इंश्योरेंस का पैसा चाहिए, तो पहले अपनी मौत का नाटक करो! सुनने में आइडिया जितना मजेदार लगता है, उतना ही पागलपन भरा भी है. जीवन या भीमा कौन? इसी अजीबोगरीब आइडिया को लेकर पर्दे पर आती है, जहां कर्ज में डूबे जीवन और योजना अपनी किस्मत पलटने के लिए ऐसा खेल रचते हैं, जिसमें मौत नकली है, बीमा असली है और मुसीबतें बिल्कुल 100 फीसदी असली!
लेकिन सवाल ये है कि क्या ये अनोखा कॉमेडी-क्राइम कॉकटेल आखिर तक दर्शकों को बांधकर रख पाता है?
मौत का ड्रामा, बीमा का पैसा और डबल अरशद वारसी
कहानी का सबसे मजेदार हिस्सा है जीवन और भीमा का कनेक्शन. जीवन अपनी मौत का नाटक करता है और अपने हमशक्ल भीमा की लाश को अपनी जगह इस्तेमाल कर देता है. प्लान सीधा है-पत्नी योजना कुछ दिन विधवा बनने का नाटक करेगी और फिर बीमा कंपनी से मोटी रकम ऐंठ ली जाएगी.
सुनने में सब कुछ एकदम ‘सेट’ लगता है. लेकिन फिल्म की दुनिया में कोई प्लान इतनी आसानी से सफल हो जाए, तो फिर कहानी किस बात की? अंतिम संस्कार होते ही योजना इतनी जल्दी में आ जाती है कि बीमा एजेंट को बुलाने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगाती. और बस यहीं से शुरू होता है असली बवाल.
घर में एक के बाद एक ऐसे किरदारों की एंट्री होती है, जिन्हें देखकर लगता है कि बेचारे जीवन-योजना ने बीमा का पैसा मांगकर मुसीबतों का पूरा पैकेज खरीद लिया है.
घर बना क्राइम, कॉमेडी और कन्फ्यूजन का अड्डा
गैंगस्टर विनायक और मनु की एंट्री के बाद कहानी पूरी तरह उलट-पुलट हो जाती है. किसी को हीरे चाहिए, किसी को बीमा का पैसा चाहिए, कोई सच पकड़ना चाहता है और कोई अपने फायदे का हिस्सा. ऊपर से घर की मालकिन यशिका की नजर जीवन पर है और उसकी नजर पैसों पर भी. मतलब एक ही छत के नीचे इंश्योरेंस फ्रॉड, गैंगस्टर, चोरी के हीरे, हमशक्ल और रोमांस- सब कुछ एक साथ पक रहा है.
सबसे दिलचस्प सवाल बार-बार सामने आता है- आखिर सामने खड़ा आदमी जीवन है या भीमा?
फिल्म जब इसी कन्फ्यूजन के खेल में जाती है, तब कुछ पल मजेदार बनते हैं. खासकर जब विनायक खुद परेशान होकर ये समझने की कोशिश करता है कि उसके सामने कौन खड़ा है. लेकिन दिक्कत ये है कि फिल्म इस कॉमेडी को लंबे समय तक उसी धार के साथ नहीं चला पाती.
अरशद वारसी हैं फिल्म की असली जान
अगर इस फिल्म को देखने की सबसे बड़ी वजह पूछी जाए, तो मेरा जवाब होगा- अरशद वारसी.
डबल रोल में अरशद दोनों किरदारों को अलग रंग देने की पूरी कोशिश करते हैं. ये उनका करियर का सबसे यादगार डबल रोल भले न हो, लेकिन उनका कॉमिक टाइमिंग और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को बार-बार संभाल लेता है. जब फिल्म की कहानी लड़खड़ाती है, तब अरशद का अंदाज दर्शकों को वापस स्क्रीन की तरफ खींचता है.
संजीदा शेख भी उनका अच्छा साथ देती हैं. हालांकि योजना का किरदार जिस तरह लिखा गया है, उससे उनके लिए ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश ही नहीं बचती. किरदार को कई जगह इतना अजीब और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करते दिखाया गया है कि दर्शक उससे जुड़ने के बजाय उस पर झुंझला सकता है.
विजय राज और बृजेंद्र काला ने भी छोड़ी छाप
विजय राज विनायक के रोल में अपने पुराने अंदाज में नजर आते हैं. खतरनाक गैंगस्टर होने के बावजूद उनका किरदार कई जगह ऐसा लगता है जैसे धमकी देने के लिए आया था, लेकिन खुद ही कहानी में फंस गया. बृजेंद्र काला भी अपने खास अंदाज से हंसी निकालने की कोशिश करते हैं. उनके हिस्से का कॉमेडी मसाला कई जगह काम करता है, हालांकि फिल्म का ह्यूमर हर बार निशाने पर नहीं लगता.
सपोर्टिंग कास्ट में कई जाने-पहचाने चेहरे हैं, लेकिन ज्यादातर किरदार कुछ नया करने के बजाय उसी पुराने कॉमेडी-क्राइम फॉर्मूले में घूमते नजर आते हैं.
असली दिक्कत कहानी नहीं, उसका एक्सीक्यूशन है
यहीं आकर Jeevan Ya Bheema Con? थोड़ी फिसल जाती है. फिल्म का बेसिक आइडिया मजेदार है। एक आदमी अपनी मौत का नाटक कर रहा है, उसका हमशक्ल उसकी जगह मर चुका है, बीमा कंपनी जांच कर रही है, गैंगस्टर हीरों के पीछे है और हर कोई किसी न किसी से झूठ बोल रहा है. इतना मसाला किसी भी फिल्म को पागलपन भरी कॉमेडी बनाने के लिए काफी है. लेकिन फिल्म उस पागलपन को लगातार एंटरटेनिंग नहीं रख पाती.
ज्यादातर कहानी एक ही घर के अंदर घूमती रहती है. शुरुआत में ये सेटिंग मजेदार लगती है, लेकिन जैसे-जैसे किरदार बार-बार आते हैं, धमकी देते हैं, नया झूठ बोलते हैं और फिर वही चक्कर शुरू होता है, फिल्म थोड़ी खिंची हुई महसूस होने लगती है. कुछ जगह कॉमेडी खिलती है, लेकिन उसके बाद फिर कहानी नींद में चली जाती है.
कॉमेडी है, लेकिन हर जोक नहीं चलता
फिल्म में कुछ मजेदार पल जरूर हैं, लेकिन हंसी का लेवल लगातार एक जैसा नहीं रहता. कहीं स्थिति से कॉमेडी निकलती है, तो कहीं मजाक जबरदस्ती ठूंसा हुआ लगता है.
फिल्म खुद भी अपने हमशक्ल और हीरों वाले ट्रैक का मजाक उड़ाते हुए इसे अब्बास-मस्तान की फिल्मों से जोड़ती है. मजे की बात ये है कि कई बार लगता है कि अगर इस कहानी में उसी तरह का तेज रफ्तार ट्विस्ट और थ्रिल डाल दिया जाता, तो शायद मामला ज्यादा मजेदार हो सकता था. यहां फिल्म का सबसे बड़ा दुश्मन उसका दोहराव बन जाता है.
क्लाइमैक्स भी नहीं कर पाया बड़ा धमाका
ऐसी फिल्म में आखिर में ऐसा धमाका चाहिए कि पीछे की सारी उलझन अचानक मजेदार तरीके से सुलझ जाए. लेकिन Jeevan Ya Bheema Con? का क्लाइमैक्स उतना चौंकाता नहीं है. कई चीजें पहले से भांपी जा सकती हैं और जिस बड़े payoff का इंतजार रहता है, वह उतना असर नहीं छोड़ता. फिल्म का पूरा खेल ‘जीवन कौन और भीमा कौन?’ के सवाल पर टिका है, लेकिन अंत तक पहुंचते-पहुंचते सस्पेंस की धार कुछ कुंद हो जाती है.
मेरे नजरिए से ‘जीवन या भीमा कौन?’ का आइडिया फिल्म से ज्यादा मजेदार है. अरशद वारसी का डबल रोल, अजीबोगरीब इंश्योरेंस फ्रॉड, गैंगस्टर, चोरी के हीरे और हमशक्लों का कन्फ्यूजन- कागज पर ये पूरा पैकेज एक जबरदस्त क्राइम-कॉमेडी बन सकता था.
फिल्म में कुछ अच्छे कॉमेडी मोमेंट्स हैं और अरशद वारसी इसे देखने लायक बनाए रखते हैं. विजय राज और बृजेंद्र काला भी अपने अंदाज में रंग भरते हैं. लेकिन कमजोर और दोहराव वाली राइटिंग, जगह-जगह खिंचती कहानी और अनुमान लगाने लायक क्लाइमैक्स इसकी चमक कम कर देते हैं.
अगर आप अरशद वारसी के फैन हैं और हल्की-फुल्की कॉमेडी में क्राइम और कन्फ्यूजन का तड़का पसंद करते हैं, तो फिल्म एक बार टाइमपास करा सकती है. लेकिन अगर आप ऐसी फिल्म की उम्मीद लेकर जा रहे हैं जिसमें हर कुछ मिनट में नया ट्विस्ट, तेज कॉमेडी और दिमाग घुमा देने वाला क्लाइमैक्स मिले- तो ये इंश्योरेंस क्लेम शायद पूरा पास न हो.
आरती गुप्ता