जंतर-मंतर और बुराड़ी का अंतर

विरोध-प्रदर्शनों के लिए तयशुदा जगहों की सूची में से जंतर-मंतर को हटाना अब तक का सबसे साफ-सुथरा क्रैकडाउन है. शोर-शराबे से परे, एक बोरियत भरी मौत. पता चलता है कि किसी विरोध-प्रदर्शन में सिर्फ वही लोग मायने रखते हैं जिनके पास कोई पद या ओहदा होता है, और वे अब प्रदर्शनकारियों की आवाज की पहुंच से बाहर जा चुके हैं.

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सरकार ने जंतर मंतर को प्रोटेस्ट साइट की लिस्ट से हटा दिया है. (Photo- ITGD) सरकार ने जंतर मंतर को प्रोटेस्ट साइट की लिस्ट से हटा दिया है. (Photo- ITGD)

कमलेश सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 13 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:25 AM IST

सरकार ने घोषणा कर दी है कि अब जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की मेजबानी नहीं करेगा. इस बात को छिपाने के लिए ‘डीनोटिफाई’ जैसे एक बड़े भारीभरकम शब्द का इस्तेमाल किया गया है. इसका मतलब यह है कि जिस सड़क पर भारत पिछले 30 सालों से अपने हुक्मरानों के खिलाफ चिल्ला रहा था, वह अब उन हुक्मरानों के कानों के दायरे से बाहर है.

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अगर आप अब परेशान हैं, तो आपको अपनी शिकायतें बुराड़ी, या किसी कम अपरिचित से सीबीडी पार्क (CBD Park), या रामलीला मैदान ले जानी होंगी, जहां इन दिनों असली वाली रामलीला चल रही है.

विरोध-प्रदर्शन कोई रैली, मेला या शादी का रिसेप्शन नहीं होता. कोई भी यह कहकर नहीं उठता कि आज मैं छला हुआ महसूस कर रहा हूं, इसलिए कृपया मुझे अपनी आवाज उठाने के लिए कोई ऐसी जगह सुझाएं जहां पार्किंग की पूरी जगह हो. असली मकसद तो सत्ता के दरवाजे पर नारे लगाना और सत्ता में बैठे लोगों को परेशान करना होता है. बुराड़ी में धरने पर बैठने का क्या फायदा? सेंट्रल दिल्ली से अपनी नाराजगी जताने के लिए दिल्ली के कोनों में क्यों जाएं?

भावनाओं को लालफीताशाही वाली फाइलों में बदलने का हुनर कोई हमारे अफसरों से सीखे. इस हफ्ते से पहले भी, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए 10 दिन पहले पुलिस की अनुमति लेनी पड़ती थी, और 1,000 से ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे. विरोध-प्रदर्शन का बुलावा ठीक कुदरती बुलावे की तरह होता है. आप आमंत्रण का इंतजार करते हुए 10 दिन तक उसे रोककर नहीं रख सकते.

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दिल्ली पुलिस, जो 10 दिनों में चोरी हुआ स्कूटर तक नहीं ढूंढ पाती, उसे लोगों को उठाकर ले जाने की तैयारी करने के लिए 10 दिन चाहिए होते हैं. 1,000 या उससे ज्यादा की भीड़ के लिए रामलीला मैदान है. इससे भी बड़ी भीड़ बुराड़ी और सीबीडी (CBD) जाती है. बारात जाना है? घर पर छोटा फंक्शन, बैंक्वेट हॉल में मध्यम आकार का, और शहर के बाहरी हिस्से में पूरा बैंड-बाजा-बारात.

अब, उस जगह की बात करते हैं जिसे सूची से हटा दिया गया है. 1724 में, महाराज सवाई जय सिंह द्वितीय ने आसमान का अध्ययन करने के लिए जंतर-मंतर बनवाया था. सूरज, चांद और सितारों के लिए बड़े-बड़े पत्थर के उपकरण, जिसमें एक धूपघड़ी भी शामिल है, जिसकी परछाई तीन सौ साल से बिना किसी बैटरी या सॉफ्टवेयर अपडेट के समय बता रही है.

दशकों तक, इसके सामने वाली सड़क ने यही काम जमीनी हकीकत के लिए किया. किसान, रिटायर्ड सैनिक, दहेज विरोधी कार्यकर्ता, फेमिनिस्ट, कम्युनिस्ट, पहलवान और इस साल नीट (NEET) के छात्र, सभी वहां आए. वहां बैठने वालों को देखकर ही आप अंदाजा लगा लेते थे कि उस समय की सरकार के लिए क्या समय चल रहा है. और शायद समस्या भी यही थी. सत्ता में बैठा कोई भी इंसान अपनी खिड़की पर परछाई पड़ना पसंद नहीं करता.

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यहां एक पैटर्न है. 1990 के दशक से पहले दिल्ली ने बोट क्लब के लॉन पर प्रदर्शन किया. जो कि व्यावहारिक रूप से रायसीना के सीने पर है. फिर असंतोष को धकेल कर जंतर-मंतर भेज दिया गया. अब इसे शहर से बाहर धकेला जा रहा है. हर कुछ दशकों में जनता की शिकायतों को उन कानों से एक कदम और दूर कर दिया जाता है जिनके लिए वे थीं.

दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज ने तो अगस्त में यह भी खुले तौर पर सोचा था कि क्या विरोध-प्रदर्शन दिल्ली के अंदर होने भी चाहिए. इस हिसाब से, 2047 तक विरोध-प्रदर्शन की तयशुदा जगह सिर्फ ऑनलाइन होगी. एक व्हाट्सएप ग्रुप जहां सिर्फ एडमिन पोस्ट कर सकेगा.

इस बदलाव का एक और गंभीर पहलू है. रूप-रंग का. मॉडर्न प्रदर्शनकारी वह पुराना चाचा नहीं है जिसके पास पताका बीड़ी का झोला और साइक्लोस्टाइल किया हुआ पर्चा हो. आज एक लड़का है 18 साल का, तो दूसरी तरफ एक लड़की है 22 साल की. दोनों के पास रिंग लाइट और क्लिप माइक्रोफोन है. अगर इसे फिल्माया नहीं गया, तो इनके लिए यह हुआ ही नहीं. जंतर-मंतर में यह सब कुछ था, भले ही वह बोट क्लब जितना सुंदर न हो.

दीवार के उस पार लुटियंस के बंगले, सड़क के नीचे कुट्टी की फिल्टर कॉफी, लाल पत्थर, पुराने घुमाव, शाम की रोशनी ठीक उसी एंगल पर पड़ती थी जैसी 18वीं सदी के खगोलविद ने सोची थी. वहां एक तख्ती उठाइए और वह किसी फिल्म के पोस्टर जैसी लगती है. इसके अलावा, कनॉट प्लेस एक कोल्ड कॉफी की दूरी पर है. और अगर आप प्यार के मूड में हैं, तो जनपथ की तरफ बढ़ जाइये.

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बुराड़ी में ऐसा करके देखिए. धूल, कचरा, एक लंबी दीवार, एक तंबू का खंभा और जिला कबड्डी ट्रायल ग्राउंड जैसी आम वाइब. जब किसानों ने 2020 में दिल्ली की तरफ मार्च किया, तो उन्हें बुराड़ी की पेशकश की गई थी, उन्होंने एक नजर देखा और हाईवे पर ही टिके रहे. सीबीडी पार्क (CBD Park) का नाम बिजनेस डिस्ट्रिक्ट जैसा लगता है लेकिन दिखता बिजनेस डिस्ट्रिक्ट के पार्किंग लॉट जैसा है.

यहां मच्छरों से खुद को बचाना ही चुनौती है, लोकतंत्र तो दूर की बात. यहां इंकलाब जिंदाबाद चिल्लाइए और जवाब सिर्फ मच्छर देते हैं. हां, कुछ मॉल और कुछ अच्छे होटलों यहां आसपास हैं, लेकिन दोनों में से कोई भी इंस्टाग्राम बैकड्रॉप नहीं बनाता है. इसे मैप पर ढूंढना मुश्किल है. वहां जाने के लिए शहादरा नाला पार करना ही थका देता है.

तो, सीधा सवाल ये है कि क्या यह असंतोष को कुचलने की कोई चाल है? लाठियां, आंसू गैस, वाटर कैनन, और इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारी मिलकर बेहतरीन वीडियो बनाते हैं. अब सरकार प्रदर्शनकारियों को खुद बिखर जाने के लिए कहकर भीड़ नियंत्रण का खर्च बचा रही है. असंतोष को किसी ऐसी उबाऊ और खराब रोशनी वाली जगह पर भेज दो ताकि कोई भी इन्फ्लुएंसर वहां जाने की जहमत ही न उठाए, और आंदोलन कम एंगेजमेंट की वजह से दम तोड़ दे. प्रोटेस्ट के लिए ऐसी जगहों की बोरियत के बजाए लोग भी हिरासत में रहना पसंद करेंगे.

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गांधी जी ने चुटकी भर नमक के लिए अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से नवसारी जिले के तटवर्ती इलाके दांडी तक लगभग 400 किमी पैदल यात्रा की थी. समुद्री बीच का नजारा तो कम से कम खूबसूरत होता है. लेकिन आज कोई भी सरकार दांडी को प्रोटेस्ट स्पॉट के रूप में घोषित नहीं करेगी. गांधीजी का आवेदन पेंडिंग ही रहेगा. साथ में एक नोट लिखा होगा, जिसमें उन्हें नमक को बुराड़ी शिफ्ट करने के लिए कहा गया होगा. हस्ताक्षर: दिल्ली पुलिस कमिश्नर.

सही मायनों में कहें तो, जंतर-मंतर के पास रहने और काम करने वाले लोगों की अपनी वास्तविक शिकायतें हैं. शोर, ट्रैफिक, कचरा. ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 2017 में यह बात कही थी. लेकिन लोकतंत्र शोरगुल वाला होता है. हमें 1950 में इंस्टॉल किए गए इस सॉफ्टवेयर के लिए किसी पैच की जरूरत नहीं है. शोर लोकतंत्र की एक खूबी है, कोई बग नहीं. एक खामोश लोकतंत्र उसे खामोश प्रेशर कुकर की तरह होता है, जिसका ढक्कन फटने की आशंका हमेशा बनी रहती है.

विरोध-प्रदर्शन का पूरा मकसद उसका एड्रेस होता है. संसद के सामने, संसद के पास जो जंतर-मंतर था, दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने, पीएमओ के सामने, राहुल गांधी के आवास के सामने, डीडीयू भवन या इंदिरा भवन के ठीक उस पार, इस बात पर निर्भर करता है कि आपको कौन गुस्सा दिला रहा है. आप अपनी शिकायत उस व्यक्ति के दरवाजे पर ले जाते हैं जिसने इसे पैदा किया है, न कि नक्शे के कोने पर मौजूद किसी ऐसे मैदान पर, जहां से उठी आवाज किसी अहम व्यक्ति तक पहुंचे ही न. यह भीड़ नियंत्रण के नाम पर वॉल्यूम कंट्रोल है.

जय हो! और ओम शांति, धारा 144. माफ कीजिए, 163.

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