50 साल बेमिसाल... मीडिया इंडस्ट्री में अपनी धाक जमाने वाली संस्थान इंडिया टुडे की गोल्डन जुबली का ये मौका खास है. 1975 से शुरू हुई इस ऐतिहासिक जर्नी ने देश का हर मूड देखा. भारत के राजनीतिक उठापटक, सांस्कृतिक बदलाव, सिनेमाई और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं, सामाजिक आंदोलनों, युद्ध, आतंकवादी हमलों की आंखों देखी को डॉक्यूमेंट्री 'Eyewitness to a Nation' में दमदार तरीके से दिखाया गया है. ऐसा लगता है मानो 5 दशक के भारत की तस्वीर को 2 घंटे 44 मिनट में अनुभव कर लिया हो.
डॉक्यूमेंट्री में बताया गया है कैसे आजाद भारत दंगों, संघर्षों और राजनीतिक त्रासदी से निपटने के बाद आधुनिक भारत बना. इस अनोखी जर्नी के बैकड्राप को रेयर आर्काइव फुटेज, एक्सपर्ट्स इंटरव्यू, ग्राउंड जीरो रिपोर्टिंग और बिहाइंड द सीन के जरिए प्रस्तुत किया गया है. डॉक्यूमेंट्री 1975 से 2025 तक के भारत की जर्नी को पत्रकारिता के नजरिए से दिखाती है. क्योंकि 5 दशकों की पत्रकारिता मात्र खबरों का सिलसिला नहीं होती, वो उस दौर को जीवंत करने वाला एक दस्तावेज भी होती है.
डॉक्यूमेंट्री में आर्काइव फुटेज का इस्तेमाल करना इसे रियलिस्टिक अप्रोच देता है. पुराने रेयर वीडियो, तस्वीरें, अखबारों की हेडलाइन्स और ग्राउंड जीरो से की गई रिपोर्टिंग उस दौर में वापस लेकर जाती है. 1975 से 2025 तक के टाइमलाइन में हुई देश को झकझोर देने वाली घटनाओं को समेटती है. पत्रकारिता में उठाए गए जोखिम चौंकाते हैं. जैसे करगिल वॉर, कांधार प्लेन हाईजैक, मुंबई बम धमाके, पुलवामा अटैक, कोरोना काल... ऐसे अनेकों मौकों आए जब अपनी जान जोखिम पर रखकर पत्रकारिता को ऊपर रखा गया. वॉरजोन जैसी डेंजर सिचुएशन की रिपोर्टिंग सोचने पर मजबूर करती है.
इमरजेंसी का दौर...इंडिया टुडे का आगाज
इंडिया टुडे मैगजीन ने पहला एडिशन दिसंबर 1975 में लॉन्च किया गया था. तब देश में इमरजेंसी का दौर था. उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के खिलाफ जनआक्रोश था. लोगों के दर्द, सड़कों पर बिगड़े हालात और जज्बातों को मैगजीन की कवर स्टोरी में दिखाया गया. प्रेस सेंसरशिप और डर के माहौल के बीच इंडिया टुडे ने लोगों की आवाज को मंच किया. संस्थान की शुरुआती पत्रकारिता ने उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक तनाव को सामने रखने का प्रयास किया. ये वो दौर था जहां से इंडिया टुडे की पत्रकारिता ने अपनी अलग पहचान बनानी शुरू की.
50 सालों में कितना बदला सिनेमा?
देश बदला, राजनीति बदली, तो इसके सबसे बड़े प्रतिबिंब सिनेमा को भी बदलना ही था. 5 दशकों की इस यात्रा में सिनेमा ने भी कई करवटें लीं. 1975 का वो दौर था जब अमृत नहाटा की राजनीतिक व्यंग्य पर बनी फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' पर विवाद छिड़ा. इसने इंदिरा सरकार को हिला दिया था. इंडिया टुडे मैगजीन ने 5 दशक की इस जर्नी में सिनेमाई दुनिया के कई सितारों का स्टारडम और डाउनफॉल देखा. पैरेलल से कमर्शियल सिनेमा तक का सफर देखा. कपूर खानदान का 'करिश्मा', अमिताभ बच्चन की 'एंग्रीयंगमैन इमेज' का भौकाल देखने को मिला.
राजकुमार हिरानी, अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी, इम्तियाज अली जैसे फिल्मकारों ने कहानी कहने के पारंपरिक ढांचे को चुनौती दी. उनकी रियल अप्रोच ने एक अलग सिनेमा दिखाया. फिर कोरोना काल आया और एंटरटेनमेंट वर्ल्ड थम गया. तब डूबी बॉलीवुड इंडस्ट्री को शाहरुख खान की पठान और आलिया भट्ट की गंगूबाई काठियावाडी ने संजीवनी दी.
राजनीति के 5 दशकों का आईना
इंडिया टुडे की जर्नी भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव से अभिन्न रूप से जुड़ी रही है. इंडिया टुडे ने इंदिरा गांधी की राजनीति के सफर को करीब से जिया. इमरजेंसी के बाद इंदिरा सरकार की कुर्सी जाना. फिर 1980 में पीएम बनकर धमाकेदार वापसी करना. बेटे संजय गांधी की मौत पर टूटना. ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद इंदिरा गांधी की मौत देश के लिए बड़ा झटका थी. इसके बाद राजीव गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सत्ता के अलग-अलग चरणों और बदलती राजनीति का करीब से विश्लेषण हुआ. डॉक्यूमेंट्री सिर्फ राजनीतिक घटनाओं को पेश ही नहीं करती, बल्कि उनके सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभाव को भी समझाती है.
जोखिम भरी पत्रकारिता
युद्ध और आतंकवाद की रिपोर्टिंग जर्नलिज्म की सबसे कठिन कसौटियों में से एक है. इंडिया टुडे ने वॉरजोन कवरेज कर देशवासियों के बीच एक ब्रिज बनने का काम किया. वॉरजोन में जाकर रिपोर्टिंग का आंखों देखा हाल बताया. 26/11 मुंबई हमला, कांधार प्लेन हाईजैक, करगिल युद्ध साहसिक रिपोर्टिंग का सटीक उदाहरण है. डॉक्यूमेंट्री में आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार की हुंकार का भी जिक्र है. जहां ऑपरेशन सिंदूर और सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा. डॉक्यूमेंट्री बताती है कैसे संवेदनशील समय में पत्रकारिता की चुनौतीपूर्ण भूमिका रही है.
स्पोर्ट्स में इंडिया का बजा डंका
भारत की 50 सालों की ये कहानी खेल के बिना अधूरी है. भारत का 1983 में वर्ल्ड कप जीतना, IPL का आगाज, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल जैसे दमदार खिलाड़ियों का शाइन करना देश की उपलब्धि बना. खिलाड़ियों के वैश्विक मंच पर उभरने के कारण खेल में युवाओं आत्मविश्वास बढ़ा. धोनी-कोहली एरा से लेकर अनिभव बिंद्रा का देश के लिए पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतना हिस्ट्री बना.
पत्रकारिकता का नया बेंचमार्क
इंडिया टुडे की इस 5 दशक की यात्रा में कई बेंचमार्क फैसले हुए, जिन्होंने भारतीय मीडिया को नई दिशा दी. 1980 में ओपिनियन पोल की शुरुआत करना सबसे बड़ा कदम था. ये कुछ ऐसा था जो मीडिया इंडस्ट्री में अभी तक नहीं हुआ था. इस पहल को खूब सराहना मिली. संस्थान ने पब्लिक सर्वे कर जनता के बीच अपनी क्रेडिबिलिटी बनाई. पब्लिक ओपिनियन को मंच देने का काम किया. डॉक्यूमेंट्री की सबसे बड़ी ताकत इसका विशाल आर्काइव है.
क्यों देखें डॉक्यूमेंट्री?
ये डॉक्यूमेंट्री आपको इतिहास के सभी अहम पन्नों से रूबरू कराती है, फिर से उन पलों को साक्षात जीने का मौका देती है. आजाद भारत का ये सफर कैसे आधुनिक भारत बना, इसकी झलक दिखाती है. देश की 50 साल की यात्रा पत्रकारिता की ताकत के साथ युवा पीढ़ी को जागरुक करने का काम करती है. ये डॉक्यूमेंट्री मस्ट वॉच है.
क्योंकि ये सिर्फ इंडिया टुडे की कहानी नहीं है. ये उस भारत की कहानी है जो आपातकाल, राजनीतिक हलचल, युद्ध और आतंकवाद से गुजरकर आधुनिक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ा. 'Eyewitness to a Nation' वो लोग जरूर देखें जो देश के कायाकल्प को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ 'पत्रकारिता' की आंखों से देखना चाहते हैं.
हंसा कोरंगा