नित्या मेहरा के डायरेक्शन में बनी ‘हुंकार: द रोर’ 25 सितंबर से जियो हॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही है. 6 एपिसोड की यह सीरीज एक नाबालिग लड़की और एक प्रभावशाली धर्मगुरु के बीच लगे यौन शोषण के आरोप के इर्द-गिर्द घूमती है. सीरीज में अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख, रघुबीर यादव, मोहम्मद जीशान अय्यूब, राम कपूर, अर्जुन माथुर और राजेश शर्मा जैसे कलाकार नजर आते हैं.
कहानी की मजबूत शुरुआत
सीरीज की सबसे अच्छी बात इसकी शुरुआत है. मध्य प्रदेश के छोटे शहर खरगंज का माहौल, वहां एक धर्मगुरु की पकड़ और उसके प्रति लोगों की अंधभक्ति को काफी प्रभावी तरीके से दिखाया गया है. रघुबीर यादव का किरदार बापजी शहर में किसी भगवान की तरह पूजनीय है. लेकिन उसकी बनाई हुई छवि तब हिल जाती है, जब नाबालिग छात्रा मीनू रावत (अनीत) उस पर छेड़छाड़ और बलात्कार का आरोप लगाती है.
इसके बाद मामला सिर्फ पुलिस जांच तक सीमित नहीं रहता. प्रशासन, मीडिया, स्थानीय राजनीति और अदालत- सब धीरे-धीरे इस केस का हिस्सा बन जाते हैं. यही वह जगह है जहां मुझे लगा कि ‘हुंकार’ एक शानदार लीगल थ्रिलर बन सकती थी.
पहला एपिसोड कहानी में दिलचस्पी पैदा करता है और आगे क्या होगा, यह जानने की उत्सुकता भी बनी रहती है. लेकिन समस्या यह है कि जिस विषय पर सीरीज बनी है, वह दर्शकों के लिए नया नहीं है. धर्मगुरु, आस्था और अपराध के बीच का यह संघर्ष पहले भी कई फिल्मों और सीरीज में देखा जा चुका है. इसलिए यहां एक बिल्कुल अलग और मजबूत दृष्टिकोण की जरूरत थी, जो पूरी सीरीज में नजर नहीं आता.
केस ही कहानी का केंद्र बन जाता है
ACP जसलीन सोनी, जिसे फातिमा सना शेख ने निभाया है, मामले की जांच करती है. वहीं स्थानीय वकील भालेराव, जिसका किरदार मोहम्मद जीशान अय्यूब ने निभाया है, मीनू का केस लड़ता है. मीनू का परिवार बापजी के समर्थकों के दबाव में है. दूसरी तरफ सोनी और भालेराव उसके खिलाफ मजबूत केस तैयार करने की कोशिश करते हैं.
सीरीज का बड़ा हिस्सा इसी कानूनी लड़ाई के आसपास घूमता है. हाई कोर्ट के बड़े वकीलों की एंट्री, मीडिया का दबाव और प्रशासन की भूमिका कहानी को बड़ा बनाने की कोशिश करती है. लेकिन मेरे हिसाब से यही सीरीज की सबसे बड़ी कमी भी है. इसमें इतना कंटेंट मौजूद है कि एक बेहद टाइट और रोमांचक कोर्टरूम ड्रामा बनाया जा सकता था, मगर स्क्रीनप्ले बार-बार अपना फोकस खो देता है.
कई चीजें समझ से बाहर लगती हैं
सीरीज की शुरुआत में मीनू का किरदार इस तरह पेश होता है जैसे अपने अंदर कोई साजिस लिए चल रहा हो, लेकिन इसका कोई असर आगे के एपिसोड में नहीं दिखता. वहीं जसलीन इतनी आसानी और चतुराई से बापजी को गिरफ्तार कर ले जाती है कि धक्का सा लगता है.
एक सीन में भालेराव सोनी से कहता है कि यह केस उसे इसलिए दिया गया है क्योंकि प्रशासन को लगता है कि वह इसमें असफल होगी. यह बात सुनकर स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि सोनी पर ऊपर से कितना दबाव होगा. लेकिन सीरीज इस पहलू को ठीक से आगे नहीं बढ़ाती.
इसी तरह जिला मजिस्ट्रेट का किरदार आता है, लेकिन कहानी में उसका योगदान बहुत सीमित रह जाता है. मुंबई का वरिष्ठ टीवी पत्रकार अनुराग सिंह भी बार-बार खरगंज पहुंचता है, लेकिन उसकी मौजूदगी कई बार कहानी की जरूरत से ज्यादा सुविधाजनक लगती है. ये छोटी बातें हैं, लेकिन इन्हीं छोटी कमियों की वजह से धीरे-धीरे कहानी की विश्वसनीयता प्रभावित होती है.
फिर भी कुछ सीन्स काफी अच्छे हैं. मीनू का सोनी के सामने तीन बार अपना वीडियो बयान रिकॉर्ड करना असरदार है. बाजार में उसे पानी पूरी खाते देखकर लोगों का हंगामा करना भी कहानी को जमीन से जोड़ता है. इस तरह के सीन असल जिंदगी में लोगों से मिलने वाले बेवजह के जजमेंट का एहसास दिलाते हैं. ऐसे सीन्स बताते हैं कि सीरीज में सही तरीके से लिखे जाने पर काफी दम था.
अनीत पड्डा ने मीनू को अच्छी तरह पकड़ा
मेरे लिए सीरीज की सबसे बड़ी खूबियों में से एक अनीत पड्डा की एक्टिंग है. अपने डेब्यू की सफलता के बाद यह उनका दूसरा प्रोजेक्ट है और उन्होंने मीनू के किरदार को काफी संयम के साथ निभाया है.
खासकर मीनू के व्यक्तित्व में आने वाला बदलाव अनीत ने अच्छी तरह दिखाया है. शुरुआत में जो लड़की लोगों की नजरों और बातों से प्रभावित होती है, धीरे-धीरे वह उस मुकाम पर पहुंचती है जहां उसे सार्वजनिक राय की ज्यादा परवाह नहीं रहती. फातिमा सना शेख भी ACP जसलीन सोनी के रूप में लगातार अच्छी लगती हैं. उनका किरदार बहुत ज्यादा नाटकीय नहीं है और यही बात उनके अभिनय को विश्वसनीय बनाती है.
रघुबीर यादव को बापजी के किरदार में पूरी तरह जमने में थोड़ा वक्त लगता है, लेकिन बाद में वह प्रभावशाली नजर आते हैं. मोहम्मद जीशान अय्यूब और राम कपूर अपने-अपने वकील के किरदारों में सहज हैं. दूसरी तरफ अर्जुन माथुर को ऐसा किरदार मिला है, जिसमें ज्यादा कुछ करने का मौका ही नहीं है. एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में उनसे कहानी में एक अलग दृष्टिकोण की उम्मीद होती है, लेकिन उनका किरदार उस क्षमता तक नहीं पहुंच पाता.
बहुत सारे ट्रैक, लेकिन कम गहराई
यही चीज मुझे ‘हुंकार’ में सबसे ज्यादा परेशान करती है. सीरीज कई मुद्दे उठाती है, लेकिन उनमें से किसी को भी पूरी गहराई से नहीं पकड़ती. सोनी पर प्रशासन का दबाव, बापजी का असली चेहरा, शिवानी की बापजी के बेटे के प्रति नाराजगी और मीनू की उसे जेल भेजने की जिद- इन सभी में कहानी की संभावना थी. लेकिन ये सारे ट्रैक अधूरे से लगते हैं.
ऐसा महसूस होता है कि सीरीज लगातार एक कहानी से दूसरी कहानी की तरफ बढ़ रही है, लेकिन किसी एक हिस्से को इतना समय नहीं दिया गया कि दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ सके.
‘आश्रम’ से तुलना होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि दोनों का विषय धर्मगुरु और उसके प्रभाव के आसपास घूमता है. लेकिन ‘हुंकार’ को अपनी अलग पहचान बनाने के लिए तुलना से आगे जाना जरूरी था.ये एक ऐसी सीरीज है जिसकी कहानी में काफी संभावनाएं थीं, लेकिन असमान लेखन ने उसका असर कम कर दिया.
शुरुआत आपको बांधती है, कलाकार अच्छा काम करते हैं और कुछ सीन वाकई प्रभाव छोड़ते हैं. लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, स्क्रीनप्ले कई दिशाओं में बिखरने लगता है. सबसे निराश करने वाली बात यही है कि सीरीज देखते हुए बार-बार लगता है कि इसके अंदर एक बहुत बेहतर लीगल थ्रिलर मौजूद है- बस उसे सही तरीके से लिखा और विकसित नहीं किया गया.
आरती गुप्ता