शिवपाल सिंह यादव: जिस समाजवादी पार्टी को खड़ा किया, अब उसे हराने के लिए मैदान में

भतीजे अखिलेश यादव और चचेरे भाई राम गोपाल यादव से बागी होकर शिवपाल यादव उसी समाजवादी पार्टी को मिटाने के लिए फिरोजाबाद सीट से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, जिसे उन्होंने नेताजी यानी मुलायम सिंह के साथ खड़ा किया था. 

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शिवपाल सिंह यादव, फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ेंगे शिवपाल सिंह यादव, फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ेंगे

विशाल कसौधन

  • नई दिल्ली,
  • 20 मार्च 2019,
  • अपडेटेड 3:09 PM IST

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'चाचा' के नाम से मशहूर शिवपाल सिंह यादव की सियासी पहचान बहुत बड़ी है. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई, अखिलेश यादव के चाचा और अब प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष. शिवपाल की इन दिनों एक और पहचान बन गई है, वो है बागी शिवपाल. भतीजे अखिलेश और चचेरे भाई राम गोपाल यादव से बागी होकर शिवपाल उसी समाजवादी पार्टी को शिकस्त देने के लिए फिरोजाबाद सीट से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, जिसे उन्होंने नेताजी यानी मुलायम सिंह के साथ खड़ा किया था. 

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वही समाजवादी पार्टी, जिसमें शिवपाल सिंह यादव की हैसियत नंबर दो की थी. आज वह उसी पार्टी से निकाले जा चुके हैं और अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर एक नए सियासी सफर पर निकल पड़े हैं. वैसे शिवपाल सिंह का सियासी सफर कम रोचक नहीं रहा है. इटावा जिले के सैफई में 6 अप्रैल 1955 को जन्मे शिवपाल 5 भाई और एक बहन में से एक हैं. इनमें मुलायम सिंह सबसे बड़े हैं. शिवपाल ने बीए तक पढ़ाई की. मुलायम के राजनीति में आने के बाद उनकी सुरक्षा का पूरा जिम्मा शिवपाल के कंधे पर ही था.

राजनीति में नए-नए उभर रहे मुलायम सिंह यादव को 80 के दशक में जान का खतरा था. इसलिए शिवपाल सिंह यादव उनके साथ साए की तरह चलते थे. मुलायम के साथ चलते-चलते शिवपाल सियासी मैदान में भी आ गए. 90 के दशक में शिवपाल इटावा जिला पंचायत के अध्यक्ष बने. अहम बात है कि शिवपाल ने अपनी राजनीति को-ऑपरेटिव से शुरू की. को-ऑपरेटिव के जरिये हर जिले में समाजवादी पार्टी की पकड़ बनाई. उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड के अध्यक्ष बने. 

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मैनपुरी की जसवंतनगर विधानसभा सीट जब मुलायम सिंह ने छोड़ी तो शिवपाल उस सीट से लड़े और 1996 से लेकर अबतक इस सीट से वह जीतते आ रहे हैं. शिवपाल 1997-98 में विधानसभा की अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़ी समिति के सदस्य बने. मुलायम की सरकार आई तो कैबिनेट मिनिस्टर भी रहे. जब मायावती की सरकार बनी तो ये नेता प्रतिपक्ष रहे. शिवपाल सिंह यादव की पकड़ जमीनी स्तर पर जबरदस्त है. उत्तर प्रदेश के हर जिले में उनके समर्थकों की एक बड़ी लंबी चौड़ी लिस्ट है.

2012 में उत्तर प्रदेश में सपा को बहुमत मिला तो माना जा रहा था कि अगर मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री नहीं बने तो शिवपाल सिंह यादव को कुर्सी मिलनी तय है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मुलायम ने बेटे अखिलेश यादव को कुर्सी दे दी और यहीं से शुरू हुआ, कभी न रुकने वाला तकरार. खैर अखिलेश सरकार में शिवपाल कई मलाईदार विभागों के मंत्री रहे, लेकिन सरकार की विदाई की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती गई, वैसे-वैसे चाचा-भतीजे में तकरार बढ़ती गई. नौबत यहां तक आ गई कि शिवपाल सिंह यादव के कहने पर अखिलेश यादव को सपा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से हटा दिया गया.

इसके जवाब में अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल सिंह यादव को मंत्री पद से हटा दिया. दोनों के समर्थक लखनऊ के कालीदास मार्ग पर आमने-सामने आ गए. शिवपाल सिंह यादव ने इसके पीछे अपने चचेरे भाई राम गोपाल यादव को जिम्मेदार माना, जिनके जिम्मे पार्टी में दिल्ली दरबार है. 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल के पर कतर दिए और उनके कई करीबियों को टिकट नहीं दिया. इन सबके दौरान मुलायम सिंह यादव का रोल काफी अहम रहा. कभी वह शिवपाल के साथ नजर आए तो कभी अखिलेश के साथ.

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खैर शिवपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी को अलविदा कहकर अपनी नई पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का गठन कर लिया है. आगामी लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ेगी. हालांकि, उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. अब वह पीस पार्टी समेत कई दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. खास बात है कि शिवपाल खुद फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ेंगे. इस सीट से राम गोपाल यादव के बेटे यानी शिवपाल के भतीजे अक्षय यादव सांसद हैं और सपा प्रत्याशी भी. अब देखना होगा कि इस चुनावी संग्राम में भतीजे पर चाचा भारी पड़ते हैं या भतीजा?

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