देश की राजनीति में कांग्रेस से अलग क्षेत्रीय दलों को साथ लाकर एक बार फिर तीसरा मोर्चा बनाने की चर्चा तेज हो गई है. लोकसभा चुनाव 2029 में अभी करीब तीन साल का वक्त है, लेकिन डीएमके ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को नए सिरे से तय करने की कवायद शुरू कर दी है.
दरअसल, DMK सांसद कनिमोझी करुणानिधि पिछले कुछ समय से कई प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं से मुलाकात कर रही हैं. उनकी अगली मुलाकात तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से होने की चर्चा है. हालांकि, अभी इसे किसी नए गठबंधन के गठन का आधिकारिक ऐलान नहीं माना जा रहा है.
अब कनिमोझी के कोलकाता जाकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करने की चर्चा ने तीसरे मोर्चे की अटकलों को और हवा दी है. क्षेत्रीय दलों के बीच कांग्रेस और बीजेपी से अलग किसी राजनीतिक मंच की संभावना को लेकर पहले भी चर्चा होती रही है.
उद्धव ठाकरे से मुलाकात के बाद बढ़ी चर्चा
कनिमोझी ने हाल में मुंबई में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे से उनके आवास मातोश्री में मुलाकात की थी. दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई. उद्धव गुट की ओर से बताया गया कि बैठक में परिसीमन के मुद्दे, INDIA ब्लॉक की स्थिति और विपक्ष में क्षेत्रीय दलों की भूमिका पर चर्चा हुई.
यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस और डीएमके के रिश्तों में तनाव की चर्चा है. कांग्रेस ने अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के साथ राजनीतिक तालमेल बढ़ाया है. इसके बाद डीएमके और कांग्रेस के बीच दूरी को लेकर अटकलें तेज हुई हैं.
कनिमोझी ने इसके बाद दिल्ली में एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार और उनकी बेटी एवं लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले से भी मुलाकात की. इन बैठकों में भी क्षेत्रीय दलों के बीच समन्वय और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की बात सामने आई है.
तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश नई नहीं
गौरतलब है कि कांग्रेस के बिना तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश भारतीय राजनीति में पहले भी कई बार हो चुकी है. 2013 में ममता बनर्जी ने गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी दलों को साथ लाकर 'फेडरल फ्रंट' की बात उठाई थी. इसके कुछ साल बाद तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने भी इस विचार को आगे बढ़ाया. उन्होंने ममता बनर्जी और नवीन पटनायक समेत कई क्षेत्रीय नेताओं से मुलाकात की थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह प्रयास आगे नहीं बढ़ सका.
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी विपक्षी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को साथ लाकर एक 'प्रोग्रेसिव ग्रुप ऑफ स्टेट्स' बनाने की पहल की थी. हालांकि, यह विचार भी किसी व्यापक राष्ट्रीय मोर्चे में तब्दील नहीं हो पाया.
प्रमोद माधव