कुछ दिन पहले सभी जगह एक मगरमच्छ की चर्चा थी. नाम था 'गंगाराम'. छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बावा मोहतरा गांव का वह मगरमच्छ, जिसे ग्रामीण किसी जंगली जानवर की तरह नहीं बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते थे. कहते हैं कि करीब 130 साल तक गांव के तालाब में रहने वाले गंगाराम ने कभी किसी इंसान पर हमला नहीं किया. उसकी मौत हुई तो पूरे गांव में शोक मनाया गया, कई घरों में चूल्हे तक नहीं जले और पूरे सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया. गंगाराम की कहानी ने लोगों को यह भरोसा दिलाया कि इंसान और वन्यजीवों के बीच भरोसे का रिश्ता भी बन सकता है. लेकिन उसी कहानी के कुछ दिन बाद बिहार से आई एक खबर ने लोगों को फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है.
क्या हर मगरमच्छ गंगाराम जैसा होता है? या फिर बरसात का मौसम उनके व्यवहार को बदल देता है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि बिहार के बगहा में एक मगरमच्छ ने खेत जा रही महिला के दोनों पैरों को अपने जबड़ों में दबोच लिया. कुछ सेकेंड की देरी होती तो शायद यह घटना जानलेवा साबित हो सकती थी. यह घटना बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बगहा की है. वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (VTR) से जुड़े भापसा नाला में रविवार सुबह रोज की तरह लोग खेतों की ओर जा रहे थे. पचरुखा सिरिसिया गांव की रहने वाली बरसाती देवी भी अपने पति और अन्य मजदूरों के साथ खेत जाने के लिए निकली थीं. किसी को अंदाजा भी नहीं था कि झाड़ियों में एक मगरमच्छ पहले से घात लगाए बैठा है. जैसे ही महिला नाले के किनारे पहुंची, मगरमच्छ बिजली की रफ्तार से बाहर निकला और उसके दोनों पैरों को अपने मजबूत जबड़ों में जकड़ लिया. महिला की चीख से पूरा इलाका गूंज उठा.
कुछ सेकेंड में बदल गया पूरा मंजर
बरसाती देवी दर्द से चिल्ला रही थीं और मगरमच्छ उन्हें पानी की ओर खींचने की कोशिश कर रहा था. ऐसे में उनके साथ चल रहे ग्रामीणों ने हिम्मत दिखाई. किसी ने लाठी उठाई, किसी ने कुदाल और कई लोगों ने हाथ में मौजूद छाते से ही मगरमच्छ पर हमला करना शुरू कर दिया. लगातार शोर और जवाबी वार से मगरमच्छ घबरा गया और आखिरकार महिला को छोड़कर झाड़ियों में भाग गया. ग्रामीणों का कहना है कि अगर कुछ सेकेंड और देर हो जाती तो महिला की जान बचाना मुश्किल था.
अस्पताल पहुंची महिला, डॉक्टरों ने दी राहत
घटना की सूचना मिलते ही मदनपुर वन क्षेत्र की टीम, डायल-112 पुलिस और स्थानीय जनप्रतिनिधि मौके पर पहुंचे. वन विभाग के कर्मचारियों ने घायल महिला को तुरंत बगहा अनुमंडलीय अस्पताल पहुंचाया. डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद बताया कि महिला खतरे से बाहर है, हालांकि उनके दोनों पैरों में गंभीर चोटें आई हैं.
वन विभाग की चेतावनी- बरसात में सबसे ज्यादा खतरा
मदनपुर वन क्षेत्र पदाधिकारी नसीम अहमद अंसारी के मुताबिक, भापसा नाला मगरमच्छों का प्राकृतिक आवास है. उन्होंने बताया कि मानसून के दौरान पानी बढ़ने से मगरमच्छ ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं और कई बार अपने सामान्य क्षेत्र से बाहर भी निकल आते हैं. वन विभाग ने लोगों से अपील की है कि बरसात में नाले को पार करने से बचें और जहां संभव हो सुरक्षित वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करें. साथ ही घायल महिला के परिवार को नियमानुसार मुआवजा देने की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी.
लेकिन सवाल वही... गंगाराम ने तो कभी हमला नहीं किया
यहीं यह घटना लोगों को छत्तीसगढ़ के गंगाराम की याद दिलाती है. बेमेतरा जिले के बावा मोहतरा गांव के बीचोंबीच बने तालाब में रहने वाला गंगाराम करीब 130 साल तक वहीं रहा. गांव वालों के मुताबिक बच्चे तालाब के किनारे खेलते थे. महिलाएं पानी भरती थीं. लोग रोज उसी तालाब के पास बैठते थे. लेकिन गंगाराम ने कभी किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाया. 2019 में उसकी मौत हुई तो पूरे गांव ने उसे इंसान की तरह विदाई दी. आज उसकी कहानी किताबों तक पहुंचने वाली है.
तो फिर हर मगरमच्छ गंगाराम जैसा क्यों नहीं होता?
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी जंगली जानवर का व्यवहार उसके रहने के स्थान, भोजन, माहौल और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. गंगाराम एक सीमित तालाब में वर्षों तक इंसानों के बीच रहा. ग्रामीणों ने भी उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जिससे टकराव की स्थिति नहीं बनी. वहीं वाल्मीकि टाइगर रिजर्व का मगरमच्छ पूरी तरह प्राकृतिक जंगल और नदी-नालों में रहने वाला शिकारी है. ऐसे मगरमच्छ अपने क्षेत्र में किसी भी हलचल को खतरे की तरह देख सकते हैं.
मानसून में क्यों बढ़ जाते हैं Crocodile Attack
बरसात का मौसम मगरमच्छों के लिए सबसे सक्रिय समय माना जाता है. इसके पीछे कई कारण हैं जैसे नदियां और नाले आपस में जुड़ जाते हैं. मगरमच्छ नए इलाकों तक पहुंच जाते हैं. पानी बढ़ने से उनका मूवमेंट कई गुना बढ़ जाता है.
खेतों में काम शुरू होने से इंसानों का पानी वाले इलाकों में आना-जाना बढ़ जाता है. ऐसे में आमना-सामना होने की संभावना भी बढ़ जाती है. यही वजह है कि हर साल मानसून के दौरान मगरमच्छों के हमलों की खबरें बढ़ने लगती हैं.
कुछ दिन पहले भी हुई थी मौत
स्थानीय लोगों के मुताबिक, भापसा नाला में यह पहली घटना नहीं है. कुछ दिन पहले भी इसी इलाके में मगरमच्छ के हमले में एक ग्रामीण की मौत हो चुकी है. लगातार हो रही घटनाओं के कारण आसपास के गांवों में दहशत फैल गई है. अब लोग अकेले खेत जाने से भी डरने लगे हैं और समूह में निकल रहे हैं. गंगाराम उम्मीद है, लेकिन सावधानी भी जरूरी है गंगाराम की कहानी यह बताती है कि इंसान और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व संभव है. लेकिन बगहा की घटना यह भी याद दिलाती है कि हर मगरमच्छ का व्यवहार एक जैसा नहीं होता. जंगल का हर जीव अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार व्यवहार करता है. इसलिए नदी, नालों और मगरमच्छों के प्राकृतिक आवास वाले क्षेत्रों में किसी भी तरह की लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है. एक तरफ गंगाराम की याद लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाती है, तो दूसरी तरफ बगहा की घटना यह चेतावनी देती है कि मानसून में मगरमच्छों के इलाके में कदम रखते समय सिर्फ भरोसा नहीं, सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है.
अभिषेक पाण्डेय