एक समय था जब बीजेपी को किसी मुश्किल राज्य में चुनावी रणनीति बनानी होती थी, तो धर्मेंद्र प्रधान का नाम सबसे आगे रहता था. सरकार में बड़ी जिम्मेदारी देनी हो, तब भी पार्टी का भरोसा उन्हीं पर दिखता था. उज्ज्वला योजना को घर-घर पहुंचाने से लेकर नई शिक्षा नीति (NEP) लागू करने तक उन्होंने कई अहम भूमिकाएं निभाईं. लेकिन राजनीति में कई बार एक विवाद पूरे सफर की दिशा बदल देता है. NEET-UG परीक्षा को लेकर उठे सवाल, फिर देशभर में छात्र आंदोलन और आखिरकार इस्तीफा, इन घटनाओं ने धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक सफर पर ऐसा मोड़ ला दिया, जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी.
धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक शुरुआत 1983 में छात्र संगठन ABVP से हुई. संगठन में काम करते-करते उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. साल 2000 में ओडिशा की पल्लाहारा सीट से पहला चुनाव लड़ा. इसके बाद 2004 में लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन 2009 में हार का सामना करना पड़ा. हालांकि यह हार उनके राजनीतिक सफर की रफ्तार नहीं रोक सकी.
यहीं से पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ाने के बजाय संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां देनी शुरू कीं. 2010 में वह बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बने. दो साल बाद बिहार से राज्यसभा पहुंचे. इसी दौर में उनकी पहचान ऐसे नेता की बनी, जो संगठन संभालने के साथ चुनावी रणनीति तैयार करने में भी माहिर माना जाता था.
मोदी सरकार में लगातार बढ़ता गया कद
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली. यहीं से उनका नाम देशभर में तेजी से पहचाना जाने लगा. उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों गरीब परिवारों तक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन पहुंचाने की वजह से उन्हें 'उज्ज्वला मैन' कहा जाने लगा. बाद में कामकाज को देखते हुए 2017 में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. पेट्रोलियम मंत्रालय उनके पास ही रहा, साथ में कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय की जिम्मेदारी भी मिली. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी पार्टी का भरोसा उन पर कायम रहा. लगातार बड़े मंत्रालय संभालने के साथ उनकी पहचान सरकार के सबसे भरोसेमंद चेहरों में बनने लगी.
सरकार में जिम्मेदारी निभाने के साथ पार्टी ने चुनावी मैदान में भी धर्मेंद्र प्रधान पर भरोसा जताया. बिहार, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्यों में उन्हें चुनावी जिम्मेदारी दी गई. पश्चिम बंगाल चुनाव में नंदीग्राम सीट का जिम्मा भी उनके पास था. सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनके गृह राज्य ओडिशा में दिखी. लंबे समय तक वहां संगठन को मजबूत करने के बाद 2024 में बीजेपी पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने में सफल रही. उसी साल धर्मेंद्र प्रधान करीब 15 साल बाद लोकसभा चुनाव जीतकर संसद लौटे. माना जा रहा था कि उनका राजनीतिक कद आगे भी बढ़ेगा.
शिक्षा मंत्रालय में मिली सबसे बड़ी चुनौती
2021 में धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली. उनके सामने सबसे बड़ा काम नई शिक्षा नीति को लागू करना था. इस दौरान शिक्षा व्यवस्था में कई बदलाव शुरू हुए. नई नीतियों को लेकर सरकार लगातार अपनी योजनाएं सामने रखती रही. हालांकि, इसी कार्यकाल में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे. स्कूल की किताबों में बदलाव को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए. इसके बावजूद सबसे बड़ा संकट अभी आना बाकी था.
NEET विवाद ने बदल दिया पूरा माहौल
2026 में NEET-UG परीक्षा को लेकर कथित पेपर लीक और गड़बड़ियों के आरोप सामने आए. देखते ही देखते छात्रों का विरोध देशभर में फैल गया. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया. बाद में सोनम वांगचुक के जुड़ने से यह आंदोलन और बड़ा हो गया. शुरुआत में सरकार ने साफ किया कि परीक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवालों की जांच होगी. इसी दौरान धर्मेंद्र प्रधान ने आंदोलन चला रहे CJP पर भी तीखा हमला बोला. मगर विरोध कम होने के बजाय लगातार बढ़ता गया. जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया. विपक्ष ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया.
37 दिन बाद देना पड़ा इस्तीफा
करीब 37 दिन तक चले आंदोलन के बाद हालात बदलने लगे. विपक्ष लगातार जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा था. छात्रों का विरोध भी जारी था. आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह पर उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया. यह इस्तीफा कई मायनों में अहम माना जा रहा है. सार्वजनिक विवाद के बाद इस्तीफा देने वाले वह मोदी सरकार के दूसरे केंद्रीय मंत्री बने. वहीं देश के इतिहास में भी विवाद के बाद पद छोड़ने वाले चुनिंदा शिक्षा मंत्रियों में उनका नाम शामिल हो गया.
आगे क्या होगी भूमिका?
धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर यहीं खत्म नहीं हुआ है. संगठन में उनकी पकड़, चुनावी अनुभव और सरकार में लंबे समय तक निभाई गई जिम्मेदारियां आज भी उनकी बड़ी ताकत मानी जाती हैं. फिर भी इतना तय है कि उनके करियर की चर्चा अब सिर्फ उज्ज्वला योजना, चुनावी रणनीति या नई शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहेगी. NEET विवाद और उसके बाद दिया गया इस्तीफा भी हमेशा उनके राजनीतिक सफर का अहम अध्याय माना जाएगा.
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