गांव के मंदिर में पुजारी थे पिता, तंगी में बीता अनिरुद्धाचार्य महाराज का बचपन, कैसे बने Pookie Baba?

कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज ने अपने जीवन के उन पन्नों से पर्दा उठाया है, जिन्हें सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर मिले नए टैग 'पूकी बाबा' पर भी अपना रिएक्शन दिया.

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कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज ने निजी जिंदगी पर की बात (Photo: Instagram/Aniruddhacharya Maharaj) कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज ने निजी जिंदगी पर की बात (Photo: Instagram/Aniruddhacharya Maharaj)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 11 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:51 AM IST

प्रसिद्ध कथावाचक और आध्यात्मिक गुरु अनिरुद्धाचार्य जी महाराज की जिंदगी भले ही आज भव्यता से भरी दिखती है, लेकिन बचपन में उन्होंने काफी संघर्ष देखा है. टीवी एक्टर पारस छाबड़ा के पॉडकास्ट में महाराज जी ने अपनी निजी जिंदगी के कई ऐसे पन्ने खोले, जिन्हें सुनकर कोई भी भावुक हो सकता है. 

अनिरुद्धाचार्य जी ने खुलासा किया कि एक दौर ऐसा भी था जब उनके परिवार को पेट भरने के लिए घर-घर जाकर भिक्षा मांगनी पड़ी थी. इसके साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया पर मिले ट्रेंडिंग टैग 'Pookie Baba' पर अपना रिएक्शन दिया. 

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बचपन में झेली तंगी

पारस छाबड़ा ने अनिरुद्धाचार्य जी महाराज से पूछा- मैंने सुना है कि आप बचपन में भिक्षा मांगकर खाना खाते थे? इसपर अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने कहा- गांव में जो मंदिर होते हैं, उनका कोई मालिक होता है. वो लोग पूजा के लिए पुजारी को रखते थे. मेरे पिता जी एक मंदिर के पुजारी थे. पिता जी मंदिर में पूजा करते थे और बदले में हम लोगों को वो खाने-पीने के लिए राशन-पानी देते थे. 

'फिर एक दफा उन्होंने कहा कि मंदिर खाली कर दीजिए. बारिश का समय था, तो पिता जी ने कहा कि अभी बारिशें हो रही थीं. तब हमारे पास रहने को कोई घर नहीं था. तब उन लोगों ने हमारा राशन पानी बंद कर दिया था, ताकि हम लोग वहां से चले जाएं. लेकिन हमारी मजबूरी थी, क्योंकि हमारे पास घर नहीं था, कोई सहारा नहीं था. कोई काम भी नहीं था.'

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अनिरुद्धाचार्य आगे बोले- गांव में पूजा कराने पिता जी जाते थे, कोई सत्यनारायण की पूजा करा लेता था, तो उसमें 11 रुपये मिलते थे, तो कोई 21 रुपये दे देता था. सत्यनारायण की कथा भी गांव के लोग रोज नहीं, बल्कि कभी-कभी ही कराते थे. उसमें गुजारा भी नहीं होता था. फिर मजबूरी में गांव में घर-घर जाकर भिक्षा मांगनी पड़ती थी. कोई आटा देता था, कोई चावल देता था. उसी से ही हमारा गुजारा होता था. 

कैसे मिला Pookie Baba का टैग?

पारस ने आगे उनसे पूछा कि सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें Pookie Baba कहना शुरू किया तो उन्हें कैसे लगा? इसपर अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने कहा- पहले तो हमने सोचा कि Pookie का मतलब क्या है. फिर इसका अर्थ खोजा, तो पता लगा कि इसका मतलब प्यारा-क्यूट होता है. 

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