रावण दहन से पहले मिट्टी के गढ़ पर चढ़ते हैं दर्जनों युवा, सदियों से निभ रही ये अनोखी परंपरा

छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ में दशहरे पर सदियों पुरानी गढ़ विच्छेदन परंपरा के बाद रावण दहन किया गया. मिट्टी से बने गढ़ पर चढ़कर दर्जनों युवाओं ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. आयोजन में हजारों लोग पहुंचे और राजपरिवार ने भी पारंपरिक भूमिका निभाई. राजकुमारी कुलिसा ने इस परंपरा को पूर्वजों के संघर्ष, मिट्टी से जुड़ाव और विजय का प्रतीक बताया.

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रावण दहन की छत्तीसगढ़ की अनोखी परंपरा. (Photo: ITG) रावण दहन की छत्तीसगढ़ की अनोखी परंपरा. (Photo: ITG)

नरेश शर्मा

  • सारंगढ़-बिलाईगढ़,
  • 20 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:29 PM IST

छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ में दशहरे का उत्सव एक ऐसी परंपरा के साथ मनाया गया, जो इसे दूसरे स्थानों से अलग पहचान देती है. यहां रावण दहन से पहले सदियों पुरानी गढ़ विच्छेदन प्रतियोगिता आयोजित की गई. इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग जुटे. प्रतियोगिता पूरी होने के बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई और फिर रावण के पुतले का दहन किया गया. इस दौरान राजपरिवार ने भी अपनी पारंपरिक भूमिका निभाई.

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सारंगढ़ की यह परंपरा केवल दशहरे का आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पूर्वजों से जुड़ी यादों को सहेजने का अवसर भी है. मिट्टी से बने गढ़ पर युवाओं का चढ़ना, प्रतियोगिता में हिस्सा लेना और इसके बाद रावण दहन की रस्म पूरी करना इस आयोजन को खास बनाता है. गढ़ विच्छेदन प्रतियोगिता इस दशहरा उत्सव का मुख्य आकर्षण रही. इस परंपरा के तहत मिट्टी से एक गढ़ बनाया जाता है. इसके बाद दर्जनों युवा उस पर चढ़कर प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं. इसमें युवाओं का साहस, शारीरिक कौशल और सामूहिक भागीदारी देखने को मिलती है.

इस अनूठी प्रतियोगिता को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे. लोगों के लिए यह आयोजन अपनी स्थानीय संस्कृति और परंपरा को करीब से देखने का मौका बना. सदियों से चली आ रही इस परंपरा के कारण सारंगढ़ का दशहरा उत्सव एक अलग पहचान रखता है. गढ़ विच्छेदन के दौरान युवाओं की भागीदारी इस आयोजन को खास बनाती है. इसमें केवल व्यक्तिगत कौशल ही नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से चुनौती का सामना करने की भावना भी दिखाई देती है. यही वजह है कि प्रतियोगिता दशहरा उत्सव के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रही.

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राजपरिवार ने निभाई पारंपरिक भूमिका

इस आयोजन में राजपरिवार की सहभागिता भी खास रही. परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार राजपरिवार ने अपनी भूमिका निभाई. इससे आयोजन की सांस्कृतिक गरिमा बनी रही और लोगों को अपनी ऐतिहासिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिला. इस दौरान पूरे क्षेत्र में धार्मिक आस्था, उत्साह और सांस्कृतिक उल्लास का माहौल नजर आया. हजारों लोगों की मौजूदगी ने इस परंपरा के प्रति लोगों के लगाव को भी दिखाया. स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन केवल रावण दहन देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और इतिहास को याद करने का भी अवसर है.

गढ़ विच्छेदन प्रतियोगिता संपन्न होने के बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई. इसके पश्चात रावण के पुतले का दहन हुआ. दशहरे पर रावण दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. सारंगढ़ में इस परंपरा से पहले गढ़ विच्छेदन का आयोजन उत्सव को एक अलग रूप देता है. प्रतियोगिता से लेकर पूजा-अर्चना और रावण दहन तक पूरा आयोजन पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ. इसमें शामिल लोगों ने उत्साह के साथ दशहरा पर्व मनाया और एक-दूसरे के साथ त्योहार की खुशियां साझा कीं.

राजकुमारी कुलिसा ने बताया कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसके जरिए पूर्वजों के जीवन, मिट्टी से उनके जुड़ाव और संघर्ष को याद किया जाता है. उन्होंने कहा कि इस आयोजन के माध्यम से यह दर्शाया जाता है कि हमारे पूर्वज मिट्टी से जुड़े रहकर किस तरह लड़ाई लड़ते थे और संघर्ष के बाद विजय कैसे हासिल होती थी. राजकुमारी कुलिसा ने अपने जिले के लोगों को दशहरा पर्व की शुभकामनाएं भी दीं. उनके मुताबिक, यह परंपरा पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम है.

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नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है आयोजन

सारंगढ़-बिलाईगढ़ का दशहरा उत्सव छत्तीसगढ़ की विशिष्ट लोक परंपराओं का उदाहरण है. गढ़ विच्छेदन प्रतियोगिता, राजपरिवार की भागीदारी और पूजा-अर्चना के बाद रावण दहन का क्रम इसे खास बनाता है. ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को भी बनाए रखते हैं. हजारों लोगों की मौजूदगी बताती है कि इस परंपरा को लेकर स्थानीय लोगों में आज भी उत्साह और लगाव है. सारंगढ़ में दशहरे के मौके पर निभाई गई यह परंपरा एक बार फिर पूर्वजों की विरासत और सामुदायिक एकता की याद दिलाती नजर आई.
 

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