बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी ने तलाशा मजबूत सियासी ठिकाना, 30 साल बाद कांग्रेस में करेंगे घर वापसी

पूर्व मंत्री और बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी की कांग्रेस नेताओं के साथ बढ़ती नजदीकियों ने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में चर्चा तेज कर दी है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले त्रिपाठी परिवार की 'घर वापसी' के कयास लगाए जा रहे हैं, जिससे पूर्वांचल के राजनीतिक समीकरण बदलने के आसार हैं.

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कांग्रेस का दामन थामेंगे अमरमणि त्रिपाठी (Photo-ITG) कांग्रेस का दामन थामेंगे अमरमणि त्रिपाठी (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:39 PM IST

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'बाहुबली' अमरमणि त्रिपाठी पूर्वांचल की सियासत का एक बड़ा नाम हैं. कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काटकर जेल से बाहर आए पूर्व मंत्री अमरमणि इन दिनों सियासी चर्चा के केंद्र में हैं. 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले त्रिपाठी परिवार कांग्रेस का हाथ थाम सकता है. ऐसे में उनकी 'घर वापसी' के कयास लगाए जाने लगे हैं.

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अमरमणि की कांग्रेस नेताओं से मुलाकात

कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अभिषेक दत्त पूर्वांचल क्षेत्र के प्रभारी हैं. अभिषेक दत्त और कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत मंगलवार को पूर्वांचल के संगठनात्मक दौरे पर पहुंचे थे. उनके स्वागत के लिए गोरखपुर एयरपोर्ट पर कांग्रेस नेताओं के साथ अमरमणि त्रिपाठी भी पहुंचे. इसके बाद महराजगंज में आयोजित कांग्रेस की बैठक में भी पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी मौजूद रहे.

अभिषेक दत्त और सुप्रिया श्रीनेत से मुलाकात तथा कांग्रेस की बैठक में शिरकत करने के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि अमरमणि अपनी पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस में वापसी की जमीन तैयार कर रहे हैं. उनके बेटे और पूर्व विधायक अमनमणि त्रिपाठी पहले ही मार्च 2024 में कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं. उल्लेखनीय है कि अमरमणि त्रिपाठी ने अपनी सियासी पारी का आगाज भी कांग्रेस से ही किया था.

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अमरमणि त्रिपाठी क्या करेंगे घर वापसी?

पिछले दिनों अमरमणि त्रिपाठी ने 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. महराजगंज जिले की फरेंदा सीट से अमरमणि ने खुद और नौतनवा सीट से अपने बेटे अमनमणि के चुनाव लड़ने की बात कही थी. उन्होंने चुनौती देते हुए कहा था, 'अगर कोई मुकाबले का हो तो बताओ?'

1989 में अमरमणि त्रिपाठी पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे, लेकिन 1991 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद लगातार तीन चुनावों—1996, 2002 और 2007 में अमरमणि ने कांग्रेस, बसपा और सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत की हैट्रिक लगाई. इसके बाद उनके बेटे अमनमणि भी चुनाव जीते, लेकिन 2022 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. महराजगंज का इलाका अमरमणि का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है.

अमरमणि त्रिपाठी ने जिस तरह से महराजगंज से चुनाव लड़ने की घोषणा की है, तभी से यह चर्चा चल रही है कि वे किस पार्टी का हाथ थामेंगे. कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अभिषेक दत्त और सुप्रिया श्रीनेत का स्वागत करने के बाद बैठक में शामिल होना इस बात का संकेत है कि उनकी कांग्रेस के साथ बातचीत अंतिम दौर में है. सुप्रिया श्रीनेत महराजगंज के पूर्व सांसद (हर्षवर्धन) की बेटी हैं और कांग्रेस नेतृत्व में उनका अच्छा दखल है. ऐसे में माना जा रहा है कि अमरमणि को कांग्रेस से टिकट मिल सकता है.

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कांग्रेस के सामने सियासी धर्मसंकट

 अमरमणि त्रिपाठी की कांग्रेस में एंट्री पूरी तरह पक्की होती है, तो पार्टी के भीतर कई स्थानीय समीकरण प्रभावित हो सकते हैं, फरेंदा सीट पर वर्तमान में कांग्रेस का कब्जा है. गोरखपुर-बस्ती मंडल में कांग्रेस के इकलौते मौजूदा विधायक वीरेंद्र चौधरी फरेंदा सीट से ही आते हैं. ऐसे में वीरेंद्र चौधरी की जगह अमरमणि त्रिपाठी को टिकट देना कांग्रेस के लिए आसान फैसला नहीं होगा.

दूसरी तरफ, नौतनवा सीट पर समाजवादी पार्टी का जनाधार काफी मजबूत माना जाता है. यदि 2027 में सपा-कांग्रेस का 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन बरकरार रहता है, तो नौतनवा सीट कांग्रेस के खाते में आने के बाद ही अमनमणि को टिकट मिल सकता है.

वहीं, कानूनविदों का कहना है कि सजायाफ्ता होने की वजह से अमरमणि त्रिपाठी के खुद चुनाव लड़ने पर कानूनी पेंच फंस सकता है, क्योंकि उन्हें अच्छे आचरण के आधार पर वक्त से पहले रिहा तो किया गया है, लेकिन उनकी सजा माफ नहीं हुई है. ऐसे में फरेंदा सीट कांग्रेस के वर्तमान विधायक वीरेंद्र चौधरी के पास ही रह सकती है.

'बाहुबल और ब्राह्मण राजनीति' की वापसी

पूर्वांचल में ब्राह्मण राजनीति का एक दौर अमरमणि त्रिपाठी और हरिशंकर तिवारी के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है. अमरमणि त्रिपाठी का खुद चुनावी मैदान में आना महराजगंज क्षेत्र में परंपरागत 'ब्राह्मण बनाम ठाकुर' या जातीय ध्रुवीकरण के समीकरण को फिर से हवा दे सकता है. महराजगंज और गोरखपुर बेल्ट के ब्राह्मण मतदाता अमरमणि के पारिवारिक राजनीतिक रसूख से सीधे प्रभावित होते रहे हैं.

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80 के दशक में नौतनवा विधानसभा की पहचान लक्ष्मीपुर विधानसभा क्षेत्र के रूप में थी. छात्र राजनीति से उभरे बाहुबली नेता वीरेंद्र प्रताप शाही ने लक्ष्मीपुर से चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया और 1985 में विधानसभा की सियासत में कदम रखा, जहां उन्हें अखिलेश सिंह का साथ मिला. निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वीरेंद्र प्रताप शाही पहली बार अमरमणि को शिकस्त देकर विधायक बने थे.

गोरखपुर-महाराजगंज में कितना बदले का गेम

बाद में रेलवे के ठेकों को लेकर श्रीप्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या कर दी. इसके बाद 1989 में अमरमणि लक्ष्मीपुर से विधानसभा चुनाव में उतरे और विधायक बने. पूर्वांचल की राजनीति में, खासकर महराजगंज और गोरखपुर बेल्ट में ब्राह्मण मतदाता बड़ी संख्या में हैं. अमरमणि अपने जनसंवाद कार्यक्रमों में विकास, पुरानी स्मृतियों और युवा बेरोजगारी जैसे मुद्दों का सहारा ले रहे हैं.

पूर्वांचल में ब्राह्मण राजनीति और जातीय समीकरणों के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले अमरमणि ने अपने सारे पत्ते अभी नहीं खोले हैं. एक तरफ जहां वे कांग्रेस के मंचों और नेताओं से संपर्क बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव लड़ने के लिए ताल भी ठोक रहे हैं. अमरमणि त्रिपाठी की कांग्रेस नेताओं के साथ बढ़ती नजदीकियों ने यह साफ कर दिया है कि 2027 के यूपी चुनाव में पूर्वांचल का सियासी संग्राम बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण होने वाला है.

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