कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपने नेतृत्व, कैबिनेट विस्तार, महिला सशक्तिकरण, दक्षिणी राज्यों के अधिकार, परिसीमन और बेंगलुरु के विकास को लेकर कई अहम बातें कहीं. उन्होंने साफ किया कि वह किसी गुट या ‘कैंप’ की राजनीति में विश्वास नहीं करते और उनका लक्ष्य सभी को साथ लेकर चलना है. साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि कर्नाटक मंत्रिमंडल में जल्द ही महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिल सकता है.
डीके शिवकुमार ने कहा कि राजनीति में हर व्यक्ति के मन में मंत्री, बोर्ड चेयरमैन या किसी अन्य पद पर पहुंचने की इच्छा होना स्वाभाविक है. हालांकि, हर व्यक्ति को एक साथ जगह देना संभव नहीं है, उन्होंने पुराने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले भी कई वरिष्ठ नेताओं को कैबिनेट में जगह नहीं मिली और समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते रहे.
उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व आम तौर पर फैसलों से पहले नेताओं को विश्वास में लेकर चर्चा करता है. उनके मुताबिक, पार्टी और सरकार को एक तय संवैधानिक सीमा के भीतर काम करना होता है और सभी साथियों को इन परिस्थितियों को समझना होगा.
कैबिनेट में महिलाओं को जगह देने का संकेत
महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर शिवकुमार ने माना कि कर्नाटक सरकार की कैबिनेट में फिलहाल एक भी महिला मंत्री नहीं है, जब उनसे राहुल गांधी के महिला सशक्तिकरण के एजेंडे और कैबिनेट में महिलाओं की गैरमौजूदगी के बीच विरोधाभास को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध है.
उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में स्थिति स्पष्ट हो सकती है और कैबिनेट में बदलाव देखने को मिल सकता है, शिवकुमार ने कहा कि कांग्रेस पहले भी महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश करती रही है, हालांकि कई बार पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया.
सिद्धारमैया से कैसे अलग होगा शिवकुमार का शासन मॉडल?
पिछले कुछ वर्षों से कर्नाटक की राजनीति में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के अलग-अलग ‘कैंप’ की चर्चा होती रही है. इस पर शिवकुमार ने कहा कि वह गुटबाजी में विश्वास नहीं करते, उन्होंने कहा कि कांग्रेस में सभी नेता एकजुट हैं और वह खुद को पार्टी का व्यक्ति मानते हैं, उनके मुताबिक, पार्टी में नेतृत्व को ‘पार्टी के सिपाही’ की तरह काम करना चाहिए. शिवकुमार ने यह भी कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस के सभी विधायक एक साथ हैं और उनकी प्राथमिकता किसी गुट को मजबूत करना नहीं, बल्कि पूरी पार्टी को आगे ले जाना है.
‘मुख्यमंत्री बनने के बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों से मुलाकात और सभी विधायकों को साथ लेकर चलने के सवाल पर शिवकुमार ने कहा कि सत्ता में आने के बाद सरकार को पूरे राज्य के लिए काम करना होता है.
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री किसी एक पार्टी या क्षेत्र का नहीं होता, सरकार को राज्य के हर हिस्से और हर वर्ग के लोगों को समान रूप से देखना चाहिए, उन्होंने कहा कि राजनीतिक पसंद-नापसंद के आधार पर सरकारी योजनाओं का लाभ देने में भेदभाव नहीं किया जा सकता.
केंद्र और राज्यों के बीच भेदभाव नहीं होना चाहिएकेंद्र और राज्यों के संबंधों पर शिवकुमार ने संघीय ढांचे की बात उठाई, उनका कहना था कि केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकार होने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई राज्य विपक्षी दल की सरकार चला रहा है तो उसके साथ विकास और वित्तीय सहायता के मामले में भेदभाव क्यों होना चाहिए, उनके मुताबिक, संविधान और संघीय ढांचे का सम्मान करते हुए सभी राज्यों को समान अवसर मिलना चाहिए.
दक्षिणी राज्यों के साथ वित्तीय हिस्सेदारी का मुद्दा
शिवकुमार ने दक्षिणी राज्यों के आर्थिक योगदान और जनसंख्या नीति का मुद्दा भी उठाया. उनका कहना है कि दक्षिणी राज्यों ने कई दशक पहले केंद्र की जनसंख्या नियंत्रण नीति को अपनाया और इसका असर उनकी जनसंख्या वृद्धि पर पड़ा. अब यदि संसाधनों और वित्तीय आवंटन में जनसंख्या को प्रमुख आधार बनाया जाता है, तो उन राज्यों को नुकसान हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के लक्ष्य को सफलतापूर्वक अपनाया.
उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत देश के लिए बड़ा आर्थिक, रोजगार और प्रतिभा केंद्र है और उसके योगदान को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई जानी चाहिए. लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर शिवकुमार ने कहा कि वह परिसीमन के सिद्धांत के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन दक्षिणी राज्यों की सीटों में असमान बढ़ोतरी उन्हें स्वीकार नहीं होगी।
उन्होंने मौजूदा 543 लोकसभा सीटों की संख्या को लेकर सवाल उठाया और कहा कि पहले महिला आरक्षण को लागू किया जाना चाहिए, उनके मुताबिक, सीटों की संख्या में बड़ा बदलाव दक्षिणी राज्यों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता पैदा कर सकता है.
उन्होंने कहा कि दक्षिण भारतीय राज्यों की आवाज को सुरक्षित रखना जरूरी है, साथ ही उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर कई दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की राय भी समान है.
बेंगलुरु की ‘पॉटहोल सिटी’ वाली छवि बदलना चुनौती
कर्नाटक के विकास की बात हो और बेंगलुरु का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है. शहर की खराब सड़कों और गड्ढों को लेकर सवाल पर शिवकुमार ने माना कि सड़कों की स्थिति में सुधार की जरूरत है. उन्होंने बताया कि बेंगलुरु की आबादी करीब 1.4 करोड़ है, जबकि शहर में लगभग 1.35 करोड़ वाहन हैं. भारी ट्रैफिक और बारिश के दौरान सड़कें और गड्ढे बड़ी समस्या बन जाते हैं. शिवकुमार के मुताबिक, शहर की करीब 60% सड़कें सीमेंटेड हो चुकी हैं और सरकार सड़कों की स्थिति सुधारने के लिए आगे भी काम करेगी.
बेंगलुरु को देश की ग्रोथ का इंजन बनाने पर जोर
शिवकुमार ने बेंगलुरु को सिर्फ कर्नाटक नहीं, बल्कि पूरे भारत की आर्थिक तरक्की के लिए महत्वपूर्ण बताया, उन्होंने कहा कि दुनिया बेंगलुरु की ओर देख रही है और अगर भारत को आगे बढ़ना है तो बेंगलुरु को भी आगे बढ़ना होगा, उन्होंने शहर को आईटी और निवेश का बड़ा केंद्र बताते हुए कहा कि यहां 2,000 से अधिक विदेशी कंपनियां मौजूद हैं. बेंगलुरु की वैश्विक पहचान को मजबूत करना और शहर की बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना आने वाले समय में सरकार की बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है.
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