ को आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश का ऐसा पहला मुख्यमंत्री बना देगी जिसने अपनी पार्टी को लगातार तीन विधानसभा चुनावों में जीत दिलाई हो. इससे 2024 के उस राजनीतिक नुकसान की भरपाई में भी मदद मिलेगी, जब बीजेपी राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से केवल 33 सीटें ही जीत पाई थी. इस तरह का परिणाम, मोदी-शाह के बाद बीजेपी के नेतृत्व को लेकर होने वाली भविष्य की चर्चाओं में आदित्यनाथ की स्थिति को मजबूत करेगा. हिंदुत्व, सख्त पुलिसिंग और कल्याणकारी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने की उनकी रणनीति को एक बार फिर से मजबूती मिलेगी. दूसरी ओर अगर उन्हें हार का सामना करना पड़ता है या बहुमत काफी कम हो जाता है, तो बीजेपी के भीतर विभिन्न जातियों के गठबंधन को एकजुट रखने की आदित्यनाथ की क्षमता पर सवाल उठने लगेंगे. 

Advertisement

सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए दांव और भी बड़ा हो सकता है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार, तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का सत्ता से बाहर होना, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल का पतन और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की कमजोर होती स्थिति ने विपक्ष के कई प्रमुख केंद्रों को कमजोर कर दिया है. ऐसे में अखिलेश यादव INDIA गठबंधन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय नेता के रूप में उभरे हैं. 

उनका 'PDA' फॉर्मूला - जो पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं पर केंद्रित है - ने 2024 में सपा को 37 लोकसभा सीटें जिताने में मदद की. यह संख्या बीजेपी से चार अधिक थी, और उनके सहयोगी दल कांग्रेस ने इसमें छह सीटें और जोड़ दीं. 

अखिलेश के सामने सबसे पहली परीक्षा राहुल गांधी के साथ उनकी साझेदारी की है. उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत में पुरानी खींचतान फिर से सामने आ गई है. राज्य में केवल दो विधायक होने के बावजूद कांग्रेस ने कथित तौर पर लगभग 170 सीटों की मांग की है, जबकि समाजवादी पार्टी के नेता 60 से 70 सीटें देने की बात कर रहे हैं. अखिलेश ने सितंबर में राहुल के लोकसभा क्षेत्र रायबरेली से अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत की थी. उनका कहना है कि सीटें उसी पार्टी को दी जाएंगी, जिसके जीतने की संभावना सबसे ज्यादा होगी.

Advertisement

कांग्रेस की पहुंच राष्ट्रीय स्तर पर तो है, लेकिन उत्तर प्रदेश में विधानसभा स्तर पर उसका संगठन काफी कमजोर है. अखिलेश के पास राज्य स्तर पर मजबूत संगठन है, लेकिन उन्हें कांग्रेस समर्थकों के वोटों को अपने पक्ष में ट्रांसफर कराने की जरूरत है. इस बीच, RLD और SBSP जैसे SP के पुराने सहयोगी दल NDA में शामिल हो गए हैं. वहीं, बहुजन समाज पार्टी दलित वोटों को अपनी ओर खींचकर कड़े मुकाबलों के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. असली चुनौती एक ऐसे सामाजिक गठबंधन को तैयार करना है, जो न केवल राष्ट्रीय चुनावों में कारगर रहा हो, बल्कि राज्य के चुनावों में भी स्थानीय स्तर की आपसी प्रतिद्वंद्विता को झेल सके. 

पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है जहां BJP मुख्य दावेदार नहीं है. 2022 में, सत्ताधारी AAP ने 117 में से 92 सीटें जीतीं, जिससे उसे दिल्ली के बाहर भी शासन करने का आधार मिल गया. राष्ट्रीय राजधानी में सत्ता गंवाने के बाद पंजाब को अपने पास बनाए रखना पार्टी की राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गया है.  

कांग्रेस, जिसने 2024 में पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से सात जीती थीं, अब एक मौका देख रही है, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान ने उसे बांट रखा है.

Advertisement

शिरोमणि अकाली दल (SAD) कमजोर हो गया है, जबकि अमृतपाल सिंह का नया 'पंथिक' गुट सिख राजनीतिक दायरे को और अधिक विभाजित कर सकता है.  BJP और अकाली दल के बीच गठबंधन की नई चर्चाएं एक और नया पहलू जोड़ती हैं.अगर ये दोनों फिर से एक साथ आते हैं, तो इसका असर इस बात पर पड़ सकता है कि AAP-विरोधी वोट कैसे बंटते हैं. 

2022 में उत्तराखंड ने BJP को 70 में से 47 विधानसभा सीटें दीं. इसने राज्य में हर चुनाव में सरकार बदलने की पुरानी परंपरा को तोड़ दिया, भले ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी खटीमा सीट हार गए थे. इसके बाद कांग्रेस ने बदरीनाथ और मंगलौर सीट जीती, जिससे उनकी कुल सीटों की संख्या 19 से बढ़कर 20 हो गई.

यहां रोज़गार, पहाड़ी इलाकों से पलायन, पर्यावरण से जुड़े दबाव और 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' जैसे मुद्दे चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभा सकते हैं. अगर सरकार बदलती है, तो यह साबित होगा कि BJP का मजबूत संगठन भी लंबे समय तक स्थानीय असंतोष को दबाकर नहीं रख सकता. वहीं, अगर BJP सत्ता में बनी रहती है, तो इससे एक और उत्तरी राज्य में कांग्रेस का लंबे समय से चल रहा पतन और गहरा हो जाएगा. यह एक ऐसा पैटर्न है जो पहले से ही उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है. 

Advertisement

गोवा में जहां 2012 से भाजपा सत्ता में है, कांग्रेस के सामने एक अलग तरह की चुनौती है. 2022 में भाजपा ने 40 में से 20 सीटें जीतीं और बाद में कांग्रेस के 11 विधायकों में से 8 को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया. कांग्रेस के पास अब केवल 3 विधायक बचे हैं, जो यह याद दिलाते हैं कि चुनाव जीतना और चुने गए प्रतिनिधियों को अपने साथ बनाए रखना, ये दोनों अलग-अलग चुनौतियां हैं.  

मणिपुर का मामला कोई आम चुनावी मुकाबला नहीं है. मई 2023 में जातीय हिंसा भड़कने के बाद से 250 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हज़ारों लोग विस्थापित हो गए हैं. 2022 में भाजपा ने 60 विधानसभा सीटों में से 32 पर जीत हासिल की थी, लेकिन दो साल बाद कांग्रेस ने दोनों लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की. एन. बीरेन सिंह का मुख्यमंत्री पद से हटना, लगभग एक साल तक राष्ट्रपति शासन लागू रहना, और फरवरी 2026 में युमनाम खेमचंद सिंह का मुख्यमंत्री बनना. ये सभी सरकार को नए सिरे से व्यवस्थित करने की कोशिशें थीं. फिर भी इनमें से कोई भी कदम मूल संकट को हल नहीं कर पाया है.

मणिपुर की घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों के निर्वाचन क्षेत्र सुरक्षा, क्षेत्र और स्वायत्तता के मुद्दों पर बंटे हुए हैं. कुकी-ज़ो समुदाय की अलग प्रशासन की मांग अभी भी बनी हुई है, और विभिन्न समुदायों के बीच आपसी भरोसा बहुत कमज़ोर है.  भाजपा के लिए, बिना सुलह के चुनाव जीतना एक सीमित सफलता ही मानी जाएगी. कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह इस संघर्ष से उपजे गुस्से को एक भरोसेमंद चुनावी विकल्प में कैसे बदले; इसके लिए उसे ऐसे उम्मीदवार और गठबंधन चाहिए जो पूरी तरह से बंटे हुए समुदायों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें. 

गुजरात, जो मोदी और अमित शाह का गृह राज्य है, वहां 1995 से भाजपा का शासन है. 2022 में 156 सीटों की रिकॉर्ड जीत, उसके बाद अन्य दलों से नेताओं के आने से पार्टी का विस्तार, और अप्रैल में सभी 15 नगर निगमों में मिली जीत ने कांग्रेस को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां उसे BJP और AAP दोनों के सामने अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. रोजगार, किसानों की चिंताएं और स्थानीय मुद्दे कुछ ऐसे रास्ते हैं, जिनके जरिए इस बेहद मजबूत सत्ताधारी पार्टी को चुनौती दी जा सकती है. 

हिमाचल प्रदेश में स्थिति बिल्कुल उलट है. 2022 में कांग्रेस ने 68 में से 40 सीटें जीतीं और पार्टी के भीतर हुए विद्रोह को भी संभाल लिया, लेकिन मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के सामने वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है. यह एक ऐसा राज्य है जहां 1985 के बाद से किसी भी मौजूदा सरकार को जनता ने दोबारा नहीं चुना है. फिर भी फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस-वोटिंग के कारण कांग्रेस के छह विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद, पार्टी ने बाद में हुए नौ उपचुनावों में से छह सीटें जीतीं, जिससे विधानसभा में सीटों का समीकरण फिर से 40-28 हो गया. 

इन मुकाबलों से इतर एक और राजनीतिक धारा बह रही है, जो कथित तौर पर GEN-G के असंतोष से प्रेरित है. 'कॉकरोच जनता पार्टी' परीक्षाओं में गड़बड़ी, बेरोजगारी और संस्थागत जवाबदेही जैसे मुद्दों पर युवाओं को एकजुट करने का एक जरिया बनकर उभरी है. जुलाई में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले, NEET-UG संकट और दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.

 CJP जो कोई पंजीकृत चुनावी पार्टी नहीं है, अब मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों में भी शामिल हो गई है. इसका राजनीतिक महत्व इस बात में है कि क्या निराश छात्र और नौकरी की तलाश कर रहे युवा, मतदान प्रतिशत और चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं, और क्या स्थापित राजनीतिक दल उनकी शिकायतों का कोई ठोस समाधान दे पाते हैं.

इन नतीजों से अगला प्रधानमंत्री नहीं चुना जाएगा, लेकिन ये उस मुकाबले की दिशा तय करने में मदद जरूर करेंगे. BJP के लिए मुख्य परीक्षा यह है कि क्या लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद उनका राजनीतिक दबदबा कायम रह सकता है. विपक्ष के लिए सवाल यह है कि क्या अखिलेश, राहुल, कांग्रेस और अन्य विरोधी दल, बिखरे हुए असंतोष को संगठनात्मक ताकत और मजबूत गठबंधन में बदल सकते हैं. युवाओं के इस उभरते आंदोलन के लिए चुनौती यह है कि क्या सड़कों पर दिख रहा उनका गुस्सा, मतदान केंद्रों तक भी पहुंच पाता है. इस लिहाज से 2027 में पड़ने वाले शुरुआती वोट 2029 की राजनीति की दिशा तय करने में मददगार साबित हो सकते हैं. 
 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »