सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट में निर्णायक संशोधन के लिए चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया पर आपत्ति मामले की सुनवाई के दौरान कई गंभीर सवाल उठाए. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने निर्वाचन आयोग से पूछा कि SIR की प्रक्रिया क्या वोटरों को परेशान या प्रताड़ित करने के इरादे से तय की गई थी?
कोर्ट ने वोटर्स के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर कई तीखे और सीधे सवाल उठाए. कोर्ट ने आयोग को इन सवालों का जवाब देने को कहते हुए सुनवाई की अगली तारीख 19 नवंबर तय कर दी. अदालत ने याचिकाकर्ताओं और वोटरों को भरोसा दिया कि कोर्ट के सामने अभी ये मामले लंबित हैं. लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है.
अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त रुख अपनाया है कि निर्वाचन आयोग की किसी भी समयसीमा या जटिल प्रक्रिया के कारण आम नागरिकों का वोट देने का अधिकार हमेशा के लिए न छिन जाए. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीमित समय सीमा यानी Timelines पर सवाल उठाए. पीठ ने दिल्ली में बिना किसी चुनाव के एसआईआर को लेकर जल्दबाजी करने पर भी सवाल उठाया.
कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को वोटरों के लिए सख्त समय सीमा पर नहीं अड़ना चाहिए. गणना फॉर्म देर से जमा करने की प्रक्रिया को खुला रखना चाहिए. फॉर्म-6 भरने की बाध्यता खत्म करने के आग्रह से अदालत ने पूछा कि जो लोग पहले से ही मतदाता सूची में रजिस्टर्ड हैं और जिनके नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किए गए हैं, उन्हें फिर से 'फॉर्म 6' भरने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?
कोर्ट का मानना था कि इससे वोटर्स पर गैरजरूरी बोझ पड़ता है. सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने पूछा, 'क्या आप किसी वोटर की लापरवाही की सजा उसका वोट देने का अधिकार हमेशा के लिए छीनकर दे सकते हैं?
कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि हटाए गए वोटरों की भौतिक सूचियां स्थानीय भाषा में हर ब्लॉक स्तर पर लगाई जाएं, ताकि लोगों को बिना किसी परेशानी के आसानी से अपनी स्थिति का पता चल सके. सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों और हस्तक्षेप के बाद निर्वाचन आयोग ने अदालत को भरोसा दिया कि वह दिल्ली में तारीखें बढ़ाने और गणना फॉर्मों को देर से जमा करने की अनुमति देने की संभावनाओं पर विचार करेगा.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एसआईआर (SIR) के तहत नाम कटने या डेडलाइन खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि कोई नागरिक अपना नाम दोबारा नहीं जुड़वा सकता. नामांकन दाखिल करने के आखिरी दिन तक वोटर लिस्ट दुरुस्त करवाने का अधिकार हर नागरिक के पास सुरक्षित है.
संसद ने पिछले साल कानून बनाकर निर्वाचन आयुक्तों को उनके कार्यकाल के दौरान आयुक्त के रूप में किए गए अधिकारिक कार्यों और लिए गए निर्णयों के मद्देनजर किसी भी किस्म की कार्रवाई या कार्यवाही से मुक्त रखा है. इसे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
यह याचिका 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023' की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती है.
याचिकाकर्ता, कार्यकर्ता और वकील अरुण कुमार अग्रवाल ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि यह प्रावधान बिना किसी अपवाद के छूट प्रदान करता है. यहाँ तक कि उन कृत्यों के लिए भी जो सद्भावना में नहीं किए गए हैं यानी अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे से बाहर जाकर ही क्यों न किए गए हों.
याचिका में कहा गया है कि इस तरह का व्यापक संरक्षण नागरिकों से मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के खिलाफ उपलब्ध नागरिक और आपराधिक उपचार छीन लेता है. इसमें आगे कहा गया है कि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा करने का मतलब यह नहीं हो सकता कि उसके सदस्यों को कानूनी जवाबदेही से अंधाधुंध छूट दे दी जाए. याचिकाकर्ता ने 2023 के अधिनियम की धारा 16 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है.
संजय शर्मा