Mahakavya Shri Ramayana Katha Review: VFX-एक्टिंग ने बिगाड़ा अंजलि अरोड़ा की फिल्म का खेल, खोजने लगेंगे एग्जिट

Mahakavya Shri Ramayana Katha Review: ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ का रिव्यू पढ़ें और जानें देव शर्मा, रजनीश दुग्गल और अंजलि अरोड़ा की फिल्म कैसी है और VFX ने कितना निराश किया.

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महाकाव्य श्री रामायण कथा फिल्म कैसी है? (Photo: ITGD) महाकाव्य श्री रामायण कथा फिल्म कैसी है? (Photo: ITGD)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 25 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:20 PM IST

बॉक्स ऑफिस पर छोटे बजट की फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने अगर उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है, तो जाहिर सी बात है कि बाकी फिल्ममेकर भी पौराणिक कहानियों का रास्ता आजमाना चाहेंगे. इसी कड़ी में इस हफ्ते सिनेमाघरों में आई है ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’.

नाम सुनते ही उम्मीद होती है कि पर्दे पर रामायण की भव्य और दिल छू लेने वाली कहानी देखने को मिलेगी. लेकिन फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रह जाता है- आखिर इसे इतने बड़े महाकाव्य के रूप में पेश करने की तैयारी कितनी थी?

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अयोध्या से शुरू होती है कहानी

फिल्म की शुरुआत शाश्वत नाम के एक छोटे बच्चे से होती है, जो अपने परिवार के साथ अयोध्या पहुंचता है. परिवार मंदिर दर्शन के लिए चला जाता है, लेकिन शाश्वत वहीं रुक जाता है. यहीं उसकी मुलाकात एक साधु से होती है, जो उसे रामायण की कहानी सुनाना शुरू करता है.

इसके बाद कहानी हमें जय और विजय से मिलवाती है, जिन्हें श्राप के कारण रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्म लेना पड़ता है. फिर फिल्म में सीता माता का स्वयंवर, भगवान राम का वनवास और रावण के साथ उनका युद्ध जैसे रामायण के अहम पड़ाव आते हैं. कहानी में वह सब कुछ है, जिसे दर्शक पहले से जानते हैं.असली सवाल यह था कि फिल्म इसे किस अंदाज में पेश करती है. और यहीं फिल्म सबसे ज्यादा लड़खड़ाती है.

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राम बने देव शर्मा, रावण भी जमे

अगर अभिनय की बात करें तो देव शर्मा फिल्म में भगवान राम के किरदार में ईमानदार नजर आते हैं. उनके अभिनय में एक सादगी दिखाई देती है और वह अपने किरदार को संभालने की पूरी कोशिश करते हैं. हालांकि बात बात पर बेवजह की उनकी मुस्कुराहट अखरती है. रजनीश दुग्गल भी रावण के रूप में ठीक लगते हैं. स्क्रीन टाइम बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन जितना भी मौका मिलता है, उसमें वह अपने किरदार को विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं. लेकिन अंजलि अरोड़ा का मामला थोड़ा अलग है.

सीता माता के किरदार में उनका डी-ग्लैम अवतार जरूर अलग नजर आता है, लेकिन एक्टिंग के मामले में वह किरदार के साथ सहज नहीं दिखतीं. कई जगह ऐसा लगता है कि किरदार निभाने में उनकी झिझक पर्दे पर साफ दिखाई दे रही है. बाकी कलाकारों के पास ऐसा खास कुछ नहीं है, जिसे लेकर ज्यादा बात की जाए.

VFX देखकर दिमाग में एक ही सवाल- ये क्या देख रहे हैं?

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी तकनीकी प्रस्तुति है. सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग फिर भी ठीक-ठाक संभल जाती है, लेकिन VFX और ग्राफिक्स कई जगह पूरी फिल्म का मजा खराब कर देते हैं.

रामायण जैसी भव्य कहानी में दर्शक युद्ध, राक्षसों, महलों और पौराणिक दुनिया को बड़े पर्दे पर शानदार तरीके से देखने की उम्मीद करता ह. लेकिन यहां कई ग्राफिक्स ऐसे लगते हैं जैसे किसी शुरुआती VFX प्रोजेक्ट के लिए तैयार किए गए हों. कई जगह स्क्रीन पर जो दिख रहा है, वह कहानी की भव्यता बढ़ाने के बजाय उसका मजाक बना देता है.

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कॉस्ट्यूम जरूर कुछ जगह प्रभावित करते हैं, लेकिन मेकअप और प्रोस्थेटिक्स कई बार किरदारों की गंभीरता को कम कर देते हैं.

डायरेक्शन में नया क्या है?

फिल्म का डायरेक्शन अभिषेक सिंह ने किया है. लेकिन पूरी फिल्म देखते हुए यही महसूस होता है कि इसमें ऐसा कुछ नया नहीं है, जो पहले रामायण पर बनी फिल्मों और सीरियल्स में देखने को न मिला हो. रामायण की कहानी इतनी विशाल है कि उसे नए नजरिए से पेश करने के लिए बहुत मौके थे. लेकिन फिल्म ज्यादातर वही रास्ता पकड़ती है, जिसे दर्शक पहले से जानते हैं.

न कोई बड़ा सरप्राइज, न कोई ऐसा सिनेमाई ट्रीटमेंट जो कहानी को अलग पहचान दे. नतीजा यह कि फिल्म शुरू होने के बाद कई मौकों पर आपकी नजर पर्दे से ज्यादा घड़ी और एग्जिट गेट पर जाने लगती है.

म्यूजिक भी नहीं बचा पाया फिल्म को

फिल्म के म्यूजिक की बात करें तो कोई ऐसा गाना नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद आपके साथ रह जाए. कोई मजबूत हुक ट्रैक नहीं है जो दर्शकों को थिएटर से बाहर निकलते समय भी याद रहे. हां, बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म को कुछ हद तक संभालता है और कई दृश्यों में माहौल बनाने की कोशिश करता है. लेकिन अकेला बैकग्राउंड स्कोर पूरी फिल्म की कमजोरियों को ढक नहीं सकता. 

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फिल्म की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

समस्या सिर्फ एक नहीं है. कमजोर ट्रेलर, औसत VFX, कम प्रमोशन, फीकी परफॉर्मेंस और कहानी को नए तरीके से पेश करने की कमी- फिल्म कई मोर्चों पर पीछे रह जाती है. रामायण जैसी कहानी अपने आप में इतनी बड़ी और प्रभावशाली है कि फिल्ममेकर के पास शानदार सिनेमा बनाने के लिए भरपूर सामग्री मौजूद थी. लेकिन यहां लगता है कि उस सामग्री का पूरा इस्तेमाल ही नहीं हो पाया.

सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का होता है कि फिल्म में कुछ कलाकार अपनी तरफ से कोशिश करते दिखाई देते हैं, लेकिन कमजोर तकनीकी काम और निर्देशन उनका साथ नहीं देता.

रामायण के नाम पर भरोसा करके थिएटर न भागें

मेरे नजरिए से ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ उन फिल्मों में शामिल है, जहां कहानी बड़ी है लेकिन उसे पर्दे पर उतारने की तैयारी उतनी बड़ी नहीं लगती. देव शर्मा का राम वाला किरदार और रजनीश दुग्गल का रावण कुछ हद तक प्रभावित करते हैं, लेकिन खराब VFX, कमजोर ग्राफिक्स, फीका म्यूजिक और साधारण निर्देशन फिल्म को संभाल नहीं पाते.

रामायण की कहानी देखने के लिए दर्शकों के पास पहले से कई बेहतर विकल्प मौजूद हैं. ऐसे में सिर्फ नाम देखकर इस फिल्म से बहुत ज्यादा उम्मीद रखना निराश कर सकता है. हनुमान जी के भक्त हैं तो उनकी भक्ति में कोई कमी नहीं आएगी, लेकिन इस फिल्म को स्किप करने पर शायद भगवान राम भी नाराज नहीं होंगे.

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