जिस महिला की आवाज कभी पूरे गांव की पंचायत में सुनी जाती थी, जिसने लोगों के झगड़े सुलझाए और परिवारों के बीच समझौते करवाए, आज वही महिला अपने ही परिवार से दूर वृद्धाश्रम में जिंदगी के आखिरी दिन गुजार रही है. हरियाणा के एक गांव की यह बुजुर्ग महिला वीरमती कई साल तक गांव की सरपंच रही हैं. पंचायत की जिम्मेदारी संभाली. गांव के लोगों के विवादों में समझौते करवाए. लोगों की समस्याएं सुनीं. लेकिन वक्त बदला तो उनके सामने ऐसी स्थिति आ गई, जिसकी शायद उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी. उन्हें अपने ही घर से निकलकर वृद्धाश्रम आना पड़ा.
जब बुजुर्ग से पूछा गया कि आखिर एक गांव की मुखिया रह चुकी महिला को वृद्धाश्रम आने की जरूरत क्यों पड़ी, तो उन्होंने कहा कि वह अपने घर से खुद निकलकर आई हैं. गांव आज भी उनके लिए उतना ही अपना है. वह गांव को भूली नहीं हैं. लेकिन उनका कहना है कि उनके बच्चों ने ही उन्हें हरा दिया. बुजुर्ग महिला ने बताया कि उनके बच्चों ने उनके ऊपर हाथ उठाया. पहली बार जब ऐसा हुआ तो उन्होंने बच्चों को माफ कर दिया. उन्होंने सोचा कि शायद गलती हो गई होगी और परिवार की बात परिवार में ही खत्म हो जाए. लेकिन इसके बाद दोबारा उनके साथ मारपीट हुई.
दो बेटे-तीन बेटियां फिर भी अकेली
पीड़ित बुजुर्ग महिला का आरोप है कि इस बार उनके बच्चों ने अपनी बहुओं के साथ मिलकर उनके ऊपर हाथ उठाया. इस घटना के बाद वह खुद को संभाल नहीं पाईं. उन्होंने कहा कि जब वह एक पूरे गांव को संभालती रही हैं, लोगों के झगड़े सुलझाती रही हैं, तब अपने घर में दो बहुओं को भी नहीं संभाल पाईं. आखिरकार उन्होंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया. उन्होंने बताया कि घर छोड़ने के बाद वह करीब चार दिन तक भूखी प्यासी वहीं बैठी रहीं. लेकिन उनके बच्चों में से कोई उनके पास नहीं आया. न बेटे का फोन आया और न बेटी का.
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यह बात कहते हुए उनके चेहरे पर दर्द साफ नजर आता है. जिस परिवार से उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीद थी, वहीं से उन्हें ऐसा व्यवहार मिला कि उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा. महिला ने बताया कि उनके भाई और बहन भी हैं. गांव में रिश्तेदार भी हैं. उनका भाई उनसे मिलने आता है. उनकी बहन भी आती है. वो लोग उनसे कहते हैं कि वह उनके साथ चलें और उनके साथ रहें. लेकिन वो उनके साथ जाने के लिए तैयार नहीं हैं.
वह कहती हैं कि उन्हें लगता है कि उनके बच्चों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है. शायद कभी भगवान उनकी बात सुनेंगे. वह अपने भाई-बहन की उम्र का भी ध्यान रखती हैं. उनका कहना है कि भाई-बहन भी अब बुजुर्ग हो रहे हैं. कल को उन्हें कुछ हो गया तो उनके बच्चों की भी जिम्मेदारी होगी. उन्हें यह डर भी है कि कहीं किसी तरह का कलंक उनके भाई-बहनों पर भी न लग जाए. इसीलिए उन्होंने फैसला कर लिया है कि अब वृद्धाश्रम में ही अपनी जिंदगी पूरी करेंगी.
वह कहती हैं कि इससे अच्छा है कि वह यहीं रहकर जिंदगी पूरी कर लें. कम से कम यहां उन्हें सेवा मिल रही है. वृद्धाश्रम के बारे में पूछने पर वह कहती हैं कि यहां सेवा अच्छी होती है. हालांकि, वह यह भी मानती हैं कि वृद्धाश्रम में रहने के लिए इंसान को खुद को भी समझाना पड़ता है. वह कहती हैं कि इंसान को अपने बारे में भी कुछ न कुछ सोचना पड़ता है.
इस बुजुर्ग महिला की कहानी ऐसे समय सामने आई है, जब मुंबई के 74 वर्षीय कपड़ा कारोबारी शिवचरण रामरत्न गुप्ता की मौत ने वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की जिंदगी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. शिवचरण गुप्ता पिछले तीन साल से वृद्धाश्रम में रह रहे थे. उनका निधन 4 अगस्त को हुआ था. उनकी पत्नी का भी करीब दो साल पहले इसी आश्रम में निधन हो गया था.
पांच बच्चों के बाद भी वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर
आश्रम प्रबंधन के मुताबिक, शिवचरण गुप्ता के निधन की जानकारी उनकी तीनों बेटियों को दी गई थी. एक बेटी ने वीडियो कॉल के जरिए पिता का अंतिम संस्कार देखा और क्रिया क्रम के लिए 5100 रुपये ऑनलाइन भेजे. आश्रम प्रबंधन का दावा है कि बाकी दो बेटियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. प्रबंधन के मुताबिक, तीनों बेटियां अपनी मां के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुई थीं.
पवन राठी