'बाबरी मस्जिद नहीं गिरानी चाहिए थी, ये कहना एंटी नेशनल कैसे' बॉम्बे HC ने ऐसा क्यों कहा?

बॉम्बे हाई कोर्ट के जज जस्टिस माधव जामदार ने मुंबई पुलिस की इस बात के लिए भी आलोचना की कि उन्होंने सिर्फ़ दो याचिकाकर्ताओं को ही निशाना बनाया, जबकि दूसरे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने भी उन्हीं प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था. 

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस के तड़ीपार आदेश को रद्द कर दिया है. (File photo: ITG) बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस के तड़ीपार आदेश को रद्द कर दिया है. (File photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 6:39 PM IST

बाबरी मस्जिद नहीं गिराई जानी चाहिए थी. ये बयान देश विरोधी नहीं है. ऐसा बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के ख़िलाफ़ तड़ीपार के आदेशों को रद्द कर दिया है. मंगलवार को दिए गए एक फैसले में जस्टिस माधव जामदार की सिंगल बेंच ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई चुनिंदा और याचिकाकर्ताओं के धर्म से प्रभावित लग रही थी. 

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अदालत ने फ़िरोज़ अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफ़ीक गुलाम रसूल अंसारी को तड़ीपार करने के आदेश रद्द कर दिया है. दिसंबर 2025 में मुंबई पुलिस ने आदेश जारी कर इन दोनों को एक साल के लिए मुंबई से बाहर रहने का निर्देश दिया था. 

पुलिस की कार्रवाई तीन FIR पर आधारित थी, जो वक्फ बिल, सीमेंट गोदामों से होने वाले हवा प्रदूषण और बाबरी मस्जिद मुद्दे पर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने पर दर्ज की गई थीं. 

बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस जामदार ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि मस्जिद को गिराने पर अपनी राय जाहिर करना एंटी-नेशनल नहीं माना जा सकता. 

अदालत ने कहा कि उनके अनुसार बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था; यह उनकी सोच है. यह एंटी-नेशनल कैसे है? जज ने कहा, "यह एंटी-नेशनल नहीं हो सकता. हर किसी को यह अधिकार है."

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बेंच ने पुलिस की इस बात के लिए भी आलोचना की कि उन्होंने सिर्फ़ दो याचिकाकर्ताओं को ही निशाना बनाया, जबकि दूसरे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने भी उन्हीं प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था. 

कोर्ट ने कहा कि FIR में सिर्फ नारेबाज़ी का ज़िक्र था और इसमें किसी व्यक्ति या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं कही गई थी. साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि महज़ अटकलों या आशंकाओं के आधार पर मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता. 

राज्य की ओर से पेश हुए मुख्य सरकारी वकील शिशिर हिरे ने आरोप लगाया कि आरोपियों के संबंध प्रतिबंधित संगठन 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया' (PFI) से थे और उनके व्यवहार से सामाजिक अशांति फैल सकती थी.

हालांकि कोर्ट ने PFI से कथित संबंधों वाली बात को मानने से इनकार कर दिया क्योंकि याचिकाकर्ताओं को जारी किए गए 'कारण बताओ नोटिस' में इस दावे का कोई ज़िक्र नहीं था. 
 

 

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