पुदिया तेलम के 22 साल बस्तर के जंगलों में बीते. जब वह घर से निकला तो महज 14-15 साल का लड़का था. वहां से लौटा तो उसके सिर पर 8 लाख रुपये का इनाम था और पहचान वेस्ट बस्तर के डिजिटल कमांडर-इन-चीफ की. आज वही पुदिया दंतेवाड़ा के जिला परियोजना लाइवलीहुड कॉलेज में नई जिंदगी की बारीकियां सीख रहा है. सरकार की पुनर्वास योजना के तहत उसे हर महीने ₹10 हजार मानदेय मिलता है. कभी जंगल के रास्ते याद रखने वाला पुदिया अब यूट्यूब देखता है, व्हाट्सऐप चलाता है और वेल्डिंग सीखकर रोजगार की नई राह तलाश रहा है. आजतक डॉट इन से करीब आधे घंटे तक चली बातचीत में उसने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी कहानी सुनाई. परिचय देते हुए उसने कहा, मेरा नाम पुदिया तेलम है... लेकिन कैंप में सब राहुल तेलम कहते थे. इसके बाद उसने एक-एक कर उन 22 वर्षों के पन्ने खोलने शुरू किए, जिन्हें उसने बस्तर के जंगलों में बिताया.
बीजापुर जिले के टाडकेल गांव के रहने वाले पुदिया से जब मैंने पूछा, इतनी छोटी उम्र में घर क्यों छोड़ दिया? उसने बिना सोचे जवाब दिया कि गांव में पार्टी वाले आते थे. कहते थे कि जल, जंगल और जमीन बचानी है. उसी से प्रभावित होकर चला गया. किसी ने रोका नहीं के सवाल पर वह कहता है रोकता कौन ? बातचीत नक्सली कैंप के शुरुआती दिनों पर पहुंची तो मैंने पूछा कि फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि कैंप में पहुंचते ही बंदूक पकड़ा दी जाती है. पुदिया यह सुनकर हल्का-सा हंस पड़ा. उसने कहा, ऐसा नहीं होता. उसके मुताबिक, पहले उसे कोई हथियार नहीं दिया गया. सबसे पहले मुखबिर का काम सौंपा गया. गांवों की खबरें जुटानी होती थीं. कौन आया, कौन गया, पुलिस किस दिशा में गई और किस गांव में क्या हलचल है, इसकी जानकारी संगठन तक पहुंचानी पड़ती थी. जब संगठन को भरोसा हो गया कि वह भरोसेमंद है, तब उसकी अगली ट्रेनिंग शुरू हुई.
चर्चा ट्रेनिंग पर पहुंची तो उसने बताया कि नए लोगों को छह महीने से लेकर एक साल तक सिर्फ संगठन की विचारधारा और नियम समझाए जाते थे. मैंने पूछा, क्या सिखाते थे? उसने जवाब दिया, सबसे पहले पार्टी की पॉलिसी. उसके मुताबिक, नए भर्ती लोगों को बताया जाता था कि संगठन किन्हें अपना मानता है और किन्हें विरोधी. वैचारिक प्रशिक्षण के बाद हथियार चलाने की बारी आती थी. AK-47, एसएलआर, 303 समेत दूसरे हथियारों की ट्रेनिंग दी जाती थी. सब सीखना पड़ता था.
मिलता गया 'प्रमोशन'
बात आगे बढ़ी तो पुदिया ने बताया कि समय के साथ उसकी जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं. उसने कहा कि प्रमोशन मिलता गया. प्रमोशन' शब्द सुनकर मैं मुस्कुरा दिया. मैंने पूछा, जंगल में भी प्रमोशन होता है? वह भी हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, प्रमोशन मतलब जिम्मेदारी बढ़ती गई. इसके बाद वह अलग-अलग इलाकों में काम करता रहा, बैठकों में शामिल हुआ और कई अभियानों का हिस्सा बना. आखिरकार वह वेस्ट बस्तर डिजिटल कमांडर-इन-चीफ की जिम्मेदारी तक पहुंचा. तब तक उसके सिर पर 8 लाख का इनाम घोषित हो चुका था.
बड़े हमलों का जिक्र आया तो मैंने उससे सीधा सवाल किया, क्या कभी फायरिंग की? वह बोला सबके साथ गोली चलाई थी. उसने दावा किया कि संगठन के आदेश पर वह कई अभियानों में शामिल रहा. बातचीत के दौरान उसने मिनपा और टेकुलगुड़ा जैसी घटनाओं का भी जिक्र किया. हालांकि उसने यह दावा नहीं किया कि उसकी गोली से किसी विशेष सुरक्षाकर्मी की मौत हुई थी. उसने इतना जरूर कहा कि एक अभियान में 22 और दूसरे में 17 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे. पुदिया बताता है कि वह माडवी हिड़वा के साथ भी रहा है. माडवी छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुवर्ती गांव का था. वह पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की घातक बटालियन नंबर-1 का प्रमुख और सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति का सबसे कम उम्र का आदिवासी सदस्य था. पुदिया के मुताबिक वही उसका गुरू था. जिस पर 2010 का दंतेवाड़ा हमला (76 जवान शहीद) और 2013 का झरम घाटी हमला (कांग्रेस नेताओं सहित 27 की मौत) जैसे 26 बड़े हमलों के संयोजन और मास्टरमाइंड होने का आरोप था. मुठभेड़ और अंतघटना: 18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मरेडुमिल्ली के जंगलों में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में माडवी हिड़मा और उसकी पत्नी राजे मारे
गए.
जंगल में शादी भी कमेटी तय करती थी
निजी जिंदगी की बात छिड़ी तो पहली बार उसके चेहरे पर मुस्कान दिखाई दी. मैंने पूछा, शादी हुई? वह बोला, हां... पार्टी में ही. उसने बताया कि संगठन के भीतर शादी का फैसला लड़का और लड़की अकेले नहीं लेते थे. दोनों की सहमति के बाद प्रस्ताव कमेटी के सामने रखा जाता था और मंजूरी मिलने के बाद ही शादी होती थी. उसकी पत्नी भी संगठन का हिस्सा थी और नाच गाना दल में काम करती थी. वहीं दोनों की मुलाकात हुई, बातचीत शुरू हुई और फिर उन्होंने शादी करने का फैसला किया. बाद में दोनों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना.
जब पहली बार लगा... अब लौट जाना चाहिए
22 साल जंगल में बिताने के बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि उसने वापस लौटने का फैसला किया. इस सवाल पर उसने कहा, पार्टी की स्थिति भी पहले जैसी नहीं रही. लगा कि अब सामान्य जिंदगी जीनी चाहिए. परिवार की याद आती थी. उसने बताया कि पहले अपने वरिष्ठ कमांडर से बात की, अपनी इच्छा बताई और फिर घर लौट आया. बाद में पुलिस से संपर्क कर आत्मसमर्पण कर दिया. बातचीत टेक्नोलॉजी पर पहुंची तो मैंने पूछा, गांव में क्या हो रहा है, सरकार क्या कर रही है... ये सब कैसे पता चलता था? उसने बताया कि सूचनाएं अलग-अलग माध्यमों से मिल जाती थीं. मैंने अगला सवाल किया, मोबाइल चलता था? नेटवर्क आता था? वह हंस पड़ा. बोला- मोबाइल तो रहता था, लेकिन सिम नहीं. वीडियो दूसरे के मोबाइल से लेकर अपने मोबाइल में देखते थे.
22 साल बाद जब घर का दरवाजा खुला
मैंने पूछा, इतने साल बाद पहली बार घर पहुंचे तो कैसा लगा? उसने कहा, बहुत सुकून मिला. लगा कि जिंदगी बदल गई. घर वाले बहुत खुश हुए. अब डर नहीं लगता. पूरी बातचीत में यह पहला मौका था, जब 22 साल जंगल में नक्सली बन कर रहने वाला यह आदमी सुकून शब्द पर आकर ठहर गया. आज पुदिया दंतेवाड़ा के जिला परियोजना लाइवलीहुड कॉलेज में है. यहां 97 पूर्व नक्सलियों को अलग-अलग रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जा रहा है. कोई इलेक्ट्रिशियन बनना सीख रहा है, कोई सिलाई और कोई ड्राइविंग. पुदिया ने वेल्डिंग को चुना है. सरकार की पुनर्वास योजना के तहत उसे हर महीने ₹10 हजार मानदेय मिलता है. वह कहता है कि अब सामान्य जिंदगी जीना चाहता है, हुनर सीखकर काम करना चाहता है और परिवार के साथ भविष्य बनाना चाहता है.
क्या है छत्तीसगढ़ की पुनर्वास नीति
पुदिया तेलम की कहानी कोई अकेली कहानी नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में बस्तर संभाग में सुरक्षा बलों के लगातार बढ़ते दबाव, नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों और राज्य सरकार की पुनर्वास नीति का असर अब जमीन पर भी दिखाई देने लगा है. बड़ी संख्या में नक्सली हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं. इनमें कई इनामी कमांडर और लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहे कैडर भी शामिल हैं. इसी बदलाव को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने 'नक्सलवादी आत्मसमर्पण, पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति-2025' लागू की है. इस नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता, कृषि के लिए जमीन, कौशल विकास प्रशिक्षण और समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए विभिन्न तरह की पुनर्वास सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. नीति का एक अहम प्रावधान यह भी है कि 5 लाख या उससे अधिक के इनामी नक्सली अथवा पात्रता पूरी करने पर उनके परिवार के सदस्य को पुलिस विभाग में आरक्षक या समकक्ष पद पर सरकारी नौकरी का अवसर दिया जा सकता है.
बस्तर के दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर जिलों में हाल के वर्षों में कई बड़े अभियान चलाए गए हैं. इन अभियानों के दौरान सैकड़ों नक्सलियों ने हथियार डालकर आत्मसमर्पण किया है. दंतेवाड़ा के जिला परियोजना लाइवलीहुड कॉलेज जैसे प्रशिक्षण केंद्र इन्हीं पूर्व नक्सलियों को हुनर सिखाकर आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. पुदिया तेलम भी उन्हीं में से एक है, जो अब बंदूक नहीं, बल्कि वेल्डिंग मशीन के सहारे अपनी नई जिंदगी गढ़ने की कोशिश कर रहा है.
अमित कुमार गुप्ता