'अंतरात्मा की वजह से वंदे मातरम् नहीं गाने वालों को सजा नहीं', SC की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरात्मा या अपने अधिकारों के आधार पर वंदे मातरम् गाने से इनकार करने वालों को दंड का सामना नहीं करना चाहिए. कोर्ट ने 1986 के बिजो एमैनुएल फैसले का भी हवाला दिया.

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सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम् गाने पर एक तरह की स्पष्टीकरण दी है. (File photo) सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम् गाने पर एक तरह की स्पष्टीकरण दी है. (File photo)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 10:53 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वंदे मातरम् को लेकर सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि जो लोग अपनी अंतरात्मा या अधिकारों के आधार पर वंदे मातरम् गाने से इनकार करते हैं, उन्हें इसके लिए आपराधिक सजा नहीं मिलनी चाहिए. कोर्ट ने 1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल सरकार मामले का हवाला देते हुए कहा कि उस फैसले में भी बच्चों को सम्मानपूर्वक राष्ट्रगान न गाने पर सुरक्षा दी गई थी.

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चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. बेंच में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं. याचिका में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को गाने को अनिवार्य करने वाले कानून और गृह मंत्रालय के निर्देशों को चुनौती दी गई है.

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SC बोला- लोकतांत्रिक राज्य तय करे राष्ट्रीय गीत क्या है

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि लोकतांत्रिक राज्य यह तय कर सकता है कि राष्ट्रीय गीत क्या होगा और उसके कितने अंतरे गाए जाएंगे. लेकिन अगर कोई व्यक्ति मानता है कि वंदे मातरम् गाने से उसके संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अधिकार प्रभावित होते हैं या वह अंतरात्मा के आधार पर इसका विरोध करता है, तो उसे आपराधिक सजा नहीं मिलनी चाहिए.

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कोर्ट ने साफ किया कि वह इस सुनवाई में यह तय नहीं कर रहा कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए. बेंच ने कहा कि वह वंदे मातरम् से जुड़े राष्ट्रीय भावनाओं पर भी सवाल नहीं उठा रही है.

टीएम कृष्णा की याचिका में क्या है?

कर्नाटक संगीत के गायक टीएम कृष्णा ने 1971 के प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट की 2026 में हुई संशोधन वाली धारा 3 को चुनौती दी है. संशोधित कानून के तहत राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या ऐसे कार्यक्रम में बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.

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याचिका में गृह मंत्रालय के 28 जनवरी और 9 जुलाई के निर्देशों को भी चुनौती दी गई है. इसमें सभी छह अंतरे गाने की अनिवार्यता पर सवाल उठाया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून में 'राष्ट्रीय गीत' की स्पष्ट परिभाषा नहीं है और छह अंतरों को आधिकारिक रूप से अनिवार्य करने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की आजादी, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठते हैं.

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील एस. मुरलीधर के बीच भी तीखी बहस हुई. हालांकि, बेंच ने इस टिप्पणी को रिकॉर्ड में लेने से इनकार कर दिया और कहा कि वह इस बहस पर कोई संज्ञान नहीं ले रही है.

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