यश की 'Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups' रिलीज से पहले ही जितनी चर्चा में है, उतनी ही इसकी डायरेक्टर गीतू मोहनदास भी सुर्खियों में हैं. वजह सिर्फ इतनी नहीं कि उन्होंने पहली बार किसी पैन-इंडिया स्टार के साथ इतना बड़ा प्रोजेक्ट संभाला है. असली दिलचस्पी इसमें है कि जिस फिल्म की झलक में मासी एक्शन, गैंगस्टर दुनिया, खून-खराबा, हिंसा और जमकर इंटीमेसी दिख रही है, उसके पीछे एक ऐसी महिला फिल्ममेकर खड़ी है, जिसकी पहचान कभी बेहद संवेदनशील और रियलिस्टिक सिनेमा से बनी थी.
और कहानी यहां से और दिलचस्प हो जाती है. गीतू कोई ऐसी डायरेक्टर नहीं हैं जो सीधे कैमरे के पीछे पहुंच गईं. उन्होंने बचपन में एक्टिंग शुरू की, अवॉर्ड जीते, बतौर एक्ट्रेस लंबा सफर तय किया, फिर अचानक अपना रास्ता बदला और डायरेक्शन की दुनिया में उतर गईं. आज वही गीतू एक ऐसी फिल्म बना रही हैं जिसे देखकर लोग पूछ रहे हैं- आखिर इतनी 'मर्दाना' और हिंसक दुनिया को एक महिला फिल्ममेकर ने कैसे ट्रीट किया है?
4-5 साल की उम्र में कैमरे के सामने आ गई थीं गीतू
गीतू मोहनदास का असली नाम गायत्री दास है. परिवार में उन्हें प्यार से गीतू कहा जाता था और यही नाम आगे चलकर उनका स्क्रीन नेम बन गया. उन्होंने बेहद छोटी उम्र में मलयालम सिनेमा में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट कदम रखा. फिल्म 'Onnu Muthal Poojyam Vare' में वह नजर आई थीं और उनके काम को इतना पसंद किया गया कि उन्हें केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट भी मिला. उस फिल्म में वह महज 5 साल की थीं और उनके साथ मोहनलाल की आवाज वाला किरदार भी कहानी का अहम हिस्सा था.
इसके बाद गीतू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 'Sayam Sandhya', 'Veendum', 'Rareeram', 'En Bommukutty Ammavukku' जैसी फिल्मों में नजर आने के बाद उन्होंने बड़े होने पर भी एक्टिंग जारी रखी. 'Life Is Beautiful' से उन्होंने बतौर एडल्ट एक्टर लीड रोल की तरफ कदम बढ़ाया और आगे 'Thenksipattanam', 'Nala Damayanthi', 'Rappakal', 'Akasha Gopuram', 'Seetha Kalyanam' और 'Nammal Thammil' जैसी फिल्मों में काम किया.
सिर्फ ग्लैमर नहीं, एक्टिंग में भी जीते बड़े सम्मान
गीतू के लिए एक्टिंग महज फिल्में करने का जरिया नहीं रही. 'Akale' में उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्ट्रेस मिला. इसके अलावा उन्होंने फिल्मफेयर अवॉर्ड साउथ भी जीता. यानी कैमरे के सामने आने वाली ये चाइल्ड आर्टिस्ट आगे चलकर एक अवॉर्ड-विनिंग एक्ट्रेस भी बन चुकी थीं.
लेकिन शायद गीतू के अंदर बैठी कहानीकार को अभी भी चैन नहीं मिला था.
उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि बचपन से एक्टिंग करती रहीं, लेकिन आगे चलकर उन्हें महसूस हुआ कि उनका असली झुकाव कहानी कहने की तरफ है. कनाडा में पढ़ाई के दौरान उन्होंने नाटक लिखे और धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि कैमरे के सामने रहने से ज्यादा उन्हें कहानी के पीछे की क्रिएटिव दुनिया खींच रही है. उन्होंने साफ कहा था कि बतौर एक्टर ठीक-ठाक चल रही थीं, लेकिन डायरेक्शन में जाना उनकी जिंदगी का सबसे अच्छा फैसला रहा.
2009 में कैमरा घुमाया, फिर बनाई अपनी राह
साल 2009 में गीतू ने अपना प्रोडक्शन हाउस 'Unplugged' शुरू किया और शॉर्ट फिल्म 'Kelkkunnundo' बनाई. इसके बाद आई वह फिल्म जिसने उन्हें इंडस्ट्री के बाकी फिल्ममेकर्स से अलग कतार में खड़ा कर दिया-'Liar's Dice'.
ये कोई मसाला फिल्म नहीं थी. एक प्रवासी मजदूर पति की तलाश में निकली महिला की कहानी, छोटे बजट में बनी फिल्म, सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ और बेहद शांत ट्रीटमेंट-'Liar's Dice' ने गीतू का नाम फेस्टिवल सर्किट में पहुंचा दिया. फिल्म का प्रीमियर मुंबई फिल्म फेस्टिवल में हुआ, इसके बाद यह Sundance और दूसरे इंटरनेशनल फेस्टिवल्स तक पहुंची.
यहां एक जरूरी करेक्शन- गीतू ने नहीं, उनकी फिल्म ने जीते नेशनल अवॉर्ड
गीतू के बारे में अक्सर ये लिखा जाता है कि उन्होंने 'Liar's Dice' के लिए नेशनल अवॉर्ड जीता, लेकिन असल बात थोड़ी अलग है. फिल्म ने दो नेशनल अवॉर्ड जीते थे- बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड गीतांजलि थापा को और बेस्ट सिनेमैटोग्राफी का अवॉर्ड राजीव रवि को मिला. गीतू डायरेक्टर के तौर पर फिल्म की रचनाकार थीं, लेकिन ये दोनों नेशनल अवॉर्ड उनके नाम नहीं थे.
फिर भी उपलब्धि छोटी नहीं थी. 'Liar's Dice' भारत की ओर से 87वें ऑस्कर के लिए ऑफिशियल एंट्री बनी, हालांकि बाद में यह फाइनल नॉमिनेशन तक नहीं पहुंची. फिल्म ने न्यूयॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल, पेसारो और सोफिया जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सम्मान हासिल किया.
और यही गीतू के संघर्ष का खास हिस्सा है. उन्होंने खुद माना था कि इंडिपेंडेंट सिनेमा के लिए स्क्रीन और दर्शक जुटाना आसान नहीं होता, लेकिन कमर्शियल मजबूरियों के चलते कहानी कहने का अपना तरीका बदलने को वह तैयार नहीं थीं.
'Moothon' से और गहरी हुई पहचान
इसके बाद गीतू ने 'Moothon' बनाई. निविन पॉली, रोशन मैथ्यू, शोभिता धुलिपाला जैसे कलाकारों वाली इस फिल्म ने उनकी पहचान को और मजबूत किया. फिल्म को टोरंटों इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीन किया गया और गीतू ने इसमें बेहद जटिल पहचान, रिश्तों, हिंसा और खोज की कहानी बुनी.
दिलचस्प बात यह है कि गीतू खुद मानती हैं कि उनकी फिल्मों में किसी को या खुद को खोजने का भाव बार-बार लौटता है. उन्होंने यह भी कहा था कि शायद एक चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में काम करने और बच्चों के नजरिये की मासूमियत से जुड़ाव का उनकी कहानी कहने की शैली पर असर पड़ा.
2016 में संडेंस इंस्टिट्यूट ने उनकी अगली कहानी 'इंशा अल्लाह' के लिए उन्हें ग्लोबन फिल्म मेकिंग अवॉर्ड दिया था. यानी जिस महिला को आज लोग 'टॉक्सिक' के बड़े सेट पर यश के साथ देखते हैं, वह पहले ही इंटरनेशनल इंडी-सिनेमा की दुनिया में अपनी जगह बना चुकी थीं.
फिर आया 'टॉक्सिक'... और गीतू का सबसे बड़ा एक्सपेरिमेंट
अब आते हैं 'टॉक्सिक' पर. यश, नयनतारा, कियारा आडवाणी, तारा सुतारिया, हुमा कुरैशी और रुक्मिणी वसंत जैसे बड़े नामों से सजी इस फिल्म को गीतू ने एक बड़े स्केल की गैंगस्टर एक्शन ड्रामा की शक्ल दी है.
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल फिल्म की स्टारकास्ट नहीं, गीतू की फिल्मी भाषा का ये जबरदस्त बदलाव है.
'Liar's Dice' और 'Moothon' में जहां सामाजिक यथार्थ, इमोशनल जटिलता और मानवीय रिश्तों की तहें थीं, वहीं 'Toxic' के प्रोमो में बंदूकें, गैंगस्टर, गोलियां, खूनी एक्शन, ग्लैमरस महिलाएं और खुले तौर पर एडल्ट इंटीमेसी नजर आ रही है. फिल्म को A सर्टिफिकेट भी मिला है और मेकर्स इसे वयस्क दर्शकों के लिए तैयार की गई एक डार्क फिल्म के रूप में पेश कर रहे हैं.
यानि एक महिला डायरेक्टर ने इस बार वही खेल चुना है जिसे आमतौर पर 'मसाला', 'मर्दाना' और 'माचो' सिनेमा की कैटेगरी में रखा जाता है.
लेकिन इंटीमेसी ने तारीफ से ज्यादा विवाद भी दिया
'Toxic' का शुरुआती टीजर सामने आते ही एक खास इंटीमेट सीन सोशल मीडिया पर चर्चा का सबसे बड़ा कारण बन गया. सीन में यश के किरदार के साथ एक महिला को कार में इंटीमेट मोमेंट में दिखाया गया, जबकि बाहर हिंसा और गोलीबारी का माहौल था. कुछ दर्शकों ने इसे बोल्ड और अलग बताया तो कुछ ने इसे महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन का उदाहरण कहा.
खास बात ये थी कि गीतू से लोगों ने इसलिए भी सवाल किया क्योंकि उनकी पिछली फिल्मों और सार्वजनिक विचारों को देखते हुए यह ट्रीटमेंट कुछ लोगों को विरोधाभासी लगा. गीतू ने इस विवाद पर सीधे लंबा स्पष्टीकरण देने के बजाय सोशल मीडिया पर लिखा- मैं आराम से हूं, जबकि लोग महिला सुख, सहमति और महिलाओं के सिस्टम को अपने तरीके से चलाने जैसी चीजों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, वगैरह-वगैरह.
उनका यह बयान विवाद खत्म करने के बजाय बहस को और हवा दे गया. कुछ लोगों ने इसे महिला एजेंसी और कंसेंट की तरफ इशारा माना, जबकि दूसरे लोगों ने उन पर अपने पुराने विचारों से पलटने का आरोप लगाया. वहीं डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा ने गीतू की बोल्ड विजन की तारीफ करते हुए उन्हें महिला सशक्तिकरण का मजबूत प्रतीक बताया.
महिला डायरेक्टर, लेकिन इतनी 'माचो' फिल्म- यही है सबसे बड़ा ट्विस्ट!
यही वह बात है जो गीतू मोहनदास को 'टॉक्सिक' के मामले में दिलचस्प बनाती है. एक तरफ उनके करियर की पहचान ऐसी फिल्मों से बनी, जिनमें मजदूर, माइग्रेशन, पहचान, अकेलापन, सेक्सुअलिटी और रिश्तों जैसे विषय थे. दूसरी तरफ अब वही फिल्ममेकर एक ऐसे स्टार को डायरेक्ट कर रही हैं जिसकी स्क्रीन इमेज बेहद मासिव और माचो है.
'टॉक्सिक' के प्रोमो में गीतू ने इस मर्दाना दुनिया को सिर्फ बंदूक और गैंगस्टर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसमें इंटीमेसी और सेक्सुअल पावर डायनेमिक्स भी डाले हैं. यही वजह है कि फिल्म के कंटेंट को लेकर बहस सिर्फ 'बोल्ड सीन हैं या नहीं' तक नहीं रुकी, बल्कि सवाल यहां तक पहुंच गया कि एक महिला डायरेक्टर पुरुष-प्रधान एक्शन स्पेस को किस नजर से देख रही है?
असली परीक्षा 26 अगस्त को होगी
फिलहाल 'टॉक्सिक' को लेकर एक बात पक्की है- फिल्म ने रिलीज से पहले ही लोगों को दो हिस्सों में बांट दिया है. कोई इसे यश का सबसे अलग अवतार बता रहा है, कोई गीतू के विजन पर सवाल उठा रहा है और कोई प्रोमो में दिख रही इंटीमेसी को लेकर नाराज है.
लेकिन एक बात पर शायद कम ही लोग बहस करेंगे- गीतू मोहनदास ने अपने करियर में सुरक्षित रास्ता चुनने की आदत नहीं डाली. चार-पांच साल की उम्र में एक्टिंग शुरू करने वाली बच्ची, अवॉर्ड-विनिंग एक्ट्रेस बनी, फिर कैमरा अपने हाथ में लिया और इंडिपेंडेंट सिनेमा से अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई. अब वही महिला 2026 की सबसे बड़ी मास एंटरटेनर फिल्मों में से एक को चला रही है.
और शायद 'Toxic' की सबसे बड़ी कहानी यही है- फिल्म में यश 'माचो' चेहरा हैं, लेकिन उस पूरी 'टॉक्सिक' दुनिया के पीछे कमांड गीतू मोहनदास की है. अब तक के प्रोमो को देखकर एक चीज जरूर साफ है- उन्होंने दर्शकों को चौंकाने की पूरी तैयारी कर ली है. असली सवाल यह है कि 26 अगस्त को जब पूरी फिल्म सामने आएगी, तो यही बोल्ड और विवादित ट्रीटमेंट कहानी की ताकत बनेगा या सबसे बड़ा रिस्क?
आरती गुप्ता