'सरकार ने ट्रंप का तुष्टीकरण किया, भारत को मिला अपमान', H-1B वीजा फीस पर भड़की कांग्रेस

अमेरिका ने कुछ H-1B याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर की भुगतान शर्त एक साल और बढ़ा दी है. इस फैसले पर कांग्रेस ने सरकार को घेरा है. पार्टी का कहना है कि इसका असर भारतीय IT प्रोफेशनल्स और छात्रों पर पड़ सकता है.

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वीजा नियमों को सख्त करने में जुटा व्हाइट हाउस. (firle Photo) वीजा नियमों को सख्त करने में जुटा व्हाइट हाउस. (firle Photo)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 10:12 PM IST

अमेरिका में H-1B वीजा के लिए कुछ नई याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर के भुगतान की शर्त एक साल और बढ़ा दी गई है. यह शर्त अब सितंबर 2027 तक लागू रहेगी. इसी फैसले को लेकर कांग्रेस ने सरकार पर निशाना साधा है. कांग्रेस का कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिश में भारत को नुकसान उठाना पड़ रहा है.

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H-1B वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां विदेशों से कुशल पेशेवरों को नौकरी के लिए बुलाती हैं. टेक और IT सेक्टर में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. भारतीय प्रोफेशनल इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी समूहों में हैं. ऐसे में इस फैसले का असर भारत के टेक प्रोफेशनल्स, छात्रों और अमेरिका में नौकरी का रास्ता तलाश रहे युवाओं पर पड़ने की बात कांग्रेस ने कही है.

कांग्रेस ने क्या कहा?

कांग्रेस की ओर से पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि 1 लाख डॉलर की भुगतान शर्त अगले 12 महीने के लिए बढ़ने से भारतीय IT प्रोफेशनल्स और छात्रों पर असर पड़ेगा. उन्होंने इसके चार असर गिनाए. उनके मुताबिक, भारतीय छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद अमेरिकी नौकरी बाजार में प्रवेश मुश्किल हो सकता है. छोटी कंपनियां H-1B स्पॉन्सर करने से बच सकती हैं. कुछ प्रोफेशनल दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं. इसका असर आगे चलकर भारत आने वाली रकम पर भी पड़ सकता है.

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इसी पोस्ट में कांग्रेस ने कहा कि सरकार ने ट्रंप को खुश करने के लिए जरूरत से ज्यादा झुकने की नीति अपनाई. पार्टी का दावा है कि इसका नुकसान भारत को उठाना पड़ रहा है. यह कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिक्रिया है, जबकि अमेरिका ने अपने फैसले के लिए अलग वजह बताई है.

अमेरिका ने क्यों बढ़ाई यह शर्त?

व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह कदम H-1B कार्यक्रम में कथित गड़बड़ियों को रोकने के लिए उठाया गया है. अमेरिका का कहना है कि कुछ IT स्टाफिंग और आउटसोर्सिंग कंपनियां इस कार्यक्रम का इस्तेमाल कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए कर रही थीं. उसके मुताबिक, इससे अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियों और वेतन पर असर पड़ सकता है.

व्हाइट हाउस ने दावा किया कि 1 लाख डॉलर की भुगतान शर्त लागू होने के बाद बड़ी IT आउटसोर्सिंग कंपनियों के H-1B रजिस्ट्रेशन में 92 फीसदी की गिरावट आई. अमेरिका ने इसे अपनी नीति के असर के तौर पर पेश किया है.

भारतीय छात्रों के लिए क्या बदल सकता है?

कांग्रेस का कहना है कि अगर H-1B के जरिए नौकरी लेने की लागत इतनी ज्यादा रहती है तो भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका में काम शुरू करना मुश्किल हो सकता है. छोटी कंपनियां महंगा स्पॉन्सरशिप खर्च उठाने से पीछे हट सकती हैं. ऐसे में नौकरी के विकल्प कम होने का दावा किया गया है.

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पार्टी ने यह भी कहा कि कुछ भारतीय प्रोफेशनल अमेरिका की जगह ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की ओर जा सकते हैं. इसका असर भारत से विदेश जाने वाले प्रतिभाशाली युवाओं की दिशा पर पड़ सकता है.

हालांकि, 1 लाख डॉलर की यह शर्त हर H-1B मामले पर लागू नहीं है. यह भुगतान कुछ खास H-1B याचिकाओं के लिए तय किया गया है. अमेरिका में पहले से मौजूद लोगों पर इसका सीधा असर भी नहीं पड़ता.

 

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