'बिना नेमप्लेट और सिविल ड्रेस में लाठीचार्ज गैरकानूनी', दिल्ली पुलिस के एक्शन पर पूर्व SC जस्टिस मदन लोकुर ने उठाए सवाल

20 जुलाई को सीजेपी के संसद चलो आंदोलन के दौरान पुलिस और छात्रों की झड़प हुई थी. इसके कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें कई पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट और सिविल ड्रेस में लाठी भांजते नजर आ रहे हैं. दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई पर लोग सवाल उठा रहे हैं.

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दिल्ली हाईकोर्ट ने छात्रों पर शक्तिबल इस्तेमाल करने को लेकर जवाब भी मांगा है (File Photo- PTI) दिल्ली हाईकोर्ट ने छात्रों पर शक्तिबल इस्तेमाल करने को लेकर जवाब भी मांगा है (File Photo- PTI)

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 23 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:53 PM IST

दिल्ली में 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज के मुद्दे पर पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस मदन लोकुर ने कड़ा रुख अपनाया है. प्रदर्शन के दौरान सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों द्वारा लाठीचार्ज किए जाने और बिना नेमटैग के तैनात जवानों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने इसे पूरी तरह गैर-कानूनी करार दिया है. पूर्व जस्टिस ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश का कानून और प्रशासनिक नियम यह तय करते हैं कि ऑन-ड्यूटी पुलिसकर्मियों की स्पष्ट पहचान होनी चाहिए. 

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उन्होंने कहा, 'कानून यह मांग करता है कि पुलिसकर्मियों के पास अपनी स्पष्ट पहचान (नेमटैग/यूनिफॉर्म) होनी चाहिए. बिना नेमटैग वाले पुलिस अधिकारियों और सिविल ड्रेस में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया जाना पूरी तरह से गैर-कानूनी है.'

जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि पुलिसकर्मियों के लिए पहचान संबंधी स्पष्ट नियम और दिशा-निर्देश मौजूद हैं. उन्होंने कहा कि प्रशासनिक नियमों के अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी पुलिसकर्मियों के लिए स्पष्ट पहचान सुनिश्चित करने को लेकर निर्देश दिए गए हैं.

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट के और सादे कपड़ों में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर रहे थे, तो पुलिस कमिश्नर या संबंधित इलाके के DCP को इसका जवाब देना चाहिए. उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को बताना होगा कि इस तरह की कार्रवाई की अनुमति कैसे दी गई.

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गौरतलब है कि जस्टिस लोकुर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब 20 जुलाई को दिल्ली में हुए 'चलो संसद' मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में भी मामला पहुंच चुका है. प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग करने का आरोप लगाया गया है. वहीं, पुलिस और केंद्र सरकार का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान भीड़ हिंसक हो गई थी और पथराव किया गया था.

दिल्ली हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को प्रदर्शनकारियों पर कथित रूप से अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों वाली दो जनहित याचिकाओं पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा. मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने अधिकारियों को घटना से जुड़े सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है. इसमें सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग भी शामिल हैं.

अदालत ने केंद्र, दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी.

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने आरोप लगाया कि 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने महिलाओं और बच्चों समेत प्रदर्शनकारियों पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया. उन्होंने घटना की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच और स्वतंत्र SIT से जांच की मांग की.

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वहीं, केंद्र और पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने इन याचिकाओं को सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित बताते हुए आरोपों पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान भीड़ हिंसक हो गई थी और पथराव हुआ था, जिसमें पुलिसकर्मी घायल हुए तथा पुलिस वाहनों को नुकसान पहुंचा.

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