भारत में किसी इंसानी शरीर को मौत के बाद लंबे समय तक बेहद कम तापमान पर सुरक्षित रखने यानी क्रायोनिक्स को लेकर अभी कोई अलग और स्पष्ट कानून नहीं है. यही वजह है कि इस तरह के मामलों को कानूनी तौर पर एक तरह का ‘ग्रे एरिया’ माना जाता है. हालांकि, शव को सुरक्षित रखने से जुड़े मामलों में कई मौजूदा कानून और अदालतों के फैसले लागू हो सकते हैं.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा का अधिकार दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने पंडित परमानंद कटारा मामले सहित कई फैसलों में मृत व्यक्ति के शव के साथ सम्मानजनक व्यवहार और अंतिम संस्कार से जुड़े अधिकारों पर जोर दिया है. हालांकि, इन प्रावधानों को किसी व्यक्ति की क्रायोनिक्स की इच्छा के लिए सीधे तौर पर कानूनी मान्यता मिली है, ऐसा स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है.
क्रायोनिक्स और सामान्य फ्रीजर में शव रखने के बीच क्या है अंतर?
क्रायोनिक्स और सामान्य फ्रीजर में शव रखने के बीच भी अंतर है. सामान्य तौर पर शव को कुछ समय के लिए सुरक्षित रखने की व्यवस्था अस्पतालों या अन्य संस्थानों में की जाती है. वहीं क्रायोनिक्स में शरीर को बहुत कम तापमान पर लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है, ताकि भविष्य में उसे दोबारा जीवित करने की संभावना बनी रहे.
आध्यात्मिक गुरु आशुतोष महाराज से जुड़ा क्या है मामला?
एडवोकेट स्वप्ना कोडे जो कि मुंबई, महाराष्ट्र में स्थित एक क्रिमिनल डिफेंस लॉयर हैं, उन्से हुई बातचीत में पता चला कि फिलहाल भारत में इस पूरी प्रक्रिया के लिए कोई विशेष नियामक यानी नियम बनाने वाली कोई व्यवस्था नहीं है. शव को लंबे समय तक फ्रीजर में रखने का एक चर्चित मामला आध्यात्मिक गुरु आशुतोष महाराज से जुड़ा रहा है. उनके अनुयायियों ने उनके शरीर को फ्रीजर में सुरक्षित रखा था. मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के सामने धार्मिक आस्था और अंतिम संस्कार से जुड़े सवाल आए थे.
मुंबई में किस तरह का मामला आया सामने?
हाल ही में मुंबई में भी एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें एक परिवार पर बुजुर्ग के शव को लंबे समय तक फ्रीजर में रखने और उसे अमेरिका के क्रायोनिक्स सेंटर भेजने की कोशिश करने का मामला सामने आया. ऐसे मामलों में पुलिस मौत की परिस्थितियों, दस्तावेजों और शव को सुरक्षित रखने के कारणों की जांच कर सकती है.
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इसके अलावा, मेडिको-लीगल मामलों में शव और जैविक नमूनों को सुरक्षित रखना अलग व्यवस्था के तहत आता है. जांच में DNA और दूसरे सबूतों को सुरक्षित रखने के लिए नमूनों को कम तापमान पर रखा जा सकता है. लेकिन किसी पूरे शव को अनिश्चित समय तक क्रायोनिक तरीके से सुरक्षित रखने के लिए भारत में अभी कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है.
विद्या