I-PAC छापेमारी मामले में बढ़ेंगी ममता बनर्जी की मुश्किलें? सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

I-PAC छापेमारी मामले में ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सरकार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा. ईडी ने सीबीआई जांच की मांग की है. जानें क्या है पूरा मामला?

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अब इस मामले में सबकी निगाहें सबसे बड़ी अदालत पर लगी हैं (फोटो-ITG) अब इस मामले में सबकी निगाहें सबसे बड़ी अदालत पर लगी हैं (फोटो-ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 29 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 4:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तत्कालीन राज्य सरकार के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है. यह मामला कोलकाता में राजनीतिक सलाहकार कंपनी I-PAC के कार्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के दौरान कथित तौर पर बाधा डालने से जुड़ा है.

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने ईडी और प्रतिवादी पक्ष की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. अब इस मामले में शीर्ष अदालत के फैसले का इंतजार है.

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यह मामला जनवरी 2026 में कोलकाता में हुई ईडी की छापेमारी से संबंधित है. केंद्रीय एजेंसी ने राजनीतिक सलाहकार फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर तलाशी अभियान चलाया था. I-PAC तृणमूल कांग्रेस (TMC) की राजनीतिक सलाहकार फर्म के तौर पर काम करती है.

ईडी ने आरोप लगाया था कि छापेमारी के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने जांच की कार्रवाई में हस्तक्षेप किया था.

प्रवर्तन निदेशालय का आरोप है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी छापेमारी वाली जगह पर पहुंचे थे. ईडी ने अपनी याचिका में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कुमार की भूमिका का भी उल्लेख किया था.

केंद्रीय एजेंसी का दावा है कि इस दौरान उसकी जांच में बाधा डाली गई और महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य तथा दस्तावेज वहां से ले जाए गए. हालांकि, ये आरोप हैं और मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना अभी बाकी है.

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ईडी ने इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की मांग की थी. इसके साथ ही एजेंसी ने कथित तौर पर कार्रवाई में बाधा डालने वाले पुलिस अधिकारियों के निलंबन की मांग भी की थी.

केंद्रीय एजेंसी ने अपनी याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की. याचिका में छापेमारी के दौरान हुई घटनाओं और राज्य के अधिकारियों की कथित भूमिका की जांच कराने का अनुरोध किया गया है.

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से जांच में कथित हस्तक्षेप के मुद्दे पर सख्त टिप्पणी की थी. अदालत ने कहा था कि यदि कोई मुख्यमंत्री चल रही जांच के बीच इस तरह दखल देता है, तो इससे लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है.

पीठ ने इस मामले को केवल केंद्र और राज्य सरकार के बीच अधिकार क्षेत्र के विवाद के तौर पर देखने से इनकार किया. अदालत के मुताबिक, इस मामले में मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत आचरण से जुड़े सवाल पर विचार किया जाना है.

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि यह मामला केंद्र और राज्य के बीच अधिकार क्षेत्र से संबंधित विवाद है, जिस पर संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत विचार किया जाना चाहिए. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया.

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पीठ ने साफ कर दिया कि उसके सामने उठाया गया मुद्दा मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत आचरण और जांच प्रक्रिया में कथित हस्तक्षेप से जुड़ा है. अदालत ने यह भी कहा था कि कोई मुख्यमंत्री केंद्रीय जांच एजेंसी की वैध जांच प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकता.

सुनवाई के दौरान पीठ ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का भी उल्लेख किया था. अदालत ने टिप्पणी की थी कि बाबा साहेब आंबेडकर भी इस तरह के आचरण को स्वीकार नहीं करते.

इस टिप्पणी के जरिए पीठ ने जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोपों की गंभीरता को रेखांकित किया था. हालांकि, इन टिप्पणियों के आधार पर मामले में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी अपना फैसला नहीं सुनाया है.

इस मामले में ईडी और ममता बनर्जी की ओर से पेश वकीलों ने याचिका की सुनवाई योग्य होने और उसके गुण-दोष से जुड़े मुद्दों पर अपनी अंतिम दलीलें पूरी कर ली हैं. दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने निर्णय सुरक्षित रख लिया.

अब अदालत बाद में अपना फैसला सुनाएगी. फैसले से यह  साफ होगा कि इस मामले में आगे क्या कानूनी कार्रवाई हो सकती है और ईडी की मांगों पर अदालत का क्या रुख रहता है.
 

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