केंद्र सरकार ने बुधवार को CJP के विरोध प्रदर्शन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखा. सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने अदालत से कहा कि CJP का प्रदर्शन शांतिपूर्ण नहीं था और प्रदर्शन में शामिल कुछ तत्वों ने हिंसा का सहारा लिया था. सरकार ने हाईकोर्ट में यह भी कहा कि इस मामले में दायर याचिकाएं सिर्फ प्रचार हासिल करने (Publicity Seeking Petitions) के लिए दाखिल की गई हैं.
पीड़ितों की तरफ से न कोई FIR न अब तक आई कोई याचिका... केंद्र की दलील
एएसजी ने अदालत को बताया कि जिन लोगों के साथ कथित तौर पर मारपीट होने का आरोप लगाया जा रहा है, उनमें से किसी ने भी अब तक न तो FIR दर्ज कराई है और न ही अदालत में कोई याचिका दायर की है. सरकार ने अदालत से कहा कि इन तथ्यों को देखते हुए याचिकाओं के दावों को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट में जारी है.
सोनम वांगचुक या उनकी पत्नी ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के आरोपों पर एएसजी (ASG) एस.वी. राजू ने कहा कि यहां पेश की गई सभी याचिकाओं और दलीलों की घटनाएं और कार्यक्रम की तारीख अलग है. उनकी याचिका में कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है. यह मामला अलग आधार पर टिका है. उन्होंने कहा कि सोनम वांगचुक या उनकी पत्नी ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई है और न ही कोई आपत्ति जताई है.
सिर्फ पब्लिसिटी (प्रचार) पाने के लिए दाखिल की गई याचिका- ASG
यह सिर्फ पब्लिसिटी (प्रचार) पाने के लिए दाखिल की गई याचिका है. राजू ने कहा कि आंदोलन को नियंत्रित करते हुए कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. याचिकाकर्ताओं का कोई मजबूत पक्ष (केस) नहीं है. ऐसे वीडियो मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि पुलिसकर्मी घायल हुए थे, जिनमें सादे कपड़ों में मौजूद कुछ लोग भी शामिल हैं. याचिकाकर्ता सोशल मीडिया के वीडियो पर भरोसा कर रहे हैं. जबकि यह कोई शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नहीं था. भीड़ में शामिल तत्वों ने हिंसा का सहारा लिया था.
राजू ने कहा कि बिना किसी वास्तविक शिकायत के सिर्फ सुर्खियों में आने के लिए जनहित याचिकाएं (PIL) दायर की गई हैं. पीआईएल के नाम पर ये पब्लिसिटी इंटरेस्टेड लिटिगेशन हैं. उन्हें मजिस्ट्रेट कोर्ट जाने दीजिए, अगर जरूरत होगी तो वे एफआईआर दर्ज करेंगे.
सोशल मीडिया से भी यह स्पष्ट है कि धारा 144 लागू की गई थी. इससे पता चलता है कि वे आंशिक रूप से ही सच सामने रख रहे हैं. हाईकोर्ट ने कहा कि क्या यह किसी एक-दुक्का या कोई अलग-थलग घटना का मामला है? शायद नहीं. अगर वहां कोई गैर-कानूनी सभा थी जैसा कि आप कह रहे हैं, तो उससे निपटने के लिए कानून मौजूद है.
क्या बोले याचिकाकर्ता?
बता दें कि 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर छात्रों का आंदोलन हो रहा था. आरोप है कि इस आंदोलन के खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई की. इस कार्रवाई को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है. सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया की लोग विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे. सबसे पहला अधिकार, जिसका उपयोग किया जा रहा था, वह था एकत्र होने की स्वतंत्रता (freedom of assembly) और राजनीतिक संघ बनाने का अधिकार.
उनमें से प्रत्येक प्रदर्शनकारी की शारीरिक अखंडता (bodily integrity) की रक्षा संविधान द्वारा की गई थी. राज्य (सरकार/पुलिस) की किसी भी कार्रवाई को मनमानेपन (arbitrariness) के पैमाने पर परखा जाएगा.
शांतिपूर्ण आंदोलन में बर्बरता के आरोप
कोर्ट में कहा गया कि एक शांतिपूर्ण आंदोलन में बड़े पैमाने पर बर्बरता का इस्तेमाल किया गया. यह भीड़ वहां 20 दिनों से जुटी थी. 20 तारीख को यह घोषणा की गई थी कि वे संसद की ओर मार्च (संसद घेराव) करेंगे. वहां 19 तारीख तक कोई हिंसा नहीं हुई थी.
याचिकाकर्ता के वकील का बेटा भी वहां मौजूद था. समाज के हर वर्ग के लोग इस विरोध-प्रदर्शन में शामिल थे. शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बल (ताकत) का प्रयोग किया गया. आज तक इस बात का कोई ज़िक्र (सुगबुगाहट) तक नहीं है कि वहां मौजूद लोगों ने कोई हिंसा की थी. ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें लाठियों का इस्तेमाल होते देखा जा सकता है, और बिजली के झटके (करंट) भी दिए गए हैं. उस सभा में मौजूद किसी भी व्यक्ति के हिंसक होने की एक भी खबर नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला भी है. ऐसे में आप यह कैसे कह सकते हैं कि हर व्यक्ति को खुद जाकर एफआईआर दर्ज करानी चाहिए? अगर यह कोई एक-दुक्का घटना होती तो आपका उन्हें एफआईआर दर्ज कराने या मजिस्ट्रेट के पास जाने के लिए कहना सही हो सकता था, लेकिन यह वैसी घटना नहीं है जैसा आरोप लगाया जा रहा है. अब हम आपसे सिर्फ अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहेंगे. अदालत ने कहा कि एक दावा किया गया है. हम अभी इस पर विचार नहीं कर रहे हैं कि यह सही है या नहीं. इस तरह की घटना का आपराधिक कानून के तहत जवाबदेही/देयता पर भी असर पड़ सकता है.
अदालत ने निर्देश दिया कि एसओपी (SOP) के अनुसार सीसीटीवी (CCTV) फुटेज को सुरक्षित रखें. प्रतिवादी यानी पुलिस और सरकार सहित अन्य पक्षकार इन तीन याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल किया जाए। कोर्ट में नोटिस जारी किया. भारत सरकार (केंद्र) और दिल्ली पुलिस की ओर से एएसजी एस.वी. राजू और एएसजी चेतन शर्मा को सुना गया है.
अगली सुनवाई 11 सितंबर को
तीन सप्ताह में जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल किया जाए. हम निर्देश देते हैं कि याचिकाओं में उल्लिखित घटना से संबंधित प्रासंगिक रिकॉर्ड, जिसमें सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग शामिल है, को एसओपी के अनुसार सुरक्षित रखा जाएगा. अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी.
अदालत ने पूछे सवाल
अदालत ने पूछा कि आप यह कह रहे हैं कि भीड़ को हटाने यानी तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग अत्यंत अधिक था. वकील ने कहा कि इतने घोर बल प्रयोग की कोई आवश्यकता नहीं थी. इस स्थिति से निपटने का एक तय तरीका होता है. पहले चेतावनी दी जानी चाहिए थी. ऐसी कोई चेतावनी नहीं दी गई थी कि तितर-बितर हो जाओ वरना बल प्रयोग किया जाएगा. बल प्रयोग स्थिति और कारण के अनुपात में होना चाहिए. आप सिर्फ वहां मौजूद रहने के कारण प्रदर्शनकारियों पर अपना गुस्सा या भड़ास नहीं निकाल सकते. आखिरकार वे निहत्थे लोग थे.
प्रदर्शन में मौजूद छात्राएं/महिला छात्रों के साथ छेड़छाड़ की गई. जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज होनी चाहिए. वकील ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि पुलिस अधिकारियों को घायल करने वाले लोगों को छोड़ दिया जाए. 90 से अधिक लोग घायल हुए हैं और यह सूची लगातार बढ़ रही है. कुछ निर्देश जारी किए जाने की आवश्यकता है. सीसीटीवी (CCTV) फुटेज को सुरक्षित रखा जाना चाहिए.
सृष्टि ओझा / संजय शर्मा