जामिया में छात्र संघ चुनाव की लड़ाई, AMU, JNU और उमर खालिद का जिक्र क्यों?

11 अक्टूबर को छात्र संघ चुनाव कराने और हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की मांग के साथ शुरू हुआ यह मामला अब जामिया में एक गतिरोध में बदल गया है. 24 नवंबर तक कक्षाएं ऑनलाइन चल रही हैं, ऐसे में 'इंडिया टुडे' ने मौके पर जाकर छात्रों की मांगों और इस गतिरोध को समझने की कोशिश की है.

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 जामिया के प्रदर्शन की इनसाइड स्टोरी (Photo- ऋषभ चौहान) जामिया के प्रदर्शन की इनसाइड स्टोरी (Photo- ऋषभ चौहान)

ऋषभ चौहान

  • नई दिल्ली ,
  • 29 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 2:47 PM IST

बुधवार को जब मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया पहुंचा, तो मैंने ऐसे कैंपस में कदम रखा, जहां छात्र प्रतिनिधित्व जैसी बुनियादी मांग को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच लंबे समय से गतिरोध बना हुआ था. छात्र चाहते हैं कि उनका छात्र संघ फिर से बहाल किया जाए. 

जामिया में 2006 के बाद से छात्र संघ के चुनाव नहीं हुए हैं. परिसर में लोकतंत्र को लेकर होने वाली सामान्य बहस अब भूख हड़ताल, पुलिस की तैनाती, अनुशासनात्मक कार्रवाई और कक्षाओं में बाधा जैसी स्थितियों तक पहुंच गई है. कैंपस में घटनाक्रम पर नजर रखने के दौरान मेरा ध्यान केवल छात्र संघ चुनाव कराने की समय-सीमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छात्रों और प्रशासन के बीच प्रस्तावित समझौते की शर्तें भी चर्चा के केंद्र में रहीं. प्रक्रिया को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं. ऐसे में यह सवाल अब भी बना हुआ है कि इस विवाद को कैसे सुलझाया जाएगा और शैक्षणिक गतिविधियां दोबारा सामान्य रूप से कब शुरू हो पाएंगी. 

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प्रशासनिक ब्लॉक के पास गेट नंबर 7 पर छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे थे, उनकी मांग है कि छात्र संघ का गठन किया जाए, चुनाव कराए जाएं और हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा किया जाए. छात्रों ने प्रॉक्टर के इस्तीफे की मांग भी की है. उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में प्रॉक्टर पर आरोप लगाया कि वह स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के बजाय निर्देशों का पालन कर रहे हैं.  

छात्रों का तर्क सिर्फ जामिया तक सीमित नहीं है, उनका सवाल है कि अगर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में छात्र संघ हैं, तो जामिया में छात्र संघ क्यों नहीं होना चाहिए? प्रदर्शनकारियों ने देशभर के आईआईटी और निजी विश्वविद्यालयों में भी छात्र संघों और चुनावों का समर्थन किया है. इस मांग के पीछे लंबे समय से चली आ रही नाराजगी है. जामिया में 2006 के बाद से छात्र संघ के चुनाव नहीं हुए हैं, इसके चलते करीब दो दशक से छात्र निर्वाचित छात्र संघ के बिना हैं. मौजूदा आंदोलन के तहत 11 अक्टूबर से दो भूख हड़तालें भी शुरू हुई हैं. छात्र प्रतिनिधित्व बहाल करने की मांग को लेकर प्रदर्शनकारी मिर्जा गालिब की प्रतिमा के पास जुटे हैं.

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लेकिन इस विवाद को सुलझाने की राह आसान साबित नहीं हुई है. 26 अक्टूबर को छात्रों का एक बार फिर कुलपति प्रोफेसर मजहर आसिफ के नेतृत्व वाले प्रशासन से टकराव हो गया. हालांकि, प्रस्तावित समझौते के तहत एक मसौदा समिति का गठन किया गया था और 20 दिसंबर तक की समय-सीमा तय की गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना था कि उनकी चिंताओं का अब तक समाधान नहीं हुआ है. छात्र चाहते थे कि चुनाव प्रक्रिया की गारंटी देने वाली आधिकारिक अधिसूचना जारी की जाए.
 
साथ ही, उन्हें यह आश्वासन भी चाहिए था कि तय समय-सीमा बीतने के बाद चुनाव कराने के लिए अतिरिक्त मंजूरियों की शर्तें लगाकर प्रक्रिया को फिर से नहीं रोका जाएगा. समझौता और उससे जुड़ा विवाद जल्द ही टकराव का एक नया मुद्दा बन गया. यह सहमति ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी और छात्रों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने की परिस्थितियों पर सवाल उठाए. प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, 26 अक्टूबर को समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला छात्र कई दिनों से आंदोलन में शामिल था और थक चुका था. इस असहमति के कारण सबसे अहम सवाल अब भी अनुत्तरित है.


 
क्या प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्र ऐसे समझौते पर पहुंच पाएंगे, जो चुनाव कराने का स्पष्ट और भरोसेमंद रास्ता तैयार करे, या फिर आंदोलन को केवल कुछ समय के लिए रोकने तक ही सीमित रहेगा? प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनमें से कई छात्र खुले आसमान के नीचे रातें बिताने को मजबूर हैं, जहां उन्हें मच्छरों और मौसम की मार झेलनी पड़ रही है. 27 अक्टूबर की शाम, छात्रावासों में रहने वाले सैकड़ों छात्र एकजुटता दिखाने के लिए हाथों में मशालें लेकर परिसर में निकले. 

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इसके बाद मीडिया में तोड़फोड़ की घटनाओं से जुड़ी खबरें कम आने लगीं. कैंपस में गुजारा करने की चुनौती. इंडिया टुडे से खास बातचीत में एक पीएचडी छात्र ने बताया कि वह इस आंदोलन में क्यों शामिल हुआ है. इस आंदोलन में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के सदस्य भी शामिल हैं. उसने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करते हुए आरोप लगाया कि मौजूदा प्रशासन उनकी अनदेखी कर रहा है. उसने कहा कि जामिया में अल्पसंख्यक समुदायों के बड़ी संख्या में विद्यार्थी पढ़ते हैं, इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा जरूरी है. 

प्रदर्शन स्थल पर मौजूद छात्रों ने खाने-पीने की चीजों, कपड़ों और दवाइयों की कमी की बात कही. उनका कहना था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू होने के बाद भोजन चोरी-छिपे लाया जा रहा था.  छात्र निवेल ने बताया कि आंदोलन जारी रखने के लिए छात्र आपस में संसाधन जुटा रहे हैं. उसने कहा, “छात्र एकजुट होकर एक-दूसरे का साथ दे रहे हैं, धन जुटा रहे हैं और उनके पास जो भी थोड़ा-बहुत है, उसे आंदोलन और अपनी मांगों के लिए लगा रहे हैं. ”

जामिया के पीएचडी छात्र और आंदोलन में शामिल लुबैब ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय ने जरूरी सामान की आपूर्ति बंद कर दी है. “संस्थान ने सारी आपूर्ति पूरी तरह बंद कर दी है. शायद वह हमें भूखा रखकर मरने के लिए मजबूर करना चाहता है.'

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जामिया की छात्रा और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की सदस्य मंतशा इरफान ने बताया कि प्रदर्शन स्थल पर महिलाओं को बुनियादी जरूरतों की चीजें भी नहीं मिल पा रही हैं. इरफान ने कहा, “हमारे पास सैनिटरी पैड नहीं हैं, हमारे पास कपड़े नहीं हैं, क्योंकि दिल्ली पुलिस और केंद्रीय बलों ने हमें घेरकर रखा है. ”

गेट नंबर 7, 8 और 13 समेत परिसर के कई प्रवेश द्वारों के साथ-साथ सेंटेनरी गेट के आसपास बैरिकेडिंग और पुलिस की तैनाती दिखाई दी.  प्रदर्शनकारियों के दावों के मुताबिक, इलाके में प्रवेश करने की कोशिश के बाद आइसा के कुछ सदस्यों समेत कई छात्रों को हिरासत में लिया गया. जामिया मिल्लिया इस्लामिया परिसर में स्थित स्मारक उद्यान और भवन परिसर गुलिस्तान-ए-गालिब, जिसे गालिब का बगीचा भी कहा जाता है, का एक वीडियो भी सामने आया. 

इस बीच, जामिया प्रशासन ने कक्षाएं ऑनलाइन कर दी हैं. विश्वविद्यालय की ताजा घोषणा के अनुसार, ऑनलाइन कक्षाएं 24 नवंबर तक बढ़ा दी गई हैं. विषम सेमेस्टर की परीक्षाएं भी ऑनलाइन कराने का फैसला लिया गया है. अब अगले साल 12 जनवरी के बाद ही परिसर में आमने-सामने बैठकर होने वाली कक्षाएं दोबारा शुरू हो सकेंगी. 

राजनीति विज्ञान विभाग, जहां आमतौर पर सत्ता के कामकाज का अध्ययन किया जाता है. वहीं, गुलिस्तान-ए-गालिब, जो आमतौर पर साहित्य की शांति से जुड़ा रहा है, आज ऐसे परिसर के बीच खड़ा है जहां चर्चा का विषय गालिब की रचनाओं से हटकर वर्तमान समय की मांगों पर आ गया है.

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प्रशासन का पक्ष दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रदर्शन से निपटने के अपने तरीके का बचाव किया है. इंडिया टुडे से बातचीत में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा कि वरिष्ठ शिक्षकों ने छात्रों की मांगें सुनने के लिए उनसे मुलाकात की थी, लेकिन उन्होंने छात्रों के व्यवहार पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा, “संस्थान के बहुत वरिष्ठ शिक्षक स्वेच्छा से छात्रों से बात करने और उनकी मांगें सुनने के लिए बाहर आए थे, चाहे वे इसमें शामिल हों या नहीं. 

शिक्षक तीन से चार घंटे तक छात्रों के साथ बैठे रहे, इसके बावजूद छात्रों ने ऐसा व्यवहार किया, तोड़फोड़ की, आंदोलन किया और प्रोफेसरों का मजाक उड़ाया. क्या यह उचित है?” इस बीच, परिसर में सन्नाटा बढ़ गया है. सौ साल पुराने विश्वविद्यालय परिसर के जिन रास्तों पर कभी छात्रों की चहल-पहल रहती थी, वहां अब कम लोग दिखाई देते हैं, हालांकि कर्मचारी अपना काम जारी रखे हुए हैं. 

ऑनलाइन कक्षाएं शुरू होने से उन छात्रों की चिंता बढ़ गई है, जिनके पाठ्यक्रमों में प्रायोगिक प्रशिक्षण जरूरी है. पेइंग गेस्ट आवास और किराये के कमरों में रहने वाले कई छात्रों के पास इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं. 

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फूड प्रोडक्शन के फर्स्ट ईयर के एक छात्र ने कहा, “यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं है, मेरा पाठ्यक्रम फूड प्रोडक्शन का है, जिसमें पूरी तरह प्रैक्टिकल पढ़ाई होती है. यह ऑनलाइन कैसे हो सकती है? इसका कोई मतलब नहीं है. मेरी पढ़ाई का कीमती समय पहले ही बर्बाद हो रहा है. 

एएमयू और जेएनयू से मिली प्रेरणा

लुबैब ने कहा कि प्रदर्शनकारी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र आंदोलनों से प्रेरित हैं. अलीगढ़ में हुए घटनाक्रम का जिक्र करते हुए उसने कहा, “कुछ दिन पहले एएमयू के छात्रों को आखिरकार वह हासिल हुआ, जिसके वे हकदार हैं, अब वहां छात्र संघ है और चुनाव होंगे. जामिया में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? हमारी मांग भी उसी उपलब्धि से जुड़ी है, जिसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने हासिल किया है.”

छात्र के मुताबिक, एएमयू का उदाहरण उन छात्रों के संकल्प को और मजबूत करता है, जो जामिया में छात्र संघ और चुनाव चाहते हैं. छात्रों के अनुसार, सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) से जुड़ा जंतर-मंतर का प्रदर्शन भी उनके आंदोलन के लिए प्रेरणा बना है. इससे जामिया के कुछ प्रदर्शनकारियों की सोच पर भी असर पड़ा है.  2019-20 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ हुए प्रदर्शन भी कुछ छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं, इनमें एक युवती भी शामिल है, जिसने बताया कि उस आंदोलन ने उसके अपने संकल्प को किस तरह मजबूत किया. 

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उसी छात्रा ने उमर खालिद और नेहा बोरा को भी अपने लिए प्रेरणास्रोत बताया. छात्रा ने कहा, “उमर खालिद और नेहा बोरा की छाप मुझ पर है. उन्होंने हमें जो रास्ता दिखाया है, वह अब हमारी लड़ाई को आगे बढ़ाने में मदद कर रहा है. जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, हम पीछे नहीं हटेंगे. ” 

इंडिया टुडे की टीम ने इलाके में तैनात दिल्ली पुलिस की टुकड़ियों का नेतृत्व कर रहे अधिकारियों से भी बात करने की कोशिश की. हालांकि, अधिकारियों ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, “हमें यहां कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है. हम केवल मिले हुए निर्देशों का पालन कर रहे हैं.”

पुलिस की तैनाती को लेकर टीम के साथ कोई और आधिकारिक स्पष्टीकरण साझा नहीं किया गया. खबर लिखे जाने तक दिल्ली पुलिस या केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू किए जाने के संबंध में कोई बयान उपलब्ध नहीं कराया गया था. 

जामिया के कामकाज से जुड़े व्यापक ढांचे की निगरानी करने वाले शिक्षा मंत्रालय ने भी छात्रों की चिंताओं और उनकी पढ़ाई में आ रही बाधाओं को लेकर टीम को कोई बयान उपलब्ध नहीं कराया था. गेट नंबर 7 पर लगा तंबू अब भी इस विवाद की याद दिला रहा है. 

विश्वविद्यालय की सामान्य गतिविधियां पूरी तरह बंद नहीं हुई हैं, लेकिन वे बाधित जरूर हुई हैं. छात्र ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं, छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों ने एकजुटता दिखाई है और आंदोलनकारी छात्र आगे का रास्ता तय करने को लेकर प्रशासन से अब भी असहमत हैं. फिलहाल, सबसे अहम सवाल वही है, जिसके जवाब की मांग लेकर छात्र पहली बार गेट पर पहुंचे थे. छात्र प्रतिनिधित्व की उनकी मांग कब और किन शर्तों पर पूरी की जाएगी?

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