नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मई 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान दिए गए बयान की वजह से मानहानि का केस झेलना पड़ा. लेकिन अब अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है. सुल्तानपुर की एमपी-एमएलए कोर्ट ने राहुल गांधी को मानहानि के इस केस में आखिर किस आधार पर बरी किया और याचिकाकर्ता कि किन दलीलों पर कोर्ट ने सवाल खड़े किए? सुल्तानपुर के एमपी एमएलए कोर्ट ने इस मामले में 49 पेज का ऑर्डर दिया है. क्या कहता है इस केस में कोर्ट का फैसला, आइए समझते हैं.
8 मई 2018 को कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने बेंगलुरु में बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान में देश के गृहमंत्री अमित शाह को हत्यारोपी बताते हुए बयान दिया गया. कर्नाटक में राहुल गांधी के द्वारा दिए गए इस बयान पर 3 महीने बाद 4 अगस्त 2018 को सुल्तानपुर की एमपी/एमएलए कोर्ट में आईपीसी की धारा 500 के तहत मानहानि का केस दर्ज करवाया गया.
यह केस बीजेपी के तत्कालीन जिलाध्यक्ष विजय मिश्रा ने दर्ज कराया था. केस में वादी मुकदमा विजय मिश्रा के अलावा दो अन्य गवाह अनिल कुमार मिश्रा और रामचंद्र दुबे पेश किए गए. कोर्ट में बहस के दौरान परिवादी विजय मिश्रा नहीं बता सके कि उन्होंने किस अधिवक्ता के जरिए यह परिवाद दायर किया. सुल्तानपुर में राहुल गांधी के बयान की सीडी कहां बनवाई गई? कब बनवाई गई यह भी याद नहीं था?
घटना के कितने दिन बाद कोतवाली देहात के थानाध्यक्ष और एसपी सुल्तानपुर को रजिस्ट्री की गई? इसका भी ना तो कोई सबूत दिया गया. ना ही तारीख याद थी. सुनवाई के दौरान परिवादी विजय मिश्रा को लेकर एक और खुलासा हुआ. सुल्तानपुर के कोतवाली नगर में संतराम तिवारी की तरफ से विजय मिश्रा पर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज है.
सुल्तानपुर की कोतवाली में दर्ज अपराध संख्या 54 / 2008 आईपीसी की धारा 419/ 420 /467 /468 के केस में आरोप पत्र भी दाखिल किया जा चुका है और कोर्ट में मामला विचाराधीन है. केस की सुनवाई के दौरान दूसरे गवाह अनिल मिश्रा ने साफ कहा कि वह कभी बेंगलुरु शहर नहीं गया. ना ही 8 मई 2018 को राहुल गांधी की बेंगलुरु में हुई प्रेस कांफ्रेंस के कार्यक्रम उसने देखा था. ना सुना था. और ना ही वह उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद था.
परिवादी विजय मिश्रा (भाजपा जिला उपाध्यक्ष) का आरोप था कि राहुल गांधी ने अमित शाह को 'हत्या का आरोपी' कहकर भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं की साख को ठेस पहुंचाई है. इस संबंध में विजय मिश्रा की तरफ से कोर्ट में यशवंत सिंह बनाम सीबीआई/राहुल गांधी बनाम पुणे ईश्वर भाई मोदी/ मेधा पाटकर बनाम बीके सक्सेना समेत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के करीब 9 मामलों का उदाहरण देकर अपना पक्ष रखा.
इस मामले में राहुल गांधी की तरफ से बचाव पक्ष में तर्क रखा कि आईपीसी की धारा 199 के तहत मानहानि के मामले में केवल व्यथित व्यक्ति ही मुकदमा दाखिल कर सकता है. व्यक्तियों का समूह पहचान योग्य एवं निश्चित होना चाहिए. राजनीतिक दल निश्चित एवं पहचान योग्य नहीं होते. राहुल गांधी की जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र किया गया उसमें ना तो वादी मौजूद था. ना ही उसके गवाह मौजूद थे. प्रेस वार्ता का पूरा वीडियो भी कोर्ट में नहीं दाखिल किया गया.
जिरह के दौरान वादी मुकदमा अमित शाह का पूरा नाम भी नहीं बता पाया, जिसका लाभ लेते हुए बचाव पक्ष ने कहा कि जिनके लिए मानहानि का वाद दायर किया गया. परिवादी को उसका का पूरा नाम भी नहीं पता. बचाव पक्ष की तरफ से इस मामले में साहिब सिंह बनाम उत्तर प्रदेश/ जी नरसिम्हन बनाम टीवी चोकप्पा समेत हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 10 केस का उदाहरण रखा गया. न्यायाधीश शुभम वर्मा 49 पेज के विस्तृत आदेश में लिखा कि परिवादी की श्रेणी में नहीं आते हैं, इसलिए यह परिवाद पोषणीय नहीं है.
'व्यथित व्यक्ति' का अधिकार क्षेत्र (Locus Standi)
अदालत ने उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के दर्जनों नजीरों (Precedents) का हवाला देते हुए कहा कि मानहानि के मामलों में केवल वही व्यक्ति शिकायत दर्ज करा सकता है, जो सीधे तौर पर प्रभावित हुआ हो. राहुल गांधी का बयान मुख्य रूप से अमित शाह के संदर्भ में था. परिवादी यह साबित करने में विफल रहे कि अमित शाह या पार्टी की साख में कमी आने से उनकी अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा.
कोर्ट ने कहा परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद पार्टी की ओर से अधिकृत व्यक्ति के रूप में नहीं दाखिल किया गया है. ना ही ऐसा कोई अधिकार पत्र दिया गया जो बताता हो कि पार्टी की ओर से परिवाद दायर करने के लिए परिवादी को अधिकृत किया गया है. यानी कोर्ट ने साफ माना कि केस दायर करने वाले विजय मिश्रा खुद मानहानि के पीड़ित नहीं थे और ना ही पार्टी की ओर से परिवाद दायर करने के लिए अधिकृत किए गए थे.
कोर्ट में सुनवाई के दौरान राहुल गांधी ने अमित शाह पर दिए गए बयान को नहीं नकारा. उन्होंने बस इतना कहा कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर और सिर्फ उनके बयान के चुनिंदा अंश को ही प्रस्तुत किया गया है. कोर्ट ने माना कि चुनावी अभियान के दौरान राजनीतिक व्यक्तियों के बीच एक दूसरे के विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए सामान्यतः बयान दिए जाते हैं. इसमें असभाविक कोई बात नहीं होती. बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की यह एक आवश्यक प्रसंगती मानी जाती रही है.
कोर्ट ने कहा कि परिवाद भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन जिला अध्यक्ष विजय मिश्रा ने दाखिल किया. वीडियो उसके दो शुभचिंतक दिनेश और अनिरुद्ध शुक्ला ने दिखाए. वीडियो दिखाते समय रामचंद्र दुबे और अनिल मिश्रा को बतौर गवाह उपस्थित रहे. यानी परिवादी और वीडियो देखने वाले और वीडियो दिखाने वाले सभी व्यक्ति बीजेपी के पदाधिकारी हैं. सक्रिय कार्यकर्ता हैं.
कोर्ट ने राहुल गांधी को केस में बरी करने के पीछे जो तर्क दिए उसमें महत्वपूर्ण था कि 15 जुलाई 2018 के पूर्व दोनों ही गवाहों को वीडियो के बारे में और राहुल गांधी के बयान के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. विजय मिश्रा के घर के अंदर कमरे में वीडियो दिनेश ने दिखाया या अनिरुद्ध ने दिखाया यह भी दोनों गवाह नहीं बता पाए.
यानी परिवादी दायर करने वाले विजय मिश्रा ना तो मानहानि के स्वयं पीड़ित थे, ना ही बीजेपी की तरफ से अधिकृत थे. राहुल गांधी के बयान की सीडी विजय मिश्रा ने कहां बनवाई? किससे और कब बनवाई नहीं पता था. विजय मिश्रा ने कोर्ट में परिवाद किसके जरिया दायर किया यह भी नहीं बता पाए. ऐसे ही तमाम कमजोर तथ्यों के आधार पर सुल्तानपुर की एमपी एमएलए कोर्ट ने राहुल गांधी को 8 साल पुराने इस केस में बरी कर दिया.
संतोष शर्मा