मंत्री हो या DM... तीन राज्यों में अधिकारों के लिए सबसे आंख मिलाते Gen-अल्फा!

भारत के विभिन्न राज्यों में जेन-अल्फा पीढ़ी के बच्चे शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर सड़कों पर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में छात्र-छात्राएं खराब हॉस्टल भोजन, शिक्षक कमी, स्कूल सुविधाओं की कमी और बस किराया बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.

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देशभर में जेन-अल्फा छात्र अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं. (फोटो-ITG) देशभर में जेन-अल्फा छात्र अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं. (फोटो-ITG)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 5:38 PM IST

आज पूरा देश आजादी का 80वां उत्सव मना रहा है. प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से देश की युवा शक्ति को सैल्यूट किया. उन्होंने विकसित भारत के संकल्प की रूपरेखा तय की. लेकिन दूसरी तरफ, देश के युवा और बच्चे अपने तरीके से अपने अधिकार मांगते नजर आ रहे हैं.

जेन-अल्फा की तनी मुट्ठी और उनके बुलंद नारे लोकतंत्र की मजबूती का एक नया संदेश दे रहे हैं. ये विरोध प्रदर्शन सरकारी व्यवस्था को इस बात का अहसास कराते हैं कि बच्चों की आवाज को अब अनसुनी नहीं किया जा सकता.

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लखनऊ-जब मंत्री खुद पहुंचे छात्रों की बात सुनने पहुंचे

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जेन-अल्फा छात्र अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर गए. मोहान रोड स्थित जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय में समाज कल्याण विभाग के अधीन चलने वाले इस स्कूल के छात्रों ने सड़क जाम कर दी. हॉस्टल में खराब खाना, खाने में बार-बार कीड़े निकलना, बीमार होने पर इलाज न मिलने और शिक्षकों की कमी जैसी गंभीर शिकायतों पर प्रदर्शन किया. जब स्कूल प्रशासन ने इस शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया, तो छात्र सड़कों पर उतर आए.

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यूपी के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण तुरंत प्रदर्शन कर रहे छात्रों के बीच पहुंच गए. उन्होंने बच्चों से कहा कि वे उनकी शिकायतें सुनना चाहते हैं. मंत्री के मौके पर पहुंचते ही छात्रों ने रास्ता छोड़ दिया और अपनी बातें खुलकर रखीं. यह इस बात का सबूत है कि आज के बच्चे संविधान से मिले अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों को भली-भांति समझते हैं.

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कन्नौज: कमरे में खुद को बंद कर जगाया प्रशासनिक तंत्र

उत्तर प्रदेश के ही कन्नौज से एक और अनूठी तस्वीर सामने आई. जवाहर नवोदय विद्यालय के छात्रों ने समस्याओं के निदान के लिए सड़क पर उतरने के बजाय खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. अपनी पहचान छिपाने के लिए उन्होंने मुंह ढंक लिए और क्लासरूम में खुद को लॉक कर लिया ताकि प्रशासन की नींद खुले.

सूचना मिलने पर कन्नौज के डीएम आशुतोष मोहन मौके पर पहुंचे और छात्रों की शिकायतें सुनीं. ये वो बच्चे हैं जिन्होंने नागरिक शास्त्र की किताबों में आंदोलन के बारे में पढ़ा है. आज वे पहली बार खुद लोकतांत्रिक तरीके से अपने हक के लिए खड़े हो रहे हैं.

अलवर: अधिकारियों की आंखों में आंखें डालकर किए सवाल

राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी स्थित जोधावास गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं ने अधिकारियों के सामने एक नई मिसाल पेश की. चार साल से स्कूल में केवल पांच टीचर थे. स्कूल में खेल का मैदान नहीं था. इससे परेशान छात्राओं ने एसडीएम और कलेक्टर तक से शिकायत की थी, लेकिन सुनवाई नहीं हुई.

छात्राओं ने अधिकारियों के सामने खड़े होकर दो टूक सवाल किया. उन्होंने पूछा कि अगर ये उनके बच्चे होते, तो क्या वे उन्हें ऐसी ही बुनियादी सुविधाओं के बिना पढ़ाते? इस विरोध के बाद प्रशासन तुरंत हरकत में आया. 7 नए शिक्षक तैनात किए गए. बच्चों की समस्याओं का समाधान करने की दिशा में कदम उठाया.
 

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मध्य प्रदेश में बसों में किराया कम करवाने सड़क पर उतरे छात्र

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में बसों का किराया कम कराने के लिए किताबों के बस्ते और स्कूल यूनिफॉर्म में सिरोंज के बस स्टैंड पर जब दर्जनों छात्राओं ने एक सुर में नारेबाजी शुरू की.  उन्होंने किराया बढ़ाए जाने के विरोध में बस स्टैंड पर जमकर नारेबाजी की. छात्राओं के विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन को झुकना पड़ा और उनकी मांगों पर कार्रवाई की है.

वहीं मध्य प्रदेश के उज्जैन से भी कुछ ऐसा ही मामला सामने आया. यहां सराफा कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल की 700 से ज्यादा बच्चियों ने विरोध किया. उन्होंने स्कूल के दूसरे स्थान पर मर्जर किए जाने के खिलाफ कलेक्टर दफ्तर के बाहर धरना दे दिया. 

बच्चियों का कहना था कि नया स्कूल बहुत दूर है. रास्ते में उन्हें परेशानी होगी. हालांकि जिला शिक्षा अधिकारी ने मौके पर पहुंचकर उनकी शिकायतें सुनीं.

यह भी पढ़ें: विधायक जी, किराया कम करो', विद‍िशा में सड़क पर उतरीं छात्राएं, जेन अल्फा के तेवरों से सहमा प्रशासन

देश के अलग-अलग राज्यों से आ रही ये तस्वीरें यह साबित करती हैं कि सरकारी लाख कोशिशों के बावजूद शिक्षा का बुनियादी ढांचा अभी भी कई जगहों पर कमजोर है. उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज का उदाहरण लें, जहां एक ही इलाके के दो स्कूलों में जमीन-आसमान का फर्क दिखता है. एक तरफ डिजिटल एलईडी प्रोजेक्टर पर पढ़ाई हो रही है, तो दूसरी तरफ दूसरे स्कूल में टॉयलेट में पानी तक नहीं है.

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यही वजह है कि आज के 'जेन-अल्फा' बच्चे अपनी पढ़ाई और सुविधाओं के लिए चुप बैठने के बजाय सीधे अधिकारियों और मंत्रियों से सवाल पूछ रहे हैं. यह इस बात का पक्का भरोसा दिलाता है कि भारत का बच्चा-बच्चा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों को पूरी तरह समझ रहा है.


 

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