‘बाबू नहीं, पब्लिक सर्वेंट हूं’… तुकाराम मुंढे ने बताया कैसी होनी चाहिए नई ब्यूरोक्रेसी

तुकाराम के मुताबिक आने वाले भारत के लिए नौकरशाही का एक नया टेम्पलेट तैयार करने की जरूरत है, ऐसा टेम्पलेट जिसमें संविधान के मूल्य, जनहित, जवाबदेही, नवाचार, पारदर्शिता और सेवा की भावना सबसे ऊपर हों.

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Business Today India at 100 में तुकाराम मुढ़े (Photo-ITG) Business Today India at 100 में तुकाराम मुढ़े (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 21 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 3:59 PM IST

IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे मिलावटखोरों के खिलाफ चला रहे मुहिम की वजह से देश भर में चर्चा में हैं. बिजनेस टुडे के 'इंडिया एट 100' इवेंट में तुकाराम ने कहा कि संस्थाएं व्यक्तियों से अधिक महत्वपूर्ण हैं और एक सिविल सर्वेंट की असली पहचान उसकी जनता के प्रति जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से होती है. 

भारतीय नौकरशाही को लंबे समय से ‘बाबूशाही’, लालफीताशाही और एक ऐसे तंत्र के रूप में देखा जाता रहा है, जो बदलाव के प्रति धीमा और आम आदमी से दूर है. तुकाराम इस पारंपरिक छवि को अलग नजरिए से देखते हैं. उनका मानना है कि सिविल सर्वेंट को किसी पद या लोकप्रिय पहचान से नहीं, बल्कि उसके काम, संवैधानिक जिम्मेदारियों और जनता के प्रति जवाबदेही से पहचाना जाना चाहिए,

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उन्होंने कहा कि वे खुद को ‘बाबू’ या केवल ‘ब्यूरोक्रेट’ कहलाना पसंद नहीं करते, उनके लिए वे एक सिविल सर्वेंट और पब्लिक सर्वेंट हैं, जिसकी पहली जिम्मेदारी जनता और संविधान के प्रति है.

‘ब्यूरोक्रेसी’ की छवि बदलने की जरूरत

तुकाराम के मुताबिक, ‘ब्यूरोक्रेट’ या ‘बाबू’ शब्द अपने आप में गलत या अपमानजनक नहीं हैं. समस्या तब पैदा होती है, जब इनके साथ एक ऐसी पारंपरिक छवि जुड़ जाती है, जिसमें नौकरशाही को आत्मसंतुष्ट, निष्क्रिय और बदलाव से दूर माना जाता है, उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि इस सोच को बदला जाए, यह बदलाव किसी एक अधिकारी का व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि पूरी सिविल सेवा की जिम्मेदारी है.

उनके अनुसार, सिविल सर्वेंट्स को सेवा में प्रवेश के समय संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की शपथ दिलाई जाती है, इसके बाद पूरे करियर में उन्हें संवैधानिक सिद्धांतों, मूल्यों और दर्शन के अनुरूप काम करना होता है, चाहे उन्हें किसी भी विभाग या पद पर जिम्मेदारी क्यों न दी जाए.

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मुंढ़े ने कहा कि वे खुद को उस व्यक्ति के रूप में पेश नहीं करना चाहते जिसने अकेले भारतीय नौकरशाही की पुरानी व्यवस्था को तोड़ दिया हो, उनके अनुसार, हर अधिकारी की कार्यशैली अलग हो सकती है कुछ सफल होते हैं, कुछ नहीं, कुछ लोगों को पसंद आते हैं, कुछ को नहीं, लेकिन यह व्यक्तिगत पसंद या लोकप्रियता का विषय नहीं होना चाहिए.

एक सार्वजनिक सेवक के रूप में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह जनता के प्रति जवाबदेह हो, सिविल सर्विस में अधिकारियों की भूमिका केवल सरकारी आदेशों को लागू करने तक सीमित नहीं है. वरिष्ठ स्तर पर वे नीति-निर्माण में योगदान देते हैं, जबकि फील्ड स्तर पर उन्हीं नीतियों को जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी निभाते हैं. इसलिए उनकी भूमिका नीति बनाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने, दोनों में महत्वपूर्ण है.

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‘नीति केवल कागज पर नहीं, जमीन पर काम करनी चाहिए’

मुंढ़े के अनुसार, सिविल सर्वेंट की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह ऐसी नीतियों को लागू करे जिनका उद्देश्य व्यापक जनहित हो. सरकार की किसी नीति की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि वह कितनी अच्छी तरह कागज पर लिखी गई है, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह आम लोगों की जिंदगी में कितना बदलाव ला रही है.

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उन्होंने अपने प्रशासनिक अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों, शिक्षा, स्वास्थ्य, एड्स नियंत्रण, कराधान और खाद्य एवं औषधि प्रशासन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया है. उनके मुताबिक, IAS की खूबसूरती ही यही है कि एक अधिकारी को अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने, सीखने और देश के लिए विभिन्न तरीकों से योगदान देने का अवसर मिलता है.

‘ब्यूरोक्रेसी से उम्मीद मत छोड़िए, खुद से उम्मीद मत छोड़िए’

मुढ़े से जब पूछा गया कि वे अपने काम के कारण आम लोगों के बीच एक ‘पब्लिक हीरो’ बन गए हैं और उन्होंने उस नौकरशाही की पारंपरिक छवि को बदला है, जिससे लोगों ने उम्मीद छोड़ दी थी, तो उन्होंने इस विचार को एक अलग तरीके से देखने की बात कही. उन्होंने कहा कि लोगों को ब्यूरोक्रेसी या किसी संस्था से उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, बल्कि उन्हें खुद से उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए.

‘अगर मैं नहीं, तो और कौन?’

मुंढ़े के अनुसार, यह सवाल व्यक्ति, संस्था और समाज तीनों स्तरों पर पूछा जाना चाहिए, यदि लोग इस सोच के साथ काम करना शुरू करें, तो शायद उन्हें यह पूछने की जरूरत ही न पड़े कि सिस्टम से उम्मीद क्यों खत्म हो रही है. उन्होंने ने जोर देकर कहा कि किसी एक व्यक्ति से उम्मीद टूटना और किसी संस्था से उम्मीद टूटना, दोनों अलग बातें हैं, उनके अनुसार, व्यक्ति महत्वपूर्ण हैं और वे अपना योगदान देते हैं, लेकिन लंबे समय तक प्रभाव डालने वाली चीजें संस्थाएं होती हैं.

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उन्होंने संसद, प्रेस, विधायिका, न्यायपालिका और सिविल सेवाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि ये सभी संस्थाएं हैं और समय के साथ इन्हें भविष्य की जरूरतों के अनुसार खुद को बदलना पड़ता है. अगर समाज एक-एक करके इन संस्थाओं से उम्मीद छोड़ने लगे, तो वास्तव में वह उन लोगों से उम्मीद छोड़ रहा होता है जो इन संस्थाओं को चलाते हैं.

इसलिए भारत में अगर लोग नौकरशाही से उम्मीद छोड़ने की बात करते हैं, तो इसका अर्थ स्थायी कार्यपालिका यानी Executive से उम्मीद छोड़ना भी है.  तुकाराम के मुताबिक, यह स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी.

उन्होंने ने स्वीकार किया कि देश में नौकरशाही को लेकर निराशा की वजहें भी हैं, उन्होंने कहा कि ऐसी नौकरशाही रही है जिसे भ्रष्ट, लापरवाह और काम करने के प्रति उदासीन माना गया, सबसे बड़ी समस्या यह रही कि कई बार लोगों को ऐसा लगा कि सिस्टम काम ही नहीं कर रहा है. लेकिन उनका मानना है कि अगर कोई अधिकारी ईमानदारी से अपना काम करता है, तो वह केवल अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहा होता, बल्कि वह भविष्य के लिए एक मिसाल भी कायम कर रहा होता है.
उनके मुताबिक, यही वजह है कि किसी अधिकारी के काम से आम लोगों में यह विश्वास पैदा हो सकता है कि बदलाव संभव है,

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1991 के आर्थिक सुधारों का उदाहरण

मुंढ़े ने भारत में बदलाव की चर्चा करते हुए 1991 के आर्थिक सुधारों का उदाहरण दिया, उनके अनुसार, बड़े बदलावों के पीछे राजनीतिक नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. राजनीतिक नेतृत्व विजन देता है और सिस्टम उस विजन को लागू करने में अपनी भूमिका निभाता है. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि चर्चा किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सिस्टम की होनी चाहिए.

1991 से पहले और 1991 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया, पहले ‘लाइसेंस राज’ जैसी व्यवस्था थी, जबकि बाद के दौर में निजी क्षेत्र, नागरिकों और अन्य हितधारकों की भूमिका बढ़ी. यह बदलाव इस बात का उदाहरण है कि जरूरत के अनुसार संस्थाएं और व्यवस्थाएं खुद को बदल सकती हैं.

तुकाराम ने जनता से सीधे संवाद को भी सुशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया. उन्होंने बताया कि वे रोजाना शाम 4 से 5 बजे के बीच लोगों से सीधे मिलते हैं और उनकी समस्याएं सुनते हैं, उनके मुताबिक, यह कोई नई शुरुआत नहीं है. वे सेवा में आने के बाद से ही लोगों से सीधे जुड़ने की इस आदत को अपनाते रहे हैं. उनका तर्क है कि यदि कोई पब्लिक सर्वेंट जनता की सेवा कर रहा है, तो उसे यह पता होना चाहिए कि जिन लोगों के लिए वह काम कर रहा है, उनकी वास्तविक समस्याएं क्या हैं.

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यदि अधिकारी लोगों से मिलता ही नहीं, उनसे जुड़ता नहीं और उनकी समस्याएं सीधे नहीं सुनता, तो उसे कैसे पता चलेगा कि उसकी बनाई या लागू की गई नीति सही दिशा में जा रही है?

‘फर्स्ट-हैंड जानकारी से बेहतर कोई फीडबैक नहीं’

मुंढ़े के अनुसार, प्रशासन को फीडबैक कई माध्यमों से मिलता है अधिकारियों, मीडिया, जनप्रतिनिधियों और अन्य संस्थाओं के जरिए, लेकिन हितधारकों यानी आम लोगों से सीधे जुड़ना और उनकी बात सुनना ‘फर्स्ट-हैंड’ जानकारी देता है. उनके अनुसार, जब कोई अधिकारी सीधे जनता से संवाद करता है, तो उसे समस्याओं की वास्तविक तस्वीर मिलती है. इससे वह अपनी नीतियों और फैसलों को बेहतर तरीके से समझ और सुधार सकता है.
 

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